राजगीर (नालंदा दर्पण)। भारतीय रेलवे ने प्राचीन मगध और लिच्छवी साम्राज्य की राजधानियों को एक अनमोल तोहफा दिया है। वैशाली-कोडरमा बौद्ध सर्किट फास्ट पैसेंजर ट्रेन के रूप में यह नई रेल सेवा न केवल ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों को जोड़ेगी, बल्कि बौद्ध पर्यटन और क्षेत्रीय विकास को भी नया आयाम देगी।
यह ट्रेन 23 अगस्त 2025 से अपने निर्धारित समय पर रेल मार्ग पर दौड़ने लगेगी, जो सोमवार को छोड़कर सप्ताह के बाकी छह दिन मंगलवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार, शनिवार और रविवार को चलेगी।
यह फास्ट पैसेंजर ट्रेन वैशाली, राजगीर, नालंदा, गया, गुरपा और कोडरमा जैसे प्रमुख बौद्ध स्थलों को एक मजबूत रेल नेटवर्क से जोड़ेगी। खास तौर पर गुरपा स्टेशन के पास स्थित गुरुपद गिरि, जो भगवान बुद्ध से जुड़ा एक महत्वपूर्ण स्थल है। अब सीधे राजगीर, नालंदा और वैशाली से रेल मार्ग द्वारा जुड़ जाएगा। यह नई रेल सेवा बौद्ध और जैन धर्मावलंबियों के लिए एक वरदान साबित होगी, जो इन पवित्र स्थलों की यात्रा को और सुगम बनाएगी।
वैशाली-कोडरमा बौद्ध सर्किट फास्ट पैसेंजर का आने का समय- ट्रेन सुबह 5:15 बजे वैशाली से प्रारंभ होगी और हाजीपुर, सोनपुर, पाटलिपुत्र, पटना, राजेंद्र नगर टर्मिनल, फतुहा, बख्तियारपुर, बिहारशरीफ और नालंदा होते हुए राजगीर पहुंचेगी। राजगीर में पांच मिनट के ठहराव के बाद यह ट्रेन तिलैया, गया और गुरपा होते हुए दोपहर 3:15 बजे कोडरमा पहुंचेगी।
वहीं वापसी का समय- वापसी में यह ट्रेन शाम 4:45 बजे कोडरमा से रवाना होगी और शाम 7:50 बजे राजगीर पहुंचेगी। इसके बाद उसी मार्ग से रात 2:45 बजे वैशाली पहुंचेगी।
इस रेल सेवा से बौद्ध सर्किट के प्रमुख स्थलों तक पहुंच आसान हो जाएगी, जिससे देश-विदेश के पर्यटकों को इन ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों की यात्रा करने में सुविधा होगी। नालंदा और राजगीर, जो प्राचीन शिक्षा और बौद्ध धर्म के केंद्र रहे हैं, अब और अधिक सुलभ होंगे। गुरुपद गिरि जैसे कम चर्चित लेकिन महत्वपूर्ण स्थल भी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनेंगे।
यह रेल सेवा न केवल धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार और व्यापारिक गतिविधियों में भी वृद्धि लाएगी। स्थानीय दुकानदारों, गाइडों और परिवहन सेवाओं से जुड़े लोगों को इस ट्रेन के आने से लाभ होगा। इसके अलावा आम यात्रियों के लिए भी यह ट्रेन आवागमन का एक सुविधाजनक और किफायती साधन होगी।
इस ट्रेन के शुरू होने से न केवल प्राचीन मगध और लिच्छवी साम्राज्य की धरोहरें एक-दूसरे से जुड़ेंगी, बल्कि यह क्षेत्र की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को भी संरक्षित करने में मदद करेगा। बौद्ध और जैन धर्मावलंबियों में इस ट्रेन को लेकर खासा उत्साह देखा जा रहा है। यह रेल सेवा न केवल एक यातायात साधन है, बल्कि यह भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को विश्व पटल पर लाने का एक प्रयास भी है।
