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      दिल्ली जाकर किसान रैली में कैसे भागीदार बनेंगे यहाँ के बदहाल किसान?

      "बार-बार सरकार एक ही रटा रटाया बयान दे रही है कि कुछ मुट्ठी भर ही किसान आंदोलन में शरीक हैं। लेकिन जो असल किसान हैं, वह अपने घरों में फटा पुराना कंबल ओढ़कर अपना जीवन जैसे तैसे गुजार रहे हैं। ऐसे किसान चाह कर भी इस भीषण ठंड में आंदोलन का हिस्सा बनने से वंचित हो रहे हैं......."

      बिहारशरीफ ( संजय कुमार)। दिल्ली में किसानों के आंदोलन का करीब 2 माह पहुंचने को है। इस भीषण ठंड में भी किसान अपनी मांगों को लेकर डटे हुए हैं। परंतु , सरकार ने तीन किसान विरोधी कानून को वापस लेने को तैयार नहीं है।

      इन किसानों पर आरोप लग रहा है कि वास्तविक किसान नहीं, बल्कि व्यापारी वर्ग वाले किसान हैं ।इन अन्नदाता को कभी खालिस्तानी समर्थक का खिताब दिया जा रहा है, तो कभी विपक्षी नेताओं के पैसों से चलने वाला आंदोलन की उपमा मिल रही है।

      इन सब बातों को लेकर इस संवाददाता ने नालंदा जिले के बेन प्रखंड अंतर्गत ग्राम बलवा पर  के 75 वर्षीय बुजुर्ग किसान रामदेव प्रसाद  ने फोन पर बातचीत की।

      रामदेव प्रसाद ने अपने समय में अच्छी नौकरी को ठुकरा कर खेती करने का मन बना लिया था और आज भी खेती ही कर रहे है। किसान आंदोलन में शामिल लोगों की पीड़ा को देखकर  ये काफी चिंतित हैं।

      उन्होंने बताया कि जो कानून किसानों के लिए आया है ,उसे आज तक  सार्वजनिक नहीं किया गया है । हर आदमी  नहीं जान रहा है कि इसमें क्या क्या प्रावधान है। सभी पैराग्राफ सार्वजनिक नहीं हुए हैं। सरकार को इन कानून की सभी बिंदुओं को सार्वजनिक करना चाहिए। ताकि देश के किसानों को पता लग सके की कानून में क्या-क्या प्रावधान है। जिससे भविष्य में इन कानूनों को लागू होने से किसानों को क्या-क्या हानि उठानी पड़ेगी या फायदा होगा।

      रामदेव प्रसाद ने आगे बताया कि नेता लोग टीवी चैनलों पर आकर चिल्ला रहे हैं। क्या इन नेताओं ने किसानों से संपर्क  कर लिया है या उसका सपोर्टर है या विरोधी है । टीवी डिबेट में यहां तक कहा जा रहा है कि आंदोलन में सिर्फ धनी लोग ही शामिल हैं ।

      इस पर रामदेव प्रसाद ने बताया कि किसानों के तन पर कपड़ा नहीं है । दवा के लिए पैसे नहीं है। वह इस आंदोलन में चाह कर भी दिल्ली जाकर कैसे भागीदार बन सकता है, यह संभव नहीं है।

      उन्होंने कहा कि सरकार बार-बार कह रही है की यह कानून किसानों के हित में है। जिन किसानों के लिए यह कानून बनाया गया है। वह कह रहा है कि यह कानून हमारे हित में नहीं है । तो फिर क्यों सरकार जबरदस्ती इस कानून को किसानों के ऊपर ठोकने पर तुली हुई है।

      उन्होंने सरकार की मंशा पर सवाल उठाया और कहा कि वोट लेने के लिए किसानों को देश का अन्नदाता कहा जाता हैं। तरह तरह उपमाओ से नवाजा जाता है । आज घर परिवार छोड़कर करीब 2 माह से किसान दिल्ली में इस भीषण  ठंड में भी डटे हुए हैं। सिर्फ इसलिए कि सरकार हम लोगों को आजादी से जीने दे। पुश्तैनी खेती धंधे  बर्बाद ना हो। परंतु सरकार के कानों पर जू नहीं रेंग रही है। वह जबरदस्ती दो लोगों को फायदा के लिए देश के करोड़ों किसानों को सरकार बर्बाद करने पर तुली हुई है।

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