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Thursday, September 16, 2021
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    संदर्भ हरनौत विस चुनाव: बगल वाली जान मारेली !

    नालंदा दर्पण/चुनाव डेस्क।  “कानवा में सोभे बाली, जुड़ा पे लगा के जाली

    चाल चलेली मतवाली, बगल वाली जान मारे ली

    बगल वाली जान मारे ली, बगल वाली जान मारे ली….”

    कभी बिहार में इस भोजपुरी गाने की काफी धूम रही है। वैसे भी बगल वाले की एक खासियत होती है कि जिसे बगल में जगह दीजिये, वहीं आपको बगल कर देगा।

    फिर बगल का अपना अलग महत्व भी है। वाहन में बगल बैठने का मजा ही कुछ और होता है। ऐसी जगह मिल जाए तो हर समय बगल वाला तरसता ही रह जाता है।

    मेरा एक शागिर्द था। उसे बगल में जगह दिया तो वह मुझे बगल कर दिया। वैसे राजनीति में भी बगल वाले खास होते हैं। राजनीति की दुनिया में बगल वाले कृतध्न होते हैं,ऐसा आप कहेगें।

    जिस किसी को कोई बगल में जगह दिया, वही उससे चिढ़ गया या उसे चित कर दिया। बगल वाला आपकी लाठी से ही आपको मार बैठेगा।

    कुछ ऐसा ही सीएम के गृह विधानसभा क्षेत्र की राजनीति में चल रहा है। यूं तो यहाँ 58 साल से बगल वाले से ही लड़ाई चल रही है। लेकिन पहली बार एक बगलवाली भी किस्मत अजमाने आ गई हैं।

    अब लड़ाई दो बगल वाले के बीच नहीं रही बल्कि एक और बगल वाली ने भी क्लाईमेक्स में एंट्री मार दी है। अब तीनों अपने बगल वाले को बगल करने में लगें हुए है।

    चूंकि अभी जो विधायक है, उनकी लड़ाई हमेशा बगल वाले से ही रही है। पहले पिता से, फिर उनके पुत्र से। बगल की लड़ाई चलती रही।

    यूं तो वे अब राजनीतिक संयास के इच्छुक हैं। लेकिन अपनी राजनीति की विरासत अपने पुत्र को सौंपना चाह रहें हैं। लेकिन राजनीति में सता पक्ष से एक बगल वाली भी चुनाव मैदान में टिकट के लिए मारामारी कर रही हैं।

    इससे बगल वाले विधायक के मंसूबे पर पानी फिरता दिख रहा है। उनका सुख चैन फिलहाल गायब है। अगर बगल वाला उनका पुराना प्रतिद्वंद्वी होता तो वे निपट भी लेते।

    इधर विधायक के बगल वाली टिकट के लिए कई बार आलाकमान से मिल चुकी है। उनके ससुर आलाकमान के काफी करीब रहे हैं। उनकी और पार्टी की सेवा करते रहें हैं।

    ससुर को तो आलाकमान ने टिकट नहीं दिया। मत दिया, लेकिन वह आलाकमान से गुहार लगा रही है, लेकिन मुझे तो दे दीजिए, आपके लिए कितनी रैलियां की, कितने सम्मेलन में महिलाओं और पुरुषों की भीड़ गाडि़यों में ठूस ठूसकर लाई।

    आपके लिए जिंदाबाद के नारे लगवायें। गांव-गांव ,घर-घर जाकर आपके कार्यो का प्रचार कर रही हूँ। आपकी पार्टी को मजबूत कर रही हूँ। मैं कोई झख मारने के लिये राजनीति में नहीं आई।

    निकालना है तो पार्टी से निकाल दो। मैं हार मानने वाली नही हूं। अब आलाकमान करें तो क्या करे। जैसे सबको आश्वासन दिये, इन्हें भी मिला। इसलिये वह चुनाव प्रचार में जोरशोर से डटी हुई हैं। सता पक्ष से उनकी उम्मीदवारी की चर्चा सबकी जुबान पर है।

    लेकिन बात यही पर खत्म नही होती है। विरासत में राजनीति वाले एक और बगल वाले भी ताल ठोक रहे है। उनका तो यहां से वर्षो पुराना नाता है। पिता पांच बार विधायक और मंत्री रहें। खुद दो बार बगल वाले को हरा चुके हैं।

    ऐसे में वे अपनी दावेदारी कैसे छोड़ दे। विरासत की लड़ाई कैसे भूल जाएं, वो भी बगल वाले से। ऐसा हो नहीं सकता। देखा जाए तो विरासत के उतराधिकारी बगल वाले ने राजनीति कम की। दल ज्यादा बदले।

    वैसे उनका शौक राजनीति है। कहते हैं कि राजनीति में उनके प्राण बसते हैं। उनका कहना ही रहा है, तुम यह न समझना कि तुमने टिकट नहीं दिया तो मेरी राजनीति खत्म हो गई।

    पिछले कई चुनाव से आलाकमन से टिकट मांग रहे है, लेकिन मिल नहीं रहा है। वे कहते हैं, अंधे को दिया, काने को दिया। एक मुझे ही टिकट देने के नाम पर अकाल पड़ गया। दादी-नानी मरने लगती है। तुम सब हरिश्चंद्र हो, एक मैं भुट्टा चोर।

    देखा जाएं तो उनका राजनीतिक जीवन ही बगावत की मिसाल रही है।बगावत उनका धर्म रहा है।वे अधर्म के रास्ते चल ही नहीं सकते।इसलिये अक्सर उनके हाथ बगावत का झंडा लहराता ही रहता है।उनके अनुसार बगावत सशक्त आत्मा का सबसे बड़ा हथियार है।

    हाथ से राजनीति की शुरुआत करने के बाद हाथ में मशाल थाम ली।इसी मशाल से बगल वाले को हराकर जीत भी गयें।लेकिन दो दशक पहले बगल वाले इनके ही बगल आ गये और राजनीति से बगल कर दिया।तब से वे बगावत का झंडा बुलंद कियें हुए हैं।कई राजनीतिक दल बदलें लेकिन दिल नहीं लगा।

    फिर से चुनाव की बिसात बिछ गई है। ऐसे में उनके अंतरात्मा ने फिर झकझोरा है।य ही मौका है। बगल वाले से बदला लेकर बगल करने की।

    फिर से सता के अलाकमान के पास संदेश भेज रहें हैं। प्रभु, बीस साल बाद तो टिकटवा वापस कर दो। ऐसे वैसे को दिया, एक बार मुझे भी दे दो! आलाकमन भी परेशान है, किसको दे! एक अनार और कई बीमार जो ठहरे! किसकी नाराजगी मोल ले! बगलवाली का क्या होगा!

    बगलवाली के उम्मीदवारी से आशंकित दोनों बगल वालों की नींद उड़ी हुई है। दोनों को लग रहा है, कहीं दोनों की राजनीति ही बगल न हो जाएं। अब मनोज तिवारी के सुर में दोनों गुनगुना रहें हैं, बगल वाली जान मारेली !

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