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     “अनुसंधान में इस तरह का हास्यास्पद फर्जीबाड़ा करने वाला चंडी थानेदार 48 घंटे के भीतर हाजिर हो”

    बिहार शरीफ (नालंदा दर्पण )। बिहार के सीएम नीतीश कुमार के गृह जिले में पुलिस अफसरों का कोई सानी नहीं है। उनकी अजीबोगरीब कारनामे आए दिन सुर्खियाँ बटोरती रहती है।

    स बार तो चंडी थाना प्रभारी ने तो हद ही कर दी है। थानेदार ने अपनी लापरवाहियों से न्यायालय को गुमराह किया है, अपितु न्याय की प्रक्रिया को प्रभावित करने में भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। दूसरे शब्दों में कहें तो ऐसे पुलिस अफसर को न तो सही से प्रशिक्षण मिला है और न ही उनके पास कार्य करने के अनुभव ही हैं। थाना प्रभारी के पद लायक तो बिल्कुल प्रतीत नहीं होते।

    नालंदा जिला किशोर न्याय परिषद के प्रधान दंडाधिकारी सह अपर जिला व सत्र न्यायाधीश मानवेन्द्र मिश्र ने जेजेबी–419/21 में आरोप पत्र संख्या 453/21 एवं  चंडी थाना कांड संख्या-460/20 आरोप पत्र संख्या-542/21 की गंभीर त्रुटियों पर कड़ा संज्ञान लिया है और थाना प्रभारी रितुराज को 48 घंटे के भीतर सदेह उपस्थित होकर अपना स्पष्टीकरण समर्पित करने का आदेश दिया है कि क्यों उनके विरुद्ध विधि सम्मत आवश्यक कार्रवाई हेतु नालंदा आरक्षी अधीक्षक तथा पुलिस महानिरीक्षक अपराध अनुसंधान विभाग, पटना को पत्र प्रेषित किया जाए।

    जज मिश्र ने अपने आदेश में यह भी रेखांकित किया है कि लूट व डकैती जैसे संगीन मामले में चंडी थाना प्रभारी तथा अनुसंधानकर्ता द्वारा की गई त्रुटि से प्रतीत होता है कि जान बूझकर अभियुक्त को विचरण के दौरान लाभ पहुंचाने के उदेश्य से हास्यास्पद तरीके से तिथियों को अंकित किया गया है। इसके पूर्व में भी इसी तरह की त्रुटि प्रस्तुत की गई थी, जिसके आलोक में कोर्ट ने पत्रांक-238/21 दिनांकः 03/08/21 को नालंदा एसपी को पत्र लिखा था, जिसमें चंडी थानेदार को सात दिवसीय प्रशिक्षण दिलवाने की बात कही थी।

    दरअसल, चंडी थाना प्रभारी ने कांड संख्या-416/21 में आरोप पत्र  संख्या- 543/21 समर्पित किया है। आरोप पत्र समर्पित करने की तिथि आरोप पत्र में 07.09.21 अंकित है, जबकि आरोप पत्र में एफआईआर की तिथि 0909.21 अंकित है। ऐसी परिस्थिति में घटना घटित होने के पूर्व भविष्य की तिथि अंकित करने की प्रवृति को बचाव पक्ष के अधिवक्ता न्यायालय का ध्यान आकृष्ट कर पुलिस की कार्यशैली को हास्यास्पद बताते हैं और दर्ज तिथि से पुनः विचरण के दौरान पुलिस अनुसंधान पर सवाल उठाते हैं।

    जज मानवेन्द्र मिश्र के आदेश में उल्लेख है कि आरोप पत्र संख्या-542/21 में चंडी थाना प्रभारी ने अपना लघु हस्ताक्षर के साथ 07.08.21 तिथि अंकित की है तथा उसी आरोप पत्र पर अनुसंधान कर्ता ने जो हस्ताक्षर किया है, उसमें 07.09.21 तिथि अंकित है।

    उन्होंने अपने आदेश में सवाल उठाया है कि ऐसा कैसे संभव है कि अनुसंधान पूर्ण होने के एक माह पूर्व ही आरोप पत्र पर थाना प्रभारी ने अपना हस्ताक्षर कर दिया था। साथ ही आरोप पत्र पर रीतु राज एवं अनुसंधान कर्ता राकेश कुमार रंजन का हस्ताक्षर एवं पदनाम तथा दिनांक प्रथम दृष्टा देखने से एक ही व्यक्ति का प्रतीत होता है।

    इससे स्पष्ट है कि थाना प्रभारी ने अनुसंधानकर्ता का भी हस्ताक्षर कर दिया है या फिर अनुसंधानकर्ता ने खुद थाना प्रभारी का हस्ताक्षर का कूटकरण किया है। यदि जाँच में यह सही पाया जाता है तो पुलिस की कार्यशैली पर एक गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा होना लाजमि है।

    जारी आदेश में यह भी उल्लेख है कि पूर्व में आयोजित सेमिनार में तथा अनेक बार लिखित रुप से सभी थाना प्रभारी, अनुसंधानकर्ता को यह निर्देश दिया जा चुका है कि  राजपत्रित पुलिस पदाधिकारी ही किसी आरोप पत्र, कांड दैनिकी, प्राथमिकी एवं अन्य कागजातों पर लघु हस्ताक्षर कर सकते हैं। अराजपत्रित पुलिस पदाधिकारी द्वारा आरोप पत्र एवं प्राथमिकी पर लघु हस्ताक्षर विधि नियमाकुल नहीं है। विशेषतः अपने से वरिष्ठ पदाधिकारी से किसी भी करह का पत्राचार करने अथवा रिपोर्ट समर्पित करने पर कनिष्ठ अधिकारी को पूर्ण हस्ताक्षर करनी चाहिए।

    बहरहाल, जिला किशोर न्याय परिषद के प्रधान दंडाधिकारी मानवेन्द्र मिश्र ने न्यायालय के प्रति जिम्मेवार पुलिस अफसरों की एक बड़ी लापरवाही या कहिए न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करने का एक बड़ा मामला पकड़ी है, जो अमुमन अभियुक्तों के बचाव के लिए तिकड़म भिड़ाई जाती है। अब इस मामले पर नालंदा एसपी की कार्रवाई और 48 घंटे के भीतर खुद कोर्ट में दी गई सफाई देखने लायक होगी।