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    भारतीय संस्कृति का मूल आधार है गाय

    नालंदा दर्पण डेस्क। गाय एक महत्त्वपूर्ण पालतू जानवर है। इससे हमें उत्तम किस्म का दूध प्राप्त होता है। रेड सिन्धी, साहिवाल, गिर, देवनी, थारपारकर आदि नस्लें भारत में दुधारू गायों की प्रमुख नस्लें हैं। भारत में गाय की 28 नस्लें पाई जाती हैं। हिन्दू, गाय को ‘माता’ (गौमाता) कहते हैं।

    हिन्दू धर्म में यह विश्वास है कि गाय देवत्व और प्राकृतिक कृपा की प्रतिनिधि है, और इसलिए इसकी रक्षा तथा पूजा की जानी चाहिए। हिन्दू धर्म में गाय की पूजा का मूल आरंभिक वैदिक काल में खोज जा सकता है। यूरोपीय लोग, जिन्होंने दूसरी सहस्राब्दी ई.पू. में भारत में प्रवेश किया, वे पशुपालक थे। पशुओं का बड़ा आर्थिक महत्त्व था, जो वैदिक धर्म में भी दिखाई देता है।

    यद्यपि प्राचीन भारत में गायों और बैलों की बलि दी जाती थी और उनका माँस खाया जाता था। लेकिन दुधारू गायों की बलि क्रमश: बंद की जा रही थी। जैसे महाभारत व मनुस्मृति के हिस्सों में और ऋग्वेद में दुधारू गाय को पहले से ही ‘अवध्य’ कहा गया था।

    गाय की पूज्यता का संकेत उपचार शुद्धिकरण और प्रायश्चित के संस्कारों में पंचगव्य, गाय के पांच उत्पादन, दूध दही, मक्खन, मूत्र और गोबर के प्रयोग से मिलता है।

    बाद में अहिंसा के आदर्श के उदय के साथ गाय अहिंसक उदारता के जीवन का प्रतीक बन गई। साथ ही इस तथ्य के आधार पर कि उसके उत्पादन पोषण प्रदान करते हैं। गाय को मातृत्व और धरती माँ से भी संबद्ध किया गया।

    गाय को पहले पहल ब्राह्मण (या पुरोहित) वर्ग के साथ भी जोड़ा गया और उसे मारना कभी-कभी (ब्राह्मणों द्वारा) ब्रह्म हत्या जैसा निंदनीय कार्य माना जाता था। ईसा की पहली शताब्दी के मध्य में गुप्त राजाओं द्वारा गाय की हत्या करने पर मृत्युदंड का प्रावधान किया गया।

    देवताओं का वासः भारतीय परंपरा के अनुसार गाय के शरीर में 33 करोड़ देवता वास करते हैं, एवं गौ-सेवा करने से एक साथ 33 करोड देवता प्रसन्न होते हैं। गाय का विशिष्ट संबंध कई देवताओं, विशेषकर शिव जिनका वाहन बैल है। इंद्र मनोकामना पूर्ण करने वाली गाय, कामधेनु से निकट से संबद्ध, कृष्ण अपनी युवावस्था में एक ग्वाले और सामान्य रूप से देवियों के साथ उनमें से कई के मातृवत गुणों के कारण जोड़ा जाता है।

    19 शताब्दी के बाद के दशकों में विशेषकर उत्तरी भारत में एक गो रक्षा आंदोलन शुरू हुआ, जिसने हिंदुओं को एकीकृत करने और एक समूह के रूप में उन्हें मुसलमानों से अलग करने का प्रयास यह मांग करके किया कि सरकार गो हत्या पर प्रतिबंध लगाए।

    राजनीतिक और धार्मिक उद्देश्यों का यह घालमेल समय-समय पर कई दंगों का कारण बना और अंतत: 1947 में भारतीय उपहाद्वीप के विभाजन में भी इसकी भूमिका रही।

    हिन्दू संस्कृति में गायः गाय निर्बल दीन हीन जीवों का प्रतिनिधित्व करती है, सरलता, शुद्धता, और सात्विकता की मूर्ति है। गौ माता की पीठ में ब्रह्मा, गले में विष्णु और मुख में रुद्र निवास करते हैं, मध्य भाग में सभी देवगण और रोम रोम में सभी ‘महर्षि’ बसते हैं।

    श्रीकृष्ण को हम गोपाल कृष्ण, गोविंद कहते हैं। गाय पृथ्वी, ब्राह्मण और देव की प्रतीक है। गौ रक्षा और गौ संवर्धन हिंदुओं के आवश्यक कर्तव्य माने जाते हैं। सभी दानों में ‘गोदान’ का महत्त्व सर्वाधिक माना जाता है।

    गौ माताः हिन्दू संस्कृति के अनुसार जिस घर में गाय निवास करती हैं एवं जहाँ गौ सेवा होती है, उस घर से समस्त समस्याएँ कोसों दूर रहती हैं।

    भारतीय संस्कृति के अनुसार गाय को अपनी माता के समान संम्मान दिया जाता हैं इस लिये गाय को गौ-माता कहकर पुकारते हैं।

    कामधेनुः कामधेनु का वर्णन पौराणिक गाथाओं में एक ऐसी चमत्कारी गाय के रूप में मिलता है जिसमें दैवीय शक्तियाँ थी और जिसके दर्शन मात्र से ही लोगो के दुःख व पीड़ा दूर हो जाती थी यह कामधेनु जिसके पास होती थी उसे हर तरह से चमत्कारिक लाभ होता था। उसका दूध अमृत के समान था।

    कृष्ण कथा में अंकित सभी पात्र किसी न किसी कारणवश शापग्रस्त होकर जन्मे थे। कश्यप ने वरुण से कामधेनु माँगी थी फिर लौटायी नहीं, अत: वरुण के शाप से वे ग्वाले हुए।

    जैसे देवताओं में भगवान विष्णु, सरोवरों में समुद्र, नदियों में गंगा, पर्वतों में हिमालय, भक्तों में नारद, सभी पुरियों में कैलाश, सम्पूर्ण क्षेत्रों में केदार क्षेत्र श्रेष्ठ है, वैसे ही गऊओं में कामधेनु सर्वश्रेष्ठ है।

    कामधेनु सबका पालन करने वाली है। माता स्वरूपिणी हैं- सब इच्छाएँ पूर्ण करने वाली है। जब भगवान विष्णु स्वयं कच्छपरूप धारण करके मन्दराचल के आधार बनें।

    इस प्रकार मन्थन करने पर क्षीरसागर से क्रमश: कालकूट विष, कामधेनु, उच्चैश्रवा नामक अश्व, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ्रमणि, कल्पवृक्ष, अप्सराएँ, लक्ष्मी, वारुणी, चन्द्रमा, शंख, शांर्ग धनुष धनवन्तरि और अमृत प्रकट हुए।

    औषधीय गुणकारीः 

    • गाय का दूध अमृत के समान है, गाय से प्राप्त दूध, घी, मक्खन से मानव शरीर पुष्ट बनता है।
    • गाय के गोबर का प्रयोग चुल्हें बनाने, आंगन लिपने एवं मंगल कार्यो में लिया जाता है, और यहाँ तक की गाय के मूत्र से भी विभिन्न प्रकार की दवाइयाँ बनाई जाती है।
    • गाय के मूत्र में कैंसर, टीवी जैसे गंभीर रोगों से लड़ने की क्षमता होती हैं, जिसे वैज्ञानिक भी मान चुके है, तथा गौ-मूत्र के सेवन करने से पेट के सभी विकार दूर होते हैं।
    • भारतीय संस्कृति के अनुसार गाय ही ऐसा पशुजीव है, जो अन्य पशुओं में सर्वश्रेष्ठ और बुद्धिमान माना है।
    • ज्योतिष शास्त्र में भी नव ग्रहों के अशुभ प्रभाव से मुक्ति पाने के लिये गाय का ही वर्णन किया गया हैं।
    • यदि बच्चे को बचपन में गाय का दूध पिलाया जाए तो बच्चे की बुद्धि कुशाग्र होती है।
    • गाय की सेवा से भगवान शिव भी प्रसन्न होते हैं।
    • हाथ-पांव में जलन होने पर गाय के घी से मालिश करने पर आराम मिलेगा।
    • शराब, गांजे या भांग का नशा ज़्यादा हो जाय तो गाय का घी में दो तोला चीनी मिलाकर देने में 15 मिनट में नशा कम हो जायेगा।
    • जल जाने वाले स्थान या घाव को पानी से धोकर