“समाज ने जिस ‘मोची’ को छूने से परहेज किया, अर्थशास्त्र ने ‘मोची’ को एक अंतरराष्ट्रीय ब्रांड बना दिया। भारत में मोची लेदर शूज और लेदर गारमेंट्स का एक बड़ा नाम है। देश के 60 से ज्यादा शहरों में ‘मोची’ के 125 से ज्यादा आउटलेट है। जहाँ अभिजात्य वर्गों की भीड़ उमड़ती है। ये धनाढ्य का ‘मोची’ शोरूम है। दूसरी तरफ चंडी के रामविलास और रामदहीन जैसे उपेक्षित मोची…

नालंदा दर्पण डेस्क।बाबूजी! सच कहूँ-मेरी निगाह में न कोई छोटा है न कोई बड़ा है मेरे लिए, हर आदमी एक जोडी़ जूता है जो मेरे सामने मरम्मत के लिए खड़ा है

धूमिल की कविता ‘मोची राम’ से ली गई इन पंक्तियों में देश की सर्वाधिक आबादी वाली जाति ‘मोची’ की दशा- दुर्दशा का वर्णन है…

कोरोना महामारी के बीच पिछले तीन महीने से जारी लॉकडाउन ने समाज के सभी वर्गो को प्रभावित की है।चाहे वह.समाज का.अग्रिम पंक्ति के लोग हो या समाज का अंतिम व्यक्ति। सभी के पेशे -रोजगार पर इसका असर दिखा है। समाज के हाशिए पर जीवन यापन कर रहें मोचियों के रोजी -रोजगार के लाले पडे़ रहे।

ढ़ाई महीने लॉकडाउन गुजारने के बाद चंडी प्रखंड के मोचियों की जीवन पटरी पर आनी बाकी है।उनकी कारीगरी बंद थी तो घर का चूल्हा भी बुझा हुआ रहा। लॉकडाउन के दौरान उनकी सुध किसी ने नहीं ली। जिसका परिणाम उनका जीवन ठहर सा गया। अभी भी कई ऐसे मोची है, जो अनलॉक के बाबजूद उनकी बिसात बाजार में नहीं दिखती है।

ऐसे ही एक शख्स हैं अर्जुन राम, जो पिछले तीन दशक से ज्यादा समय से चंडी बस स्टैंड के पास शहीद रवींद्र पथ  शिलापट्ट पर अपनी बिसात लगाते रहे हैं। लेकिन पिछले तीन महीने से उन्होने अपनी दुकान नहीं लगाई है।

ऊपर से लॉकडाउन और कोरोना महामारी ने सबको डरा रखा है। घर में पडे़ रहे तो भूखे मरने की नौबत। अगर घर से बाहर निकले तो बीमारी की चपेट में आने का डर करें तो क्या!

चंडी मुहाने पुल पर योगिया के रामविलास राम पिछले कुछ सालों से अपनी जूते-चप्पल मरम्मत की एक छोटी सी दुकान लगाते है। वर्ष 2000 में मैट्रिक की परीक्षा दी थी। पास भी हुए। लेकिन अर्थाभाव के कारण आगे नही पढ़ पाये। घर में एक विधवा मां है,तीन छोटे बच्चे हैं, जिनकी परवरिश का बोझ इनके कंधे पर है।

पिछले ढ़ाई महीने तक फांके में गुजारा करने के बाद अपनी बिसात लेकर बैठ गये। जब उनसे लॉकडाउन के दौरान उनकी जीविका पर बात हुई तो दर्द झलक गया। बोलने लगे- किसी तरह राशन कार्ड से कुछ राशन मिल तो गया, लेकिन पांच लोगो का पेट भरना मुश्किल पड़ रहा था। कहने को दलित समाज के लिए कई योजनाएं चल रही है। लेकिन हमारी दुर्दशा देख कर कोई भी अंदाजा लगा सकता है कि ये योजनाएं जाती कहाँ है।

रामविलास राम कहने लगे- अब जूते-चप्पल की मरम्मत कराने के बजाय नया खरीदना पसंद करते हैं।फिर जो मरम्मत के लिये आते हैं वे गरीब होते हैं, इसलिए पैसे भी कम देते हैं। चूंकि यह उनका पुश्तैनी धंधा है। कोई काम नहीं मिला तो मजबूरी में अपने धंधे में लौटना पड़ा। पांच लोगों का गुजर बसर इस धंधे से मुश्किल से हो पाता है।

कभी-कभी तो खाली हाथ लौटना पड़ता है। दिनभर गुजारने के बाद कोई कदम रामविलास के ठिकाने का रुख करता है तो आंखें चमक उठती है।

चंडी के बापू हाईस्कूल गेट के पीपल पेड़ के नीचे काकन पर के रामदहिन रविदास छोटी सी बिसात लिये बैठे मिलते हैं। इनके ठीक पीछे डाँ भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा है। जिन्होंने समाज के दबे-कुचले लोगों को मुख्यधारा में लाने का सपना देखा था।

आंबेडकर की प्रतिमा रोज रामदहिन को आजीविका से संघर्ष करते हुए देखा करती है। रामदहिन की निगाह सड़क से रहगुज़र उन पैरों पर  है, जिनके जूते-चप्पल मरम्मत मांगते है। उनकी छोटी सी दुनिया आमदो-रफत के लिये इंतजार करती है। रामदहिन अविवाहित है। चालीस वसंत देख चुके हैं। परिवार बंट चुका है। उनकी भाईयों की अलग जिंदगी है। अपने छोटे भाई के साथ रहते हैं।

छोटा भाई सुभाष रविदास जैतीपुर में यहीं काम करते हैं। लॉकडाउन के दौरान इन्हें दुकान चलाने में खासा परेशानी हुआ। कहने लगे- लॉकडाउन में जीवन चलाना मुश्किल हो रहा था। पैसे की तंगी थी। इसलिये मजबूरी में अपनी दुकान डरते-डरते लगानी पड़ी। उपर से पुलिस का डर। घर में आर्थिक तंगी ने लॉकडाउन में भी आना पड़ता था। सरकारी योजनाओं का लाभ उन्हें नहीं मिला है। जिसका मलाल उन्हें है। अनलॉक के बाद उनकीं जिंदगी पटरी पर थोड़ी बहुत लौट रहीं है।

महात्मा गांधी ने कहा था- हमें समाज के अंतिम व्यक्ति की परवाह करनी होगी। लेकिन आज की सरकारों की नजर में दलित सिर्फ वोट बैंक है।

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