नालन्दा के अतीत से

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12वीं सदी का विश्वगुरू :भारत के बिहार राज्य की राजघानी पटना के दक्षिण-पूर्व की तरफ एक छोटा सा गांव है-बड़ा गांव। इसी गांव के परिसर में विश्व प्रसिध्द नालन्दा विश्वविद्यालय के भग्नावशेष मौजूद हैं। नालन्दा विश्वविद्यालय की आधारशिला 5वीं शताब्दी में रखी गई थी। शिक्षण के प्राचीन अधिष्ठान के रूप में प्रसिध्द नालन्दा में बौध्द देशों के दस हजार से भी ज्यादा छात्र शिक्षा प्राप्त करते थे। यहां दो हजार अध्यापक थे। नालन्दा विश्व का पहला आवासीय विश्वविद्यालय है। विश्वविद्यालय के भग्नावशेषों में चहल-कदमी, आपको उस युग में ले जाएगी, जिसमें भारत विश्व को ज्ञान-प्रदान किया करता था। यह एक ऐसा युग था जब भारत विश्व में अध्ययन का आकर्षण केन्द्र था।
यह विश्वविद्यालय 5वीं शताब्दी से लेकर 12वीं शताब्दी तक अपने चरमोत्कर्ष पर था। यद्यपि नालन्दा में भगवान बुध्द के चरणकमल पहले ही पड़ चुके थे लेकिन बाद में यह स्थान नालन्दा नाम से ही महान बौध्द विश्वविद्यालय के रूप में लोकप्रिय हुआ। नालन्दा विश्वविद्यालय भारत में बौध्द धर्म के विकास का दैदीप्यमान प्रतीक है। हो सकता है, नालन्दा नाम शाक्यमुनि के पूर्वावतारों से लिया गया हो। महाराज हेवास की राजधानी यही थीं। नालन्दा उनकी एक उपाधि थी। नालन्दा से तात्पर्य है-प्रदान करने की चिरक्षुधा। यह स्थान कई सामाज्यों और सम्राटों के उत्थान और पतन का गवाह है। इन सम्राटों ने नालन्दा विश्वविद्यालय के विकास में योगदान दिया। इन सम्राटों ने कई बौध्द विहारों और बौध्द मंदिरों का निर्माण कराया था। हर्षवर्घन ने भगवान बुध्द की 25फुट ऊंची ताम्र प्रतिमा भेंट की थी और कुमारगुप्त ने ललितकला के महाविद्यालय को इसे समर्पित किया था। महायान पंथ के दार्शनिक नागार्जुन, ब्राह्मण विद्वान, धर्मपाल तथा तर्क सिध्दान्त के संस्थापक,दिन्नाग ने यहां अध्यापन का कार्य किया।सुप्रसिध्द चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने यहां प्रवास कर उस युग की स्थितियों का विस्तृत वर्णन तैयार किया था। इस स्थान की खुदाई में कई स्तूप, बौध्द विहार, छात्रावास, सीढियां, ध्यान कक्ष, व्याख्यान कक्ष और कई अन्य भवनों के अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो इस स्थान की भव्यता और महानता की गाथा सुनाते हैं। खुदाई के दौरान कई प्राचीन बौध्द प्रतिष्ठानों, स्तूप, चैत्य, मंदिर और मठ स्थल यहां दिखाई दिए हैं। इससे पता चलता है कि यह स्थान बौध्द पूजा-अर्चना और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण केन्द्र था।
नालन्दा की ऐतिहासिकता के बारे में जैन साहित्य से भी जानकारी मिलती है। महावीर वर्ध्दमान ने नालन्दा में 14पावस सत्रों में यहां प्रवास किया था। पाली बौध्द साहित्य में भी नालन्दा की कई बार चर्चा हुई है। इस साहित्य से पता चलता है कि भगवान बुध्द ने इस स्थान की कई बार यात्रा की थी। प्रतीत होता है कि, भगवान महावीर और बुध्द के समय में नालन्दा एक समृध्द मंदिरों का नगर था। यह एक तीर्थस्थल और प्रसिध्द विश्वविद्यालय था। कहा जाता है कि सम्राट अशोक ने नालन्दा के सारिपुत्र स्थित चैत्य में पूजा-अर्चना की थी और यहा एक मंदिर बनवाया था। तारानाथ ने यह उल्लेख किया है। उन्होंने यह भी बताया है कि दूसरी शताब्दी के सुप्रसिध्द महायान दार्शनिक नागार्जुन ने नालन्दा में अध्ययन किया था। नागार्जुन आगे चलकर यहां महा-पुजारी बने। गुप्त काल के राजाओं ने इन बौध्द विहारों को संरक्षण प्रदान किया। कुषाण वास्तु शैली में बने ये बौध्द विहार एक परकोटे के चारों ओर कक्षों की कतार के रूप में हैं। सम्राट अशोक और हर्षवर्ध्दन उन कुछ शासकों में से हैं,जिन्होंने यहां मंदिर और बौध्द विहार बनवाये। हाल ही में कराई गई खुदाई के दौरान यहां कई भवनों के अवशेष मिले हैं। ह्वेन त्सांग ने इस प्राचीन विश्वविद्यालय की वास्तुकला और गरिमा का जीवन्त वर्णन किया है। आधुनिक इतिहासकारों ने पांचवीं शताब्दी के आसपास नालन्दा में एक बौध्द विहार की नींव रखे जाने का उल्लेख किया है। हो सकता है कि यह तिथि सटीक न हो। उदाहरण के लिए,नागार्जुन की सर्वमान्य आत्मकथा में जिक्र आया है कि उन्होंने सात वर्ष की आयु में नालन्दा में दीक्षा ग्रहण की थी। माना जाता है कि नागार्जुन का जन्म 150 ईस्वी के आसपास हुआ था। इसके अलावा नागार्जुन की आत्मकथा में बताया गया है कि उनके गुरू राहुलभद्र कुछ समय के लिए नालन्दा में रहे।
इससे हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि नालन्दा में भगवान महावीर की स्थापना के काफी पहले ही यहां बौध्द विहारों की स्थापना हो चुकी थी। ह्वेन त्सांग ने बौध्द भिक्षु शीलभद्र के साथ यहां अध्ययन किया था। उस समय तक यह स्थान अध्ययन के केन्द्र के रूप में ख्याति प्राप्त कर चुका था। कई मायनों में यह एक आधुनिक विश्वविद्यालय के रूप में स्थापित हो चुका था। विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए कठिन मौखिक परीक्षा ली जाती थी और कई छात्रों को यहां प्रवेश न मिलने पर निराश लौटना पड़ता था। नालन्दा में ज्ञान प्राप्त करना या अध्ययन करना एक महान प्रतिष्ठा माना जाता था। लेकिन यहां कोई डिग्री नहीं दी जाती थी और न ही यहा अध्ययन के लिए कोई समय सीमा निर्धारित थी। भिक्षु के रूप में यहां की दिनचर्या में पठन-पाठन,अध्ययन तथा पूजा-अर्चना के लिए अलग-अलग समय निर्धारित किया गया था। समय की गणना के लिए जल-घड़ी का उपयोग किया जाता था। यहां अध्ययन की व्यवस्था के अनुसार छात्रों को समझाने के लिए व्याख्यानों और शास्त्रार्थ का सहारा लिया जाता था। जहां सामान्य ज्ञान रखने वाले लोगों को बहुधा लज्जा का सामना करना पड़ता था और विद्वानों का सम्मान किया जाता था। तद्नुसार चुने गए बौध्द भिक्षु सामान्यतया उस समय के अत्यन्त ज्ञानी व्यक्ति हुआ करते थे। पुस्तकालय अत्यन्त विशाल और ख्याति प्राप्त था। हालांकि एक मिथक के अनुसार एक अग्निकांड में कई पुस्तकें पूरी तरह नष्ट हो गई। गुप्तकाल के दौरान महायान का अध्ययन और प्रचलन, विशेषकर मध्यामक का प्रचलन बढा। लेकिन 750 ईस्वी यानि पाल वंश के शासन के दौरान तांत्रिक शिक्षण के प्रसार और अध्ययन में विस्तार हुआ।
सुप्रसिध्द पंडित अभयकर गुप्त के लेखों से इसके सबूत मिलते हैं। अभयकर गुप्त एक सुप्रसिध्द तांत्रिक तथा नालन्दा और विक्रमशिला बौध्द मठ के महाबोधि भिक्षु थे। नरोपा भी तिब्बती तांत्रिक परम्परा की शिक्षण शाखा के एक महत्वपूर्ण शिक्षक थे, जो 1049 से 1057 ईस्वी तक नालन्दा में महाभिक्षु रहे थे।
12वीं शताब्दी के मुस्लिम आक्रमण के समय तक नालन्दा का अधिकांश पारम्परिक ज्ञान और परम्परा तिब्बत पहुंच चुकी थी। हालांकि उदन्तपुरी और विक्रमशिला के बौध्द विहारों को नष्ट कर दिया गया था,लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि उस समय नालन्दा के भवनों को कोई ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचाया गया था। हालांकि बौध्द विहारों और मंदिरों को आक्रान्त करती सेनाओं के आने के पहले ही अधिकांश बौध्द भिक्षु यहां ये पलायन कर चुके थे। 1235ईस्वी में तिब्बती तीर्थयात्री चाग लोत्सावा को यहां 70 छात्रों की कक्षा के साथ एक 90 वर्षीय अध्यापक राहुल श्रीभद्र यहां मिले थे। राहुल श्रीभद्र ने एक स्थानीय ब्राहमण की सहायता से अपनी जीवन रक्षा की थी और तब तक यहां से तब तक पलायन नहीं किया, जब तक कि अपने आखिर तिब्बती छात्र की शिक्षा पूरी नहीं करा दी। (चीन के राष्ट्रपति हू जिनताओ इस माह भारत की यात्रा पर आ रहे हैं और शिक्षण का यह स्थान चीन के साथ गहरे संबंधों से जुड़ा है)
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