बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। बिहार सरकार द्वारा सरकारी अस्पतालों में संरचनात्मक सुधार और संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के दावे भले ही किए जा रहे हों, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। नालंदा जिले के 451 सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों की भारी कमी आज भी एक गंभीर चुनौती बनी हुई है।
इन अस्पतालों का संचालन महज 150 एलोपैथ डॉक्टरों के भरोसे हो रहा है, जिसके चलते मरीजों को समय पर उचित इलाज मिलना मुश्किल हो रहा है। विशेष रूप से स्वास्थ्य उपकेंद्रों (एचएससी) और हेल्थ एंड वेलनेस सेंटरों पर एक भी चिकित्सक की नियुक्ति नहीं की गई है, जिससे प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं भी प्रभावित हो रही हैं।
जिला मुख्यालय बिहारशरीफ स्थित सदर अस्पताल को मॉडल अस्पताल के रूप में विकसित किया गया है। यहां 240 बेड की क्षमता के साथ आधुनिक आधारभूत संरचना और चिकित्सा उपकरणों की कोई कमी नहीं है।
लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इस अस्पताल में केवल 24 डॉक्टर ही कार्यरत हैं। कई महत्वपूर्ण विभागों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति नहीं हुई है, जिसके कारण मरीजों को विशेषज्ञ चिकित्सा सेवाएं नहीं मिल पा रही हैं। इस स्थिति ने सदर अस्पताल की कार्यक्षमता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जिले के दो अनुमंडलीय अस्पतालों में केवल 23 डॉक्टर, तीन रेफरल अस्पतालों में 17, आठ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) में 33 और 12 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) में 27 डॉक्टर तैनात हैं। अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (एपीएचसी) की स्थिति और भी खराब है, जहां 48 अस्पतालों में केवल 21 डॉक्टर उपलब्ध हैं। स्वास्थ्य उपकेंद्रों और हेल्थ एंड वेलनेस सेंटरों में तो एक भी डॉक्टर नहीं है। इसका परिणाम यह है कि गंभीर मरीजों को प्राथमिक उपचार भी उपलब्ध नहीं हो पाता और उन्हें पीएचसी या सदर अस्पताल रेफर करना पड़ता है।
जिले में अस्पतालों का संचालन मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी (सीएमओ) की देखरेख में होता है, लेकिन डॉक्टरों की नियुक्ति का अधिकार राज्य स्तर पर होता है। इस वजह से कई बार विशेषज्ञ डॉक्टरों को सीएचसी या एपीएचसी जैसे छोटे केंद्रों पर तैनात कर दिया जाता है, जबकि सदर अस्पताल जैसे प्रमुख संस्थानों में केवल एमबीबीएस डॉक्टर ही उपलब्ध हो पाते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि डॉक्टरों की तैनाती का अधिकार जिला स्तर को दे दिया जाए, तो सीमित संसाधनों में भी बेहतर व्यवस्था सुनिश्चित की जा सकती है।
चिकित्सकों की कमी और संसाधनों की अनुपलब्धता का असर संस्थागत प्रसव पर भी पड़ा है। पिछले वर्ष की तुलना में इस साल जिले में संस्थागत प्रसव में 3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। यह स्वास्थ्य विभाग के लिए चिंता का विषय है। विभाग ने इस स्थिति में सुधार के लिए कवायद शुरू की है, लेकिन ठोस परिणाम अभी तक सामने नहीं आए हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में कमी का एक और बड़ा कारण दवाओं की अनुपलब्धता है। सदर अस्पताल में 100 प्रतिशत और शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (यूपीएचसी) में 91 प्रतिशत दवाएं उपलब्ध हैं। लेकिन अन्य अस्पतालों में स्थिति बेहद खराब है।
अनुमंडलीय अस्पतालों में 293 के बजाय केवल 256 प्रकार की दवाएं, रेफरल अस्पतालों में 283 के स्थान पर 240, सीएचसी में 290 के बजाय 248, पीएचसी में 277 में से 238, एपीएचसी में 187 में से 118, एचएससी में 32 के स्थान पर 24 और हेल्थ एंड वेलनेस सेंटरों में 187 में से केवल 107 प्रकार की दवाएं उपलब्ध हैं।
मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. जितेंद्र कुमार सिंह का कहना है कि जिले में वर्तमान में 150 एलोपैथ डॉक्टर और 77 आयुष चिकित्सक कार्यरत हैं, जो सामान्य बीमारियों का इलाज कर रहे हैं। उन्होंने जानकारी दी कि जल्द ही 35 नए डॉक्टरों की नियुक्ति होने वाली है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की उम्मीद है।
डॉ. सिंह ने कहा कि सीमित संसाधनों के बावजूद हम बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं। नए डॉक्टरों की नियुक्ति से स्थिति और बेहतर होगी।
