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    मुहाने नदी को ऐसे अतिक्रमण मुक्त करने के पीछे पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?

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    हर शाख पर उल्लू बैठा हुआ है, अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा”  शौक बहराइची की यह पंक्तियां आज चंडी में सटीक बैठ गई है। कहने को चंडी प्रखंड में समाजवाद रहा है। वर्षों से लोग यहां भाईचारे और प्रेम के साथ रहते आएं हैं। लेकिन यहां के कथित नेताओं के मुखौटे के पीछे के चेहरों पर छाई कुटिल मुस्कान जनता को भीतर तक परेशान करती रही है

    नालंदा दर्पण डेस्क: कहते हैं आंचल के आगोश में सुकून मिलता है। लेकिन सीओ आंचल मंगलवार को जनरल डायर बनकर रोजी-रोटी कमा रहे दर्जनों यतीमों का आशियाना उजाड़ने में उनकी हाथ भी नहीं कांपे। इतिहास की वह तारीख जब इसी दिन जालियांवाला बाग हत्याकांड हुआ था। यहां के इतिहास में भी दर्ज हो जाएगा।

    कोरोना महामारी के बीच गरीबों के आशियाने उनकी दुकानें तोड़ने की जरूरत महलों में रहने वाले लोगों और नेताओं का सम्मान है या फिर राजनीति के भयावह आडंबर से ज्यादा कुछ नहीं है।

    कोरोना की मार झेलने के बाद चंडी के मुहाने स्थित बाजार थोड़ा सजीव हुआ ही था कि छुटभैये नेताओं को खुजली शुरू हो गई। आनन फानन में लोक शिकायत से परमिशन प्राप्त कर लिया। परमिशन देने वाले बाबू भी शायद इनके ही करीबी जो ठहरे।

    जब चुनाव लड़ना होता है तो हाथों में यश‌ पताका लबो पर उनकी सेवाओं की कीर्ति गाथा,मगर जब लोगों पर विपत्ति आती है, मानवता पुकारती है,वे ढूंढें नहीं मिलते है। ऐसे में श्लाका कवि मुक्तिबोध के शब्दों में कह सकते हैं, बताओ पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?

    कुछ यही सवाल चंडी की जनता इन कथित नेताओं से कर रही है जो चंडी को क्षणिक लाभ के लिए खंडहर बना देना चाहते हैं जो कहां तक तर्कसंगत है। वो भी संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर की जयंती के एक दिन पूर्व।

    चंडी के सवा दो सौ वर्ष के इतिहास में यही पहली ऐसी घटना है, जब एक नदी को अतिक्रमण मुक्त करने के नाम पर पूरे बाजार को जमींदोज कर दिया जाए। मुहाने नदी के किनारे बसे फुटपाथी दुकानदारों के दुकानों पर बुलडोजर ही नहीं चला। उनके परिवार के भरण-पोषण का सबंल भी खत्म हो गया।

    दुकानदार बिलखते रहे, उनके परिवार के बच्चों की आंख केआंसू सूख गए लेकिन समाज के नेताओं ने उनके मुकद्दर के मुस्तकबिल के बारे में सोचने की जहमत भी नहीं समझी। हमारे हुक्मरान देश को चमचमाता बताते हैं। उसी चमचमाते देश के एक छोटे से कस्बे के गरीबों के दुकान, रोजी-रोटी का आधार ही नहीं आशियाना भी उजड़ता जा रहा है।

    चंडी के तमाम अधिकारी, अपनी राजनीति चमकाने वाले नेता इन गरीबों, बिलखते बच्चो की पुतलियों से आंख मिलाकर, अपनी छाती पर हाथ रखकर कह सकते हैं कि देश की चौहद्दियों पर तुम्हारा भी अख्तियार है।

    उजड़े हुए दुकानदारों की रात आंखों में ही कट गई। हर आंखों में दहशत का मंजर, परिवार के भरण-पोषण,बूढ़े माता-पिता की दवाई, बच्चो की पढ़ाई और न‌ जाने घर गृहस्थी के कितने ख़र्च कैसे पूरा होगा।

    हर शख्स को रोज़ी रोटी की चिंता अंदर ही अंदर सता रही है। मछली बिक्रेता शमशेर आलम जिनके अब्बा भी यही मछली बेचा करते थें उसका दुकान मुहाने की भेंट चढ़ गया। परिवार के साथ भाईयों का भरण पोषण कैसे होगा,समझ नहीं पा रहे हैं।

    पहले तो भगवानपुर पुल के पास से हटाया। जब अन्य आशियाना लगाया तो यहां से भी दूध की मक्खी की तरह हटा दिया। उफ़ तक करने का मौका नहीं मिला।

    इसके अलावा वर्षों से गुजर बसर कर रहे सतीश कुमार, सुरेन्द्र तांती, मुकेश पान दुकान, राजाराम पान दुकान, बिजेंद्र ठाकुर का सैलून दुकान, संतोष कुमार का मिठाई दुकान, उनके भाई बिगुल का जूस दुकान, आनंद जायसवाल का किराना दुकान हो या फिर सुरेश माथुरी की मिठाई दुकान, देखते-देखते अस्तित्व हीन हो गई।

    वहीं पचास साल से रह रहे अखबार हॉकर लक्ष्मी प्रसाद पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। इतने बड़े परिवार को कहां लेकर जाएं। सोचकर आंखों के सामने अंधेरा छा जा रहा है। अब सबका सहारा तो उनके लिए उपर वाला है। नीचे वाले ने तो इनके जीवन-यापन का सहारा ही छीन लिया।की घरों में रात का चूल्हा भी नहीं जला।

    यह अतिक्रमण अभियान नहीं गरीबों को हटाओ अभियान उनके लिए है। उन सब का यह दर्द कहर से भी ज्यादा है। रोजमर्रा कमाने वाले क्या खाएंगे। सब के पेट पर लात मार दिया गया। उनके आशियाने को जनरल डायर की तरह रौंद डाला। न्याय हमारे जूते के तले के नीचे है। तुम वहीं करो जो हम चाहते हैं।

    विक्रम संवत और पाक महीने रमजान के पहले ही दिन आशियाने उजाड़ने से पहले तंज जिंदगी में जी रहे लोगों के पुनर्वास की व्यवस्था क्यों नहीं की गई। अच्छा तो होता इन जिल्लत जिंदगी जी रहे लोगों के लिए अपने निवाले एक कौर निकाल देते।

    बेईमानी से अर्जित अकूल दौलत से दो धूर ठौर इनके लिए भी कहीं दे देते। आखिर सफेद कुर्ता पायजामा में कब तक काले करतूतों को छिपाये घूमोगे। इनकी भी तो अंतिम क्रिया होनी ही है।

    तूने क्या नहीं किया। समाजसेवा और इमानदारी से कोसों दूर रहे। आज मुंह छुपा कर पीठ पीछे छुरा क्यों मारते हो। समूचा मुहाने, यत्र-तत्र सरकारी जमीन पर कब्जा जमाये हुए हो,बापू हाईस्कूल का अगूती कहां गया? उपले बनाने वाली आज गुरूआईन बनी हुई है।

    चिकित्सा सेविका, रोगी सेविका बनकर हजारों रुपए प्रतिमाह डकार रही है लेकिन तुम्हारी नज़र नहीं जाती है। जैसे लगता है धृतराष्ट्र के वंशज हो, हमारी डकार से तुम्हें उबकाई आने लगती है।

    जब जब हम सभी डकारते है, तुम्हें वमन होने ही लगता है। कह दो हम मजलूमों, यतीमो, दीनो को अलग हो जाओ। लेकिन तुम्हारे बड़े भाई ने चंडी की गरिमा का मान मर्दन किया, इसका फाक किया।

    तब तुम्हारी घिग्घी बंध गई। तुम्हें कंठा सा रूक हो गया। एक बार भी चिल्लाये कि चंडी को बसाने का काम हमारे बाप दादाओं ने किया। वास्तव में तुम्हारी पतलून गीली हो गई थी। बिना उफ़ किये सब बर्दाश्त किए। दलितों-पिछड़ों के मसीहा बनने वाले तुम इनके ही अड़ंगे बने हों।

    कौन सा सुकर्म, कुकर्म तुमसे अछूते हैं। बताओ तो सही ब्लाक के झाडूबदार से लेकर दफ्तर के बाबू साहब तक के ओहदे को कलंकित किया है। और अब हक गरीबों के निवाले छिनने, पेट में लात मारने के ठीके भी अख्तियार कर लिए।

    हम लोग पेट भर रहें थे, तुम सब बैंक बैलेंस। फिर भी तुम्हें अपच हो गई। पहले हमारे पेट पूजा को सेटल करते फिर दिल में जल रहें आग को घी देते। इस महामारी में हम सूरत, पंजाब, चेन्नई से भूखे लौटे थे।

    अब घर से कहां जाएं। पहले तो वहां की सरकार भूखों मरने के लिए छोड़ दी। घर वाले भी इतने दिल जले हो गये, मेरे बसे बसाये आशियाने, रोजगार-धंधे को अकारण वीरान कर दिये।

    तुम गरीबों के हमदर्द नहीं हो सकते। गरीब तुम्हें अपना हमदर्द मानते आएं थे। इस कुकृत्य ने फिर हमारे तुम्हारे बीच खाई पैदा कर दी है। तुम नहीं चाहते हो कि हम तुम्हारा प्रतिस्पर्धी बनें।दूध पानी भले मिल जाए। घी और पानी से मिलाप नहीं हो सकता।

    नहीं तो आज हम भी बड़े गले चिघाड़ते-ठीकेदारी में हिस्सा दो, नौकरी मेरे नाम करों, योजनाओं का सारा लाभ हमें दो, बैंकों का रूपये भी दो। कर्ज में न सही फर्जी नाम से केसीसी, आवास लोन, परिवहन लोन दो, सरकारी कार्यालयों, थाने में दलाली का हक दो।

    आखिर इस जुल्म का अंत कब होगा, अच्छा तो होता तुम्हारे राज में कहीं कुछ करने के पहले अनुमति की व्यवस्था होती। फिर हमारा पाया और काया नहीं ढ़हता।अपने हित में तुमने अपार्टमेंट-कंपार्टमेंट तक रिजर्व करवा लिए। हमारे लिए तो दो हाथ फुटपाथ भी असुरक्षित हैं।

    तुम्हारे कुटिल चालों का ही तो कमाल है तुम मालामाल हो -हम कंगाल हैं। हमें तुम कब खुशहाल देखना चाहोगें। शायद कभी नहीं जब जब पांव पसारने की सोचते हैं। पांव के नीचे से जमीन खिसका देते हो। मेरी जमीर ही क्या है।

    अब हम अपने पांव पर खड़ा नहीं हो सकते हैं। तुम्हारी यही इच्छा है। तुम्हारे शहर में कुछ भी ठीक नहीं है। वह तुम्हें दिखाई नहीं देगा। सबका सत्यानाश कर रखे हो। न स्कूल ठीक, न अस्पताल न व्यवस्था। गोईठा ठोकने वाली गुरुआईन, अस्पताल की परिचारिका,

    कलाल तो तुम स्वयं बन बैठे हो। दारू के नाम पर दोहरी मार है। दो सौ की बोतल हजार में, पीने पर अनगिनत सौ मार अलग। किसके बलबूते जिसमें। तुम मुर्दे की जगह भी हथियाए हो। जान लो तुम्हारी यह क्रूरता सता के सहारे सितम ढ़ाह सकता है। मगर अंत बुरा होता है।

    फिर भी तुम्हारी नादिरशाही के खिलाफ स्वर मुखरित करते रहेंगे। अपनी जान का नजराना भी पेश करने को तैयार रहते हैं।

    अंग्रेजी हुकूमत की कहानियां भी तेरे आगे पानी पानी हो जाती है। इस दौर के आगे,इस दस्तूर के आगे। क्या इससे ज्यादा जालिम होते होंगे गोरे सिपाही। चंडी बाजार के लोगों की सिसकियों पर एक चुनी हुई सरकार और उसके नुमाइंदे, उसके अधिकारी की तनी हुई संगीनों से ज्यादा बर्बर, ज्यादा बेहया, ज्यादा बुजदिल ख्याल और क्या हो सकता है।

    गरीबों को अपने न्याय की धौंस देकर ये बूटो के जोर पर दबाते हैं। तुम किसके साथ हो हुकूमत के साथ या मजलूमों के साथ या फिर शासन प्रशासन के फरमान के साथ तो बताओं पाटर्नर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? यह हम नहीं तुमसे श्लाका कवि मुक्तिबोध पूछ रहे हैं।

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