“पहले जात और उसके बाद जिस जमात के बल नीतीश कुमार नालन्दा की राजनीति में वर्चस्व कायम रखते आए हैं, वही समीकरण अब महागठबंधन के प्रत्याशी के पक्ष में खड़ा दिख रहा है…”

नालंदा दर्पण (एस.भारती)। सुशासन बाबू के गृह जिला नालन्दा में विकास नहीं, अब जातिवाद बोलता है कि चुनाव में क्या होना है। ज्यों ज्यों चुनाव प्रचार का क्रम बढ़ रहा है। राजनीतिक दलों के समर्थक जातीय गोलबंदी में एकजुट होने लगे है।

सोशल इंजीनियरिंग के मास्टर नीतीश कुमार अपने ही गृह जिला में जाति के चक्रव्यूह में उनके उम्मीदवार कौशलेंद्र कुमार पिछड़ते दिख रहे हैं और हैट्रिक का सपना टूटने के कगार पर है।

सोशल इंजीनियरिंग के बदौलत बिहार में सत्ता की कुर्सी पर काबिज रहने के लिए सीएम नीतीश कुमार ने अपने सिद्धांतों से समझौता कर जंगलराज की हमेशा दुहाई देने वाले राजद से भी दोस्ती कर ली। अब जब मुख्यमंत्री फिर से एनडीए में शामिल है और यहां जीत की हैट्रिक लगाने के लिए कौशलेंद्र पर ही दांव लगा दिया।

पार्टी सूत्रों की माने तो दर्जनों दावेदार को खारिज करने से पार्टी में अंदरूनी कलह भी है, जिसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

कभी लालू तो कभी नीतीश का जिन्न समझे जाने वाले महागठबंधन के अति पिछड़ा उम्मीदवार अशोक आज़ाद चन्द्रवँशी (कहार) जाति के होने से अतिपिछड़ों के अन्य जातियों का समर्थन भी इन्हें मिल रहा है।

नालन्दा संसदीय क्षेत्र में 2 लाख चन्द्रवँशी मतदाता के साथ अतिपिछड़ों के 5 लाख मतदाता, यादव 3 लाख,  मुस्लिम 1 लाख 75 हज़ार के अलावे जिले में पासवान, कुशवाहा, राजपूत, पासी, चौधरी, बेलदार, रविदास सहित अत्यंत पिछड़ा वर्ग एवं अनुसूचित जाति के वोटर महागठबंधन प्रत्याशी के पक्ष में माहौल बनाते दिख रहे है।

वही नालन्दा संसदीय क्षेत्र में नीतीश कुमार द्वारा कोचईसा कुर्मी की राजनीतिक उपेक्षा के कारण इस वर्ग का वोट भी महागठबंधन को मिलने की हलचल राजनीतिक गलियारों में दिख रही है।

विभिन्न सामाजिक और जातीय संगठनों ने तो महागठबंधन प्रत्याशी को समर्थन का एलान भी कर दिया है।

महागठबंधन के विभिन्न पार्टियों राजद, काँग्रेस, हम, भीआईपी पार्टी के परंपरागत वोट के समीकरण के हिसाब से यादव, मुस्लिम, चन्द्रवँशी, अतिपिछड़ा, मांझी और अनुसूचित जाति के वोट बैंक सीधे सीधे महागठबंधन के पक्ष में जाता दिख रहा है।

स्वर्ण समाज के संगठनों के लोग भी भविष्य की रणनीति के तहत नीतीश विरोध की आवाज़ बुलंद कर रहे है।

वही 2014 में मात्र 9 हज़ार वोट से हारने वाले एनडीए के अतिपिछड़ा प्रत्याशी सत्यानन्द शर्मा के समर्थक भी इस बार अशोक आज़ाद के मजबूत स्तम्भ बने हुए है, जो नीतीश के तिलिस्म तोड़ने की फिराक में हैं।

यकीनन विकास के दावों के बीच नालन्दा में सामाजिक और राजनैतिक उपेक्षा के शिकार मतदाताओं  की  गोलबंदी का प्रभाव ही है कि बिहार के कथित नम्बर दो के जदयू नेताओं को  गाँव और गलियों में बैठक करने को मजबूर होना पड़ा है।

विश्व को ज्ञान देने वाली धरती नालन्दा के राजनीतिक समीकरण  जार्ज साहब की नालन्दा में उपस्थिति महसूस करा रही है।

यही वजह है कि जदयू उम्मीदवार कौशलेंद्र के पसीने खुशनुमा मौसम में भी नही सुख पा रहे है, जिसकी शिकन गांव और शहरों के मतदाताओं को भी दिख रही है।

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