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    Wednesday, July 24, 2024
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      बड़े बेआबरू होकर निकले ‘मीडिया प्रत्याशी’ तेरे कूचे से !

      हरनौत से एक अदद टिकट की आशा में दिन रात एक कर देने वाली एक मीडिया प्रत्याशी मुखिया आए दिन दर्जनों मीडिया को बाइट देती रही ,उन्हे टीवी पर देखकर आलाकमान भी झेंप जाएं..

      चुनाव डेस्क / जयप्रकाश नवीन। ‘बड़े बेआबरू होकर निकले हम तेरे कूचें से’ राजनीति के लिए यह शेर ब्रह्म है। टिकट की आशा में लगा नेता को जब टिकट नहीं मिलता है तो बरबस उसके मुंह से यह शेर निकल जाता है।

      तीन अक्षर का टिकट अपने अंदर कितना आंधी-तूफान और सुनामी समेटे रहता है कि पूछिए मत। कहने का तात्पर्य यह है कि बड़े धोखे है राजनीति में।

      कुछ ऐसा ही हुआ नालंदा के हरनौत विधानसभा क्षेत्र में। यहाँ सताधारी दल से लगभग अर्धशतक नेता टिकट की टकटकी लगाए बैठे थे। कोई टिकट के लिए आलाकमान की नजर में आने के लिए मीडिया का सहारा ले रहे थे। तन-मन और धन से कुर्बान हो रहे थे।

      बस येन केन प्रकारेण मिल जाए यह अनमोल टिकट, फिर तो बस सारा जमाना हमारा।हर तरफ हरियाली ही हरियाली और बहारें चलायमान सी दिखने प्रतीत होते है।

      हरनौत से एक अदद टिकट की आशा में दिन रात एक कर देने वाली एक मीडिया प्रत्याशी मुखिया आए दिन दर्जनों मीडिया को बाइट देती रही ,उन्हे टीवी पर देखकर आलाकमान भी झेंप जाएं।

      अखबार से लेकर न्यूज चैनलों तक ये चर्चा आम थी कि इस बार टिकट मिलेगा तो हमें ही मिलेगा। कोई अबके टिकट लेकर चुनाव लड़ने का हक हमारा है। लेकिन जब उन्हे आश्वासन के बाद भी टिकट नही मिला तो उनके खेमें में मायूसी है। चर्चा है कि वे अब निर्दलीय चुनाव लड़ना चाहती है।

      ऐसे ही क्षेत्र में एक और मीडिया प्रत्याशी टपक बड़े वो भी कोरोना संकट में।जब क्षेत्र के नेता और कार्यकर्ता कोरोना में घरों में दुबके पड़े थें।वे अपने लाव लश्कर के साथ गांव गांव में मीडिया को लेकर सेनिटाइज करा रहे थे। मास्क वितरण कर रहे थे।

      अपने लाखों की सफारी वाहन को अपने राजनीतिक दल के चिन्ह से रंगे हुए प्रचार में रमें हुए थें।उन्हें दो सौ प्रतिशत विश्वास था उन्हें ही विपक्ष की ओर से टिकट मिलेगा। लेकिन उनका विश्वास मिथ्या साबित हुआ। जैसे ही उन्हें भनक मिली उनकी पार्टी ने यह सीट हाथ के हवाले कर दिया है।

      दौड़ें-दौड़े एक कद्दावर नेता की पार्टी में शामिल हो गये। टिकट भी प्राप्त कर लिया। अब बेचारे सोच रहे हैं खुद लड़े या बेटे को लड़ाए।सोशल मीडिया पर अपने समर्थकों से राय मांग रहें है।

      वैसे टिकट संग्राम के रणक्षेत्र में एक और नेता थे, जो राजनीतिक हाशिये पर चल रहे है।टिकट की जुगाड़ में वे ही जाने उन्होंने कहाँ-कहाँ, किस-किस पार्टी में सिंदबाद से भी ज्यादा लंबी यात्राएँ नहीं की,और अंतिम समय तक कर रहे हैं।

      पहले तो सता पक्ष में जुगाड़ भिड़ाई नहीं बनी तो अब दो और दलों में कोशिश कर रहे है। अन्य दलों में भी कुछ ऐसी ही स्थिति है।जिन्हे टिकट नहीं मिल रहा है वे दूसरे दलों की परिक्रमा कर रहें है।

      फिलहाल जिन्हे टिकट मिल गया है उनकी तो बल्ले-बल्ले और अच्छे दिनों का आभास हो जाता है और जिन्हे नहीं मिला तो इस क्रूर जालिम टिकट विरह में कोसना, दहाड़े मारकर रोना ही लिखा है।

      टिकट संग्राम के कुरूक्षेत्र में लूटे-पीटे और घायलों को आसानी से देखा जा सकता है। टिकट के दर्द की कराह और करूण रूंदन को महसूस किया जा सकता है।

      लोकतंत्रीय मेले यही कहना पड़ जाता है कि ‘हाय टिकट! आह टिकट! साथ ही साथ वाह टिकट!, यकीनन तू है बड़ा महाविकट।

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