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पावाडीह सूर्यस्थल की प्राचीनता पर ASI की मुहर, कार्बन डेटिंग से खुलेगा रहस्य

राजगीर प्रखंड के पावाडीह गांव में स्थित सूर्यस्थल के अवशेषों का एएसआई ने किया निरीक्षण, 11वीं–12वीं शताब्दी की मानी गई सूर्य प्रतिमा

बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। नालंदा जिले के पावाडीह गांव में स्थित प्राचीन सूर्यस्थल अब इतिहास के पन्नों में और भी मजबूती से दर्ज होने जा रहा है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) पटना अंचल की टीम ने इस सूर्यस्थल का गहन निरीक्षण कर इसकी ऐतिहासिक महत्ता पर मुहर लगा दी है। अधीक्षण पुरातत्वविद् हरिओम के नेतृत्व में पहुंचे दल ने यहां मिली सूर्य प्रतिमा, स्थापत्य अवशेषों और निर्माण तकनीक का सूक्ष्म अध्ययन किया।

निरीक्षण के दौरान लगभग तीन फीट ऊंची सूर्य प्रतिमा को 11वीं-12वीं शताब्दी का बताया गया। अधीक्षण पुरातत्वविद् ने स्पष्ट किया कि यह भगवान सूर्य की प्रतिमा है, जिसमें दोनों ओर उषा और प्रत्यूषा की सजीव आकृतियां उकेरी गई हैं। प्रतिमा के मध्य भाग में सूर्यदेव के सारथी अरुण सात घोड़ों के साथ विराजमान हैं, जो इस प्रतिमा को विशिष्ट पहचान देते हैं।

स्थापत्य में कोणार्क की झलकः सूर्य प्रतिमा के समीप एक प्राचीन हवन कुंड का भी अवशेष मिला है। इसके साथ ही यहां पाए गए पत्थरों में इंटरलॉकिंग तकनीक देखी गई, जो कोणार्क सूर्य मंदिर के स्थापत्य से साम्यता रखती है। यह तथ्य सूर्यस्थल की कलात्मक और तकनीकी समृद्धि को दर्शाता है।

नालंदा से जुड़ते ऐतिहासिक सूत्रः स्थल से प्राप्त ईंटों को 5वीं शताब्दी का बताते हुए एएसआई अधिकारियों ने कहा कि ये ईंटें प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय में प्रयुक्त ईंटों से काफी मिलती-जुलती हैं। इससे पावाडीह सूर्यस्थल की प्राचीनता और ऐतिहासिक निरंतरता का संकेत मिलता है। ग्रामीणों के अनुसार सूर्यस्थल से पंचाने नदी तक सीढ़ियां बनी हुई थीं, जिनके अवशेष अब भी मिलते हैं।

खेतों में बिखरी विरासतः सूर्यस्थल परिसर और आसपास के खेतों में बड़ी संख्या में समूल व खंडित सूर्य प्रतिमाएं तथा अन्य हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां बिखरी पड़ी हैं। ग्रामीणों का कहना है कि खेती के दौरान आज भी प्राचीन मूर्तियां मिलती रहती हैं, जो इस क्षेत्र को एक खुले संग्रहालय का रूप देती हैं।

कार्बन डेटिंग से होगा काल निर्धारणः हालांकि एएसआई ने स्थल को अत्यंत प्राचीन माना है, लेकिन प्रतिमा और अवशेषों की सटीक काल-निर्धारण के लिए कार्बन डेटिंग की आवश्यकता बताई गई है। इससे सूर्यस्थल के इतिहास की सही समयरेखा सामने आ सकेगी।

संरक्षण पर जताई चिंताः निरीक्षण के दौरान अधीक्षण पुरातत्वविद् हरिओम ने सूर्यस्थल के आसपास फैली झाड़ियों और गंदगी पर चिंता जताई और ग्रामीणों से साफ-सफाई बनाए रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि स्थानीय सहभागिता से ही इस धरोहर को सुरक्षित रखा जा सकता है।

अन्य ऐतिहासिक स्थलों का भी मुआयनाः एएसआई टीम ने चंडी मौ स्थित मां चंडी मंदिर परिसर, चंडी मौ बौद्ध साइट तथा शुंगकालीन पुष्करणी सरोवर और उसकी सीढ़ियों का भी निरीक्षण किया। ग्रामीणों ने जानकारी दी कि यहां देश का पहला ग्रामीण संग्रहालय स्थापित है और बौद्ध साइट का उत्खनन पूर्व में एएसआई अधीक्षक मोहम्मद के. के. द्वारा कराया गया था, जिसके पुरावशेष पटना भेजे गए थे।

अधीक्षण पुरातत्वविद् ने कहा कि पावाडीह सूर्यस्थल और चंडी मौ के दोनों स्थलों का विस्तृत प्रतिवेदन तैयार कर उच्चाधिकारियों को भेजा जाएगा। ताकि इनके संरक्षण, उन्नयन और पर्यटन विकास की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकें।

स्रोत: मुकेश भारतीय / एएसआई / मीडिया रिपोर्ट्स

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