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    सरकारी स्कूलों-कार्यालयों से खिसक रहे हैं समाचारपत्र-पत्रिकाएं

    गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए समाचार पत्रों का वाचन अनिवार्य किया गया था।कई सरकारी स्कूलों में इसकी शुरुआत भी हुई। इसका उद्देश्य छात्र-छात्राओं को प्रत्येक दिन अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय, प्रांतीय तथा क्षेत्रीय खबरों का वास्तविक ज्ञान परोसना था। लेकिन बाद में यह चार दिन की चांदनी बन गई....

    “नहीं शेख साहिब की वह आदत

    वजू की ओर मुनाजाते सहर की

    मगर वो चाय पीकर हस्बे दस्तूर

    तिलावत करते हैं वह … की”

    अकबर इलाहाबादी का यह शे’र बताता है कि शेख साहब कुरानशरीफ के पाठ के पूर्व समाचार पत्र पढ़ते हैं। समाचार पत्र समाज का वास्तविक थर्मामीटर होता है…

    चंडी (नालंदा दर्पण)। लोकतंत्र में समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं का काफी महत्व होता है। जब रेडियो और टेलीविजन का ज्यादा जोर नहीं था, तब समाचारपत्र ही ज्यादा लोकप्रिय था और आज भी है।

    समाचार पत्र केवल समाचार अथवा सूचना ही प्रकाशित नहीं करते, बल्कि उसमें अलग-अलग विषयों के लिए अलग-अलग पृष्ठ और स्तंभ होते हैं।

    कहते है कि एक व्यक्ति जो अखबार नहीं पढ़ता है, वह जीवन में बहुत सी चीज़ों से वंचित रह जाता है। वह चीजों की संख्या के बारे में अनभिज्ञ रहता है। जबकि एक व्यक्ति जो नियमित रूप से अखबार पढ़ता है, वह अधिक जानकार और आश्वस्त हो जाता है।

    न केवल छात्रों, व्यापारियों और कामकाजी पेशेवरों, अखबार को जीवन के हर क्षेत्र से जुड़े लोगों द्वारा पढ़ा जाना चाहिए। इसमें सभी के लिए कुछ न कुछ उपयोगी है। यह स्वयं को व्यस्त रखने और एक ही समय में ज्ञान प्राप्त करने का एक अच्छा तरीका है।

    एक समय समाचार पत्र तथा विभिन्न प्रकार की पत्रिकाएं स्कूलों में और सरकारी कार्यालयों में आया करता था। छात्रों से लेकर शिक्षकों तथा कर्मचारियों से लेकर अधिकारी तक अपने कार्य की शुरुआत अखबार पढ़ने के बाद ही करते थे।

    लेकिन आज अचानक सरकारी स्कूलों, कार्यालयों से समाचार पत्र दरकिनार होते जा रहे हैं। पत्रिकाएं तो पहले ही रुखसत हो चुकी है।

    सर्वेक्षण से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक इस बात का खुलासा स्पष्ट दिख रहा है कि चंडी जैसे कस्बाई इलाके के सरकारी शिक्षण संस्थानों, निजी दफ्तरों, सरकारी अर्द्ध सरकारी कार्यालयों में दैनिक समाचार पत्रों की आवक अब नहीं के बराबर है। कहीं-कहीं तो गदहे के सींग सरीखे दिख रहें हैं।

    जबकि बिहार की वर्तमान सरकार ने सरकारी शिक्षण संस्थानों, कार्यालयों में इसके स्वागत सम्मान के लिए अपने अमली फरमान में दिनचर्या का आवश्यक हिस्सा बनाया था।

    गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए समाचार पत्रों का वाचन अनिवार्य किया गया था।कई सरकारी स्कूलों में इसकी शुरुआत भी हुई। इसका उद्देश्य छात्र-छात्राओं को प्रत्येक दिन अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय, प्रांतीय तथा क्षेत्रीय खबरों का वास्तविक ज्ञान परोसना था।लेकिन बाद में यह चार दिन की चांदनी बन गई।

    चंडी प्रखंड के सरकारी स्कूलों और कार्यालयों से अखबार वैसे ही  गायब हो चुका है जैसे शिक्षा व्यवस्था। चंडी प्रखंड मुख्यालय स्थित महज एक स्कूल में समाचार पत्र आने की जानकारी है।

    प्रखंड के रूखाई पंचायत के एक स्कूल में अखबार एक शिक्षक के माध्यम से आता था, लेकिन उसका पैसा प्रभारी प्रधानाध्यापक द्वारा वहन‌ नहीं किये जाने के कारण बंद हो गया।

    जबकि बताया जाता है कि अखबार भले स्कूलों में नहीं जाए, लेकिन अखबार के नाम पर फर्जी बिल के माध्यम से स्कूल से पैसे निकाला जा रहा है। सरकारी स्कूलों में पत्रिकाएं तो सालों पहले ही विदाई ले चुकी है।

    सरकारी स्कूलों में अखबार नहीं आने की वजह से छात्र-छात्राओं का सामान्य ज्ञान बिल्कुल कोरा है। आप चंडी प्रखंड के किसी भी सरकारी स्कूलों में जाकर वहां के विधार्थियों से देश के राष्ट्रपति, बिहार के राज्यपाल का नाम पूछ लीजिए, 90प्रतिशत से ज्यादा छात्र इसका सही जबाव नहीं दे पाएंगे।

    यहां तक कि शिक्षकों का सामान्य ज्ञान भी काफी कम मिलेगा। इन स्कूलों में पुस्तकालय भी मिल जाएगा, लेकिन वह  आलमारी में बंद पड़ा हुआ है। न तो उन पुस्तकों को पढ़ने में शिक्षकों की रूचि है और न ही वह बच्चों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

    यहीं नहीं चंडी प्रखंड के पड़ोसी प्रखंडों का भी यही हाल है। सरकारी कार्यालयों का भी यही हाल है।

    थरथरी प्रखंड के एक हॉकर की मानें तो थरथरी थाना में भी अखबार नहीं जाता था। लेकिन एक दिन नये थानेदार ने थाना में अखबार मंगाने की शुरुआत की है।

    चंडी प्रखंड के एक वरिष्ठ पत्रकार विनय भूषण पांडेय इस संबंध में कहते हैं कि “हम सब ने पश्चिम देशों की नकल करके कम्प्यूटरीकृत संयंत्रों का द्श्यावलोंकन तो सीख लिया है। लेकिन इसका दुष्प्रभाव सामने है। रेडियो एक्टिव तरंगों के प्रभाव के कारण दृष्टि दोष एवं पक्षियों का विलुपन हमारे सामने है। विकसित शिक्षित राज्यों में रीडिंग हैविट बनाए रखने के लिए यूथ क्लब, कला-संस्कृति मंच, बालमंच का गठन किया गया है।”

    चंडी प्रखंड में सार्वजनिक पुस्तकालय-वाचनालय ,खेल एवं कला संस्कृति का घोर अभाव है। यहां के लोगों में बौद्धिक चेतना का बिल्कुल अभाव है। कहने को हर पंचायतों में पंचवर्षीय सत्र में करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं। लेकिन राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों, पंचायत प्रतिनिधियों की अरुचि का मातम यह है कि किसी भी पंचायत में पुस्तकालय-वाचनालय, पुस्तकों की उपलब्धता पिछले 21 सालों में नहीं हुआ है। लेकिन राशि डकारने का हूनर इनके पास अवश्य है।

    चंडी प्रखंड के स्कूलों, विभागों, कार्यालयों के वार्षिक बजट में दिनानुदिन वृद्धि होती रही है। हर कार्यालय के लिए अतिरिक्त कंटीजेंसी का प्रावधान अक्षुण्ण है। फिर सरकारी स्कूलों, कार्यालयों में इस चौथे स्तंभ मुखर प्रहरी का अनादर का औचित्य क्या है?

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