अन्य
    अन्य

      रिपोर्टर डायरी:  जिंदा रहे मेरा शहर !

      “रात की शाख पर उग आया है सन्नाटा

      खौफ़ के मंजर  बांट रहा है सन्नाटा”

      नालंदा दर्पण डेस्क / जयप्रकाश नवीन। किसी शायर की उपरोक्त पंक्ति रात की सन्नाटे को बयां कर जाता है। लेकिन यहां तो दिन में भी भयंकर सन्नाटा है।

      JAYPRAKASH NAVNरात अंदर ही अंदर गहरी हो रही है। इस समय मैं अपने एक मित्र के साथ हूँ। दोनों के पास बहुत कुछ कहने को है, लेकिन हमारी चुप्पी ही सब कुछ कह जाती है। सड़क पर गहरी चुप्पी है। इस चुप्पी को तोड़ बीच बीच में गुजर रहे लोगों के चेहरे पर चिंता की लकीरे साफ झलकती है।

      कोरोना का भय हर किसी के पीछे है। चलना और मौत। जैसे इस मौसम के दो ही मेटाफयर है। मौत की तरफ चलना या मौत की उल्टी तरफ भागना। उसे डर है कि वह जिधर जा रहा है, उधर कोरोना का दरवाजा तो नहीं। हर कोई एक दूसरे को शक और भय से देख रहा है।

      मेरा शहर चंडी ऐसा नहीं था। शहर को पिछले 35 सालों से देख रहा हूं। कभी इतना खामोश नहीं देखा था। यह खामोशी बहुत कुछ कहती है। यह सन्नाटा इतनी जल्दी जाने वाला नहीं है।

      “सन्नाटा बहुत कुछ कह जाता है

      बिना किसी आवाज के

      दर्द गहरा छोड़ जाता है”

      पिछले कुछ दिनों से मेरे शहर में दहशत का माहौल है। कब कौन ‌गुजर जाएं, कह नहीं सकते। किधर से कोई मनहूस खबर आ जाएं, सोचकर दिल कांप उठता है। मेरा शहर एक साल पहले ऐसा नहीं था। कोरोना का डर भले ही देश दुनिया में रहा हो, लेकिन हमारा शहर इस भयंकर महामारी से अछूता था।

      लेकिन इस बार स्थितियां विकट रूप धारण कर ली है। विकट, भयावह, मंजर है। आंखों के सामने पिता, पति, भाई जवान बेटे बिछड़ते चले जा रहे हैं और हम सब सिर्फ देख -सुन पाने के मजबूर हैं। सांसों के लिए बिलखता आज मेरा शहर। हर रोज किसी के जाने की खबर  अत्यंत पीड़ादायक है।

      हे! ईश्वर यह कैसा संकट है,कैसी परीक्षा है। इस वेदना को सहना कितना कठिन है। विशेषकर उनके लिए जिनके अपने खोते जा रहे हैं। इस तरह अनानास अपनों को खो देना कितना असहनीय है।

      हर गुजरता दिन कुछ और कमजोर कर देता है,उन ख्बाबों की जीने की आस को दिन दर दिन बढ़ती दूरियां कुछ और डरा जाती है। फिर न मिल पाने की आशंका से। हर ढलती शाम कुछ प्रश्न और आशंकाएं लिए गुजर जा रही है। रात डरावनी होती जा रही है।

      बच्चे भी नहीं समझ रहे हैं कि अचानक दौड़ती भागती दुनिया इतनी धीमी क्यों हो गई है। उन्हें समय नहीं देने वाले पिता दिनभर घर में क्यों रह रहे हैं।

      मैं रोना चाहता हूं, लेकिन ऐसा नहीं कर पाता। डर है कि रोऊंगा तो पत्नी और बच्चे उठ जाएंगे। उनकी हालत क्या होंगी। हमेशा एक डर मन में घर कर गया है। खुद को बेबस महसूस करता हूं।

      मैंने कुछ दिनों से किसी के साथ आमने- सामने बात नहीं की है।पहले मुझे लगता था अकेलापन कितनी सुंदर चीज है, लेकिन अब अकेलापन से कोफ्त होने लगीं है।सन्नाटा और अकेलापन काटने को दौड़ रहा है। लेकिन मैं अपनी शामें बिताना जानता हूँ। मैं उदासियों के कई मौसम से मिल चुका हूँ। अकेलापन आपको बहुत कुछ सीखाता है।सबसे ज्यादा यह कि “Hold everything dear”.

      “कभी पानी की तरह यादें बहती रही

      तो कभी सन्नाटे की लहरें गूंजती रही

      मालूम ना हुआ कब ये वक्त रेत की तरह

      फिसलता रहा

      जिंदगी क्या से क्या हो गई?”

      कुछ दिन पहले तक तो सड़क पर होली की हुडदंग थी। लोगों के चेहरे रंगों से सरोबार थे।

      कहते हैं हर सन्नाटे की गूँज होती है। जैसे चैती पछुआ हवे के झोके सन्नाटे को चीर रही है। शहर बंद है। सन्नाटा है। गलियां सूनी है। लोग हैं पर सड़को  पर सन्नाटा पसरा है। नुक्कड़ पर अब भीड़ नहीं लगती। चाय दुकानों पर राजनीति की चर्चा बंद है। चूडी मंडियों में रंग बिरंगी चूडियों का शोर नहीं है।

      चंडी बस स्टैंड सूना हैं। न गाड़ियों का शोर न ड्राइवर-खलासियों की चीख पोल। मीट -मछली की दुकानें आराम फरमा रही है। शायद मुर्गे और बकरियां भी राहत की सांस ले रही होगी। लेकिन बकरे की अम्मा कब-तक खैर मनाएगी।

      शायद यह वह भी जानती है।शहर का सन्नाटा कहीं तूफान आने का संकेत तो नहीं। अगर कुछ है तो सन्नाटे के बीच में स्वास्थ्य विभाग और पुलिस की गाड़ियाँ, जो सन्नाटे को चीरती लोगों को घरों में रहने की हिदायत दे रही है।

      निदा फाजली साहब सही फरमा गये हैं…

      “हर तरफ बेशुमार आदमी

      फिर भी तंहाईयो का शिकार आदमी”

      सात्र जैसे अस्तित्ववादी दार्शनिक मानते हैं कि एकाकीपन ही मानव जीवन का सार है।हर इंसान  अकेला दुनिया में आता है, अकेलेपन के साथ अपनी जीवन यात्रा को पूरा करता है। इसी अकेलेपन और शून्य के बीच वह जीवन का अर्थ ढूँढता है।

      आम आदमी का जीवन ही ऐसा है ।अपने अकेलेपन का बोझ लादे वह जीवन की ट्रेडमिल पर हांफते हुए दौडता है, रूकता हैं,फिर शुरू हो जाता है।’शबो रोज इसी तमाशे’ को वह जीता चला जाता है।

      कैफ़ भोपाली ने सही फरमाया है….

      “जिंदगी शायद इसी का नाम है

      दूरियां,मजबूरियां, तन्हाईयां

      लेकिन कहावत है, “Every cloud has a silver lining.” यानी हर मुश्किल या संकट की स्थिति का भी एक सकारात्मक या उम्मीद भरा पहलू होता है। प्यार बांटिए, संवेदनाएं बांटिए!उस दर्द को महसूस कीजिए जिनके अपने खोते जा रहे हैं। हम विवश हैं। जिन भी अलौकिक शक्ति में आपकी आस्था है उनसे प्रार्थना कीजिए,दुआ कीजिए।

      प्रार्थना में, दुआओं में अपार चमत्कार शक्ति होती है। जब कि सारे हाथ एक साथ ईश्वर का दरवाजा खटखटाते हैं तो वो जरूर सुनते हैं। क्रिया और प्रतिक्रिया सृष्टि का नियम है। विचारों में भी कंपन पैदा होते हैं और उनका असर भी होता है।

      संवेदनाएं जिंदा रखिये। सौ में से एक जीवन भी अगर आप बचा पाते हैं तो आपका मानव जीवन सार्थक होगा। इस समय शहर को जरूरत है हिम्मत की, संवेदनाओं की,मददगार हाथों की।

      यह हमारी विवशता है कि यह ऐसा संक्रमण है कि हम चाह कर भी भौतिक उपस्थिति देकर मदद नहीं कर पा रहे हैं। कम से कम सभी अपने शहर,अपने आस पास के लोगों की सुध भी रखें तो कई जीवन को बचाया जा सकता है…

      “इन घने अंधेरों के बीच,कोई दीया जरूर जलता मिलेगा

      मौसम कितना भी बेरहम हो,कोई फूल खिलता मिलेगा………”

      1 COMMENT

      LEAVE A REPLY

      Please enter your comment!
      Please enter your name here

      This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

      Related News