बेन (रामावतार)। दो हृदय या भावों के बंधन के रूप में जाना जाने वाला विवाह की रस्में आज पाश्चात्य संस्कृति में ढ़लती जा रही है। शादी में दुल्हा दुल्हन डोली न चढ़े यह पहले असंभव था। लेकिन आधुनिकता की दौर में डोली और कहार की जगह लग्जरी वाहनों ने जगह ले ली है।
सच कहा जाय तो शादी विवाह में गाई जानेवाली गीतों की प्रसांगिकता इतिहास के पन्नों में कैद होकर रह गई है। अब न तो डोली दिखता है और न हीं कहार। विवाह के अवसर पर अपनाई जाने वाली रस्में हो या फिर पुरानी संस्कृति, चारों तरफ हृास हीं हृास। यह आज भावो का बंधन न रहकर आर्थिक बंधन का एक उत्सव बन चुका है।
कभी इन पावन अवसर पर दादी मां द्वारा गाये जाने वाला आशीर्वाद रूपी गीत आज डीजे की उत्तेजक ध्वनि में गुम हो चुकी है। एक समय था, जब उनके द्वारा अयोध्या नगरी में अइल बरात, जनक नगरी में भेल शोर.., चलू-चलू चुमावन सखी आदि गीतों के बीच शादी की रस्में पूरी की जाती थी।
अब वे गीत कैसेटों एवं रिकार्ड में कैद एक धरोहर मात्र है। वह स्वच्छ एवं सर्वोच्च संस्कृति जो गांवों की गलियों में गूंजती थी। अब नहीं सुनाई देती।
कभी बैलगाड़ियों पर बारात जाने की वह परंपरा जिनमें बैलों के गले में बंधी घंटियां, वृक्षों पर बैठी चिड़ियों की बोल प्रा़कृतिक आनंद का एहसास कराती थी। लेकिन आज लग्जरी गाड़ियों की होड़ चल पड़ी है। दान शब्द से शुरू हुई यह परंपरा आज दहेज जैसे दानव का रूप अख्तियार कर चुकी है। परिणाम है कि दंपत्ति जोड़ों में रिश्ते की आस्था हिल रही है।
★ दुल्हा-दुल्हन तक सिमटी शादी: आज का पूरा वैवाहिक कार्यक्रम दुल्हा-दुल्हन तक के आपपास में सिमटता जा रहा है। विवाह के नये स्वरूप में वर और वधू पक्ष के रिश्तेदार एक दूसरे को नहीं पहचान पाते हैं।
पहले की तरह अब वर-वधू पक्ष के के लोगों का परिचय नहीं कराया जाता। जिसके कारण रिश्तेदारों की भूमिका धीरे धीरे घटती जा रही है।
हालात यह है कि दुल्हे तक को पता नहीं की कौन-कौन लोग पैर छूकर चले गए। यही कारण है कि आधुनिक शोर-शराबे के बीच गुम होती जा रही वैवाहिक परंपराएं। और वैवाहिक कार्यक्रम के दौरान निभाई जानें वाली अधिकांश रस्मों को भूलती जा रही युवा पीढ़ी।
