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    16 साल की उम्र में किशोर पर लगा था डकैती का आरोप, 43 वर्ष की उम्र में हुआ दोषमुक्त

    कई साक्षियों ने न तो विधि विरूद्ध किशोर का नाम लिया और न ही उसकी पहचान की। कई साक्षियों के बयान में भी विरोधाभास मिला। एक साक्षी ने दो बार पहचान परेड कराने की बात कही....

    अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि किस परिस्थिति में दो बार एक ही अभियुक्त का परीक्षण परेड कराना पड़ा। कोर्ट ने इसे भी विश्वसनीय नहीं माना। डकैतों की संख्या को लेकर भी वाद परीक्षण के दौरान विरोधाभास सामने आये…

    नालंदा दर्पण डेस्क। नालंदा जिला किशोर न्याय परिषद के प्रधान दंडाधिकारी मानवेन्द्र मिश्र ने एक और चर्चित फैसला सुनाते हुए 26 साल से कोर्ट का चक्कर लगा रहे युवक को डकैती के आरोप से दोषमुक्त कर दिया है।

    खबरों के मुताबिक जब युवक पर डकैती का आरोप लगा था तब वह 16 साल 7 माह का किशोर था और आज वह 43 साल का युवक है। सालों साल चली सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष किशोर पर लगाये गये आरोप को संदेहों से परे साबित नहीं कर सका।

    किशोर से युवक बना आरोपी जमानत पर चल रहा था। जज मिश्र ने अपने आदेश में जमानतदारों को भी बंध पत्र की जिम्मेवारी से मुक्त कर दिया है। इस मामले में अभियोजन पक्ष द्वारा कुल 14 गवाह कोर्ट में पेश किये गये थे।

    साक्ष्य परीक्षण के दौरान एक गवाह मुकर गया। मामला हिलसा थाना क्षेत्र से जुड़ा था। सूचक ने अज्ञात अपराधियों के खिलाफ मामला दर्ज कराया था। किशोर का नाम अनुसंधान के दौरान जोड़ा गया था।

    सूचक ने आवेदन में डकैतों की संख्या 30-35 बतायी। जबकि किसी साक्षी ने 8, किसी ने 10 तो किसी ने 15 संख्या बतायी। सामाजिक रिपोर्ट में भी किशोर पर इस एक कांड के अलावा कोई और कांड दर्ज नहीं होने की बात थी। यह सब तथ्य किशोर को 26 साल बाद डकैती के आरोप से मुक्त होने में सहायक बना।

    दरअसल, अप्रैल 1995 को हिलसा थाना क्षेत्र के एक गांव में डकैती की घटना घटी थी। परिवार के सभी सदस्य सोये हुए थे। उसी दौरान पिस्तौल और राइफल लिये अपराधी घर की छत पर चढ़ गये। खुद को पुलिस वाला बताया और सूचक के बड़े भाई से घर की चाभी मांगा।

    इस दौरान डकैतों ने फायरिंग की। जिसमें सूचक के भाई जख्मी हो गये। बाद में डकैती के दौरान ही उनकी मौत भी हो गयी। डकैतों ने घर का दरवाजा खोलकर दूसरे सहयोगियों को भी बुला लिया।

    नगद व सामान के साथ-साथ घर की महिलाओं के बदन से जेवर तक उतरवा लिये। यहां तक की सूचक के भतीजी का गौना होना था। गौना का सारा सामान भी डकैत अपने साथ ले गये।

    इस दौरान एक साक्षी ने दावा किया कि उसने टार्च की रोशनी से एक अभियुक्त की पहचान की, जो उसके घर आता-जाता था। किशोर का नाम बाद में अनुसंधान के दौरान कांड से जुड़ा था।

    मानवीय आधार पर फैसला लेने के लिए चर्चित जज श्री मिश्र के इस फैसले में भी मानवीय संवेदना है। किशोर से युवक बने आरोपी की पारिवारिक स्थिति का भी फैसले में जिक्र किया गया है।

    विधि विरूद्ध किशोर के परिवार में विधवा मां के अलावा पत्नी और तीन पुत्र हैं। तीनों पुत्र पढ़ाई करते हैं। जबकि किशोर पटना के एक निजी स्कूल में गार्ड व चालक के रूप में काम कर किसी तरह परिवार का भरण-पोषण कर रहा है।

    परिवार की आर्थिक स्थिति दयनीय है। वह समाज की मुख्यधारा से जुड़ चुका है। जेजेबी ने किशोर पर आश्रित उसकी पत्नी, तीन बच्चे और विधवा मां तथा किशोर के सर्वोत्तम हित को देखते हुए एक अवसर दिया जाना न्यायोचित माना है।

    किशोर न्याय परिषद में यह मामला फरवरी 2021 में आया था मामला। करीब 10 माह में यह अंजाम तक पहुंच गया। जबकि 25 साल से इस मामले की सुनवाई हिलसा कोर्ट में चल रही थी।

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