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    मगही पान की फसल को नुकसान से बचाने के लिए जरुरी है ये सावधानी :एसएन दास

    इसलामपुर (नालंदा दर्पण)। इसलामपुर मगही पान अनुसंधान केंद्र के प्रभारी एसएन दास ने कहा है कि बदलते मौसम में मगही पान उपजाने वाले कृषकों को सावधानी बरतना अतिअवश्यक है। ताकि फसल सही सलामत रह सके।

    उन्होंने बताया कि मौसम विभाग द्वारा बिहार में तीन दिनों तक लागातार वर्षा होने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। इससे अत्याधिक सापेक्षिक आद्रता और कम तापमान रहेगी। इन हालत में पान गलन नामक फफुंद जनित रोग लगने की समस्या हो सकती है।

    इससे निपटने के लिए कृषको को ठोस कदम उठाना जरुरी है। इस दौरान पान में सिंचाई नहीं करें और पान की खेती में जल निकासी का व्यावस्था कर ले। किसी हाल में जलजमाव नहीं होनी चाहिए।

    श्री दास ने आगे कहा कि वर्षा थमने के उपरांत व्रोडो मिश्रण (0.5 % ) पान की लतर पर और (1%) अतरे मेढ पर छिडकाव करें। या कॉपर औक्सीक्लोराइड की 0.25% ( 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर) छिड़काव करें।

    इन दवा को 15 दिन के अंतराल पर 3 बार छिड़काव करें और सड़े हुए पत्तियां व पूर्णत: गले हुये पौधे को वरेजा से बाहर कर देना चाहिए।

    पद गलन एंव पत्ती गलन रोग व रोग कारक: फाइटोप्थोरा, पैरासिटिका, किस्म पाइपरीना (फफुंद या फदक)

    लक्षण: वर्षा उपरांत पान के बेल के नीचले हिस्से में गलन, जो मिट्टी के संपर्क में होता है। तदनुपरांत पान  के बेल के नीचले से उपर की तरफ पत्तियां का गलना भुरे एंव काले रंग के गोलाकार धव्बे पत्तियां के किनारे और बीच में होना।

    रोग का समय जून से सितम्बर माहः अत्याधिक नमी और जल जमाव कारण रोग तेजी से फैलता है। वरेजा निर्माण के समय जल निकासी का उत्तम प्रबंध अति आवश्यक है। मृदा जनित बीमारी की वजह से तीन वर्ष तक फसल चक्र का अपनाना।

    मृदा उपचारः  वरेजा के अंदर पान के कलमों को लगने से पहले मृदा को व्रोडो मिश्रण ( 1%) या कॉपर आक्सी क्लोराइड (0.25 % ) के घोल से उपचारित करना चाहिए। या जैव नियत्रंण ट्राइकोडर्मा विरडी या हरजियेनम 5 किलो या सरसों की खल्ली वर्मी कमपोस्ट सूखे गोबर के साथ मिट्टी में उपचारित करना चाहिए।

    पान कलम का उपचारः  (0.5%) ट्राइकोडर्मा विरिडी हरजियेनम + ( 0.5%) सिम्डोनोनस प्लुरेसेन्स के घोल में या मेटालेक्सिल, क्रावेन्डाजिम,के घोल मे 30 मिनट तक डूबाने के बाद रोपण करना चाहिए। इस प्रकार की विधि व उपचार करने से पान कृषकों नुकसान से बचाव हो सकता है।

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