एक्सपर्ट मीडिया न्यूज नेटवर्क। नालंदा जिले के हिलसा अनुमंडल क्षेत्र में आमजन दोहरी राहत महसुस कर रहे हैं। थानेदार प्रेमराज सिंह के साथ अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी मुस्तफिक अहमद भी विदा हो गए हैं।

मो. अहमद के पदास्थापना से हिलसा क्षेत्र में एक उम्मीद बंधी थी, लेकिन उनकी कार्यशैली से लोग जल्दी ही परेशान हो गए। एक तरफ दारु-बालू के कारोबार चरम सीमा पर पहुंच गई, दूसरी तरफ हर संगीन मामले पुलिस के लिए महज कमाई के जरिया के रुप में सामने आए।

चिक्सौरा थाना का एक मामला तो मो. अहमद की तानाशाही प्रवृति का एक मिसाल बन गई। सूचना अधिकार अधिनियम-2005 के तहत मांगी गई सूचना के साथ वादी पर गोपनीय ढंग से एक फर्जी केस कर दिया गया कि उसने थाना में एक दारोगा के साथ गाली-गलौज, मारपीट की गई। इस मामले का खुलासा तब हुआ, जब नालंदा एसपी ने वादी को अपने पत्र में सूचित किया। इस फर्जी एफआईआर की पटकथा डीएसपी ने ही रची थी। 

यहां ऐसे कई मामले हैं। इस डीएसपी के कार्यकाल में थानेदार ने एक व्यवसाई के घर में घुसकर उसके परिजनों को पीटा। उसकी सारी अमानवीय हरकत कैमरे में कैद हो गई। हाल ही में एक सभ्य महिला को बुरी तरह से पीटा गया। अपराध के कई संगीन मामलों में कल्पित कहानी के जरिए खानापूर्ति की गई। कई नृशंस हत्या हुई, लेकिन किसी भी घटना का निष्पक्षता से पर्दापाश नहीं किया गया

नगरनौसा थाना की हाजत में दलित जदयू नेता की हत्या मामले में भी हिलसा डीएसपी मुस्तफिक अहमद की काफी संदेहास्पद भूमिका रही है। कहा जाता है कि इन्हीं के ईशारे पर शव को शौचालय में टांग कर आत्महत्या का स्वरुप दिया गया था।

हालांकि हिलसा अनुमंडल क्षेत्र से बुरी स्थिति राजगीर अनुमंडल क्षेत्र की है। वहां के कई थानेदार बेलगाम हो गए हैं। वहां के डीएसपी सोमनाथ प्रसाद ने पुरी पुलिस व्यवस्था का बेड़ा गर्क कर रखा है।

राजगीर थानेदार तो अपनी नाकाबिलियत से सारी हदें पार करता रहता है। चूकि डीएसपी के साथ इन्हें भी स्थानीय सत्ता के एक शीर्ष नेता का संरक्षण प्राप्त है, इसलिए कोई वरीय अफसर कार्रवाई का जोखिम नहीं उठाना चाहते। यहां सिर्फ दलालों की तूती बोलती है। आमजन भगवान भरोसे हैं।   

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