Home प्रशासन पांचवें दिन ही हटा क्लर्क का निलंबन, सवालों के घेरे में शिक्षा...

पांचवें दिन ही हटा क्लर्क का निलंबन, सवालों के घेरे में शिक्षा विभाग

Clerk's suspension removed on the fifth day, education department under question

बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण संवाददाता)। बिहार शिक्षा विभाग में भ्रष्टाचार का एक नया मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्षेत्रीय शिक्षा उप निदेशक पटना प्रमंडल कार्यालय द्वारा जारी एक आदेश के अनुसार लिपिक फणी मोहन को विगत 3 सितंबर को वित्तीय अनियमितताओं के आरोप में निलंबित किया गया था, लेकिन पांच दिन बाद ही 8 सितंबर को वे निलंबन से मुक्त कर दिए गए।

क्षेत्रीय शिक्षा उप निदेशक पटना प्रमंडल कार्यालय द्वारा जारी ज्ञापांक 1367 दिनांक 03.09.2025 के तहत फणी मोहन, जो उस समय लिपिक के पद पर कार्यरत थे, उन्हें वित्तीय अनियमितताओं के चलते निलंबित किया गया था। उनके खिलाफ भाउचर संख्या-26/2023-24, भाउचर संख्या-27/2023-24, और भाउचर संख्या-29/2023-24 में क्रमशः 1200, 500, और 130 रुपये की राशि यानि कुल मिलाकर 1830 रुपये की अनियमितता का आरोप था। यह राशि पटना कोषागार में जमा नहीं की गई थी, जिसके चलते विभागीय कार्यवाही शुरू की गई थी।

हालांकि मात्र पांच दिनों बाद दिनांक 08.09.2025 को जारी एक नए आदेश (ज्ञापांक 1396) के तहत फणी मोहन को निलंबन से मुक्त कर दिया गया। आदेश के अनुसार मोहन ने उक्त राशि को चालान संख्या-26788 दिनांक 08.09.2025 के माध्यम से कोषागार में जमा कर दिया और निलंबन हटाने के लिए अभ्यावेदन प्रस्तुत किया। क्षेत्रीय शिक्षा उप निदेशक राज कुमार ने इस अभ्यावेदन के आधार पर तत्काल प्रभाव से उनका निलंबन रद्द कर दिया।

इस त्वरित कार्रवाई ने कई सवाल खड़े किए हैं। पहला क्या इतनी कम राशि की अनियमितता के लिए निलंबन जैसा कठोर कदम उठाना उचित था या यह केवल दिखावे के लिए किया गया? दूसरा, यदि अनियमितता इतनी गंभीर थी कि निलंबन आवश्यक हो गया तो केवल राशि जमा करने के बाद बिना किसी गहन जांच के निलंबन को हटाना क्या उचित है? जबकि यह घटना विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार और ढीली-ढाली कार्यप्रणाली का स्पष्ट उदाहरण है।

नालंदा के एक स्कूल शिक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि ऐसे मामलों में छोटी राशि की अनियमितता को आधार बनाकर निलंबन किया जाता है, लेकिन बड़े घोटाले अक्सर दबा दिए जाते हैं। यह सब एक दिखावा है। उन्होंने आगे कहा कि निलंबन और उसका त्वरित निरसन यह दर्शाता है कि विभाग में गंभीरता की कमी है और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे।

क्षेत्रीय शिक्षा उप निदेशक कार्यालय के इस फैसले ने न केवल विभागीय कार्यवाही की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं, बल्कि यह भी संकेत दिया है कि छोटे स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई तो की जाती है, लेकिन बड़े अधिकारियों की जवाबदेही तय करने में ढिलाई बरती जाती है।

नालंदा के जिला शिक्षा कार्यालय में कार्यरत एक अन्य कर्मचारी ने बताया कि ऐसी घटनाएं कर्मचारियों के मनोबल को तोड़ती हैं और आम जनता के बीच शिक्षा विभाग की छवि को धूमिल करती हैं।

आदेश के अनुसार फणी मोहन वर्तमान में जिला शिक्षा पदाधिकारी नालंदा के कार्यालय में कार्यरत हैं। निलंबन हटाने के आदेश की प्रति जिला शिक्षा पदाधिकारी नालंदा/पटना, जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (स्थापना) नालंदा संबंधित कोषागार पदाधिकारी और स्वयं फणी मोहन को सूचना और आवश्यक कार्रवाई के लिए प्रेषित की गई है। लेकिन इस त्वरित कार्रवाई ने यह सवाल खड़ा किया है कि क्या विभाग ने अनियमितता की गहराई से जांच की या केवल औपचारिकता पूरी की गई?

बहरहाल, यह मामला शिक्षा विभाग में पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता को रेखांकित करता है। यदि छोटी राशि की अनियमितता पर भी इतनी जल्दबाजी में कार्रवाई और उसका निरसन हो सकता है तो बड़े स्तर के भ्रष्टाचार के मामलों में क्या स्थिति होगी, यह सोचने का विषय है।

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Exit mobile version