राजगीर (नालंदा दर्पण)। ज्ञान, तप और अध्यात्म की पावन भूमि राजगीर एक बार फिर इतिहास रचने को तैयार है। 4 सितंबर को नवनिर्मित भूटान बौद्ध मंदिर के भव्य उद्घाटन समारोह के साथ यह प्राचीन नगरी वैश्विक मंच पर अपनी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान को और सशक्त करेगी। इस ऐतिहासिक अवसर पर भूटान के प्रधानमंत्री शेरिंग तोबगे मंदिर का उद्घाटन करेंगे।
इस समारोह में भारत और भूटान की कई प्रमुख हस्तियां शामिल होंगी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, केंद्रीय संसदीय कार्य एवं अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू, भारत में भूटान के राजदूत, कोलकाता स्थित भूटान वाणिज्य दूतावास के काउंसलेट जनरल, भूटान के मुख्य भिक्षु जे खेम्पो और भूटान में भारत के राजदूत सुधाकर दलेला उपस्थित रहेंगे।
इसके अतिरिक्त नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययनरत भूटानी विद्यार्थी भी इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बनेंगे। मंदिर के परियोजना निदेशक किनले ग्याल्त्शेन ने बताया कि उद्घाटन के बाद भूटान के प्रसिद्ध कलाकारों द्वारा रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाएगा, जो भारत और भूटान की सांस्कृतिक एकता को और प्रगाढ़ करेगा।
राजगीर भगवान बुद्ध की तपोभूमि और कर्मभूमि के रूप में विश्वविख्यात है। यह मंदिर भारत और भूटान के बीच सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंधों को और मजबूत करेगा। यह मंदिर न केवल आस्था का केंद्र बनेगा, बल्कि भारत-भूटान मैत्री, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और पर्यटन के लिए एक नया अध्याय शुरू करेगा।
किनले ग्याल्त्शेन ने कहा कि यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि शांति, करुणा और मानवता का संदेश देने वाला केंद्र होगा। यह राजगीर को बौद्ध तीर्थ स्थल के रूप में और अधिक आकर्षक बनाएगा। साथ ही पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा देगा।
मंदिर का निर्माण भूटान और बिहार सरकार के संयुक्त प्रयासों का परिणाम है। यह भूटानी जीवन-दर्शन ‘ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस’ पर आधारित है। उसे भारतीय जनमानस तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यह मंदिर न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और पर्यटन संबंधों को नई दिशा देगा।
मंदिर का निर्माण पारंपरिक भूटानी वास्तुकला शैली में किया गया है, जो अपनी अनूठी शिल्पकला के लिए जाना जाता है। मंदिर में लकड़ी की नक्काशी, रंगीन चित्रांकन और ऊंचे स्तूप जैसे शिखर इसकी शोभा बढ़ाते हैं।
मंदिर के गर्भगृह में भगवान बुद्ध की भव्य प्रतिमा स्थापित की गई है, जिसके चारों ओर भूटानी धार्मिक चित्रों (थांका पेंटिंग्स) और प्रतीकों से दीवारें सजाई गई हैं। मंदिर परिसर में प्रार्थना चक्र (प्रेयर व्हील्स), भिक्षुओं के लिए ध्यान स्थल और श्रद्धालुओं के लिए प्रार्थना कक्ष भी बनाए गए हैं।
वास्तुकला में लकड़ी, मिट्टी और पत्थर का संतुलित उपयोग भूटानी संस्कृति की झलक प्रस्तुत करता है। यह राजगीर के प्राकृतिक वातावरण के साथ पूर्ण सामंजस्य स्थापित करता है। यह मंदिर न केवल भूटानी शिल्पकला का उत्कृष्ट नमूना है, बल्कि पर्यटकों और तीर्थयात्रियों के लिए भी एक आकर्षण का केंद्र बनेगा।
इस मंदिर के उद्घाटन के बाद भूटान से तीर्थयात्रियों और पर्यटकों की संख्या में वृद्धि की उम्मीद है, जिससे राजगीर और नालंदा की वैश्विक पहचान और मजबूत होगी। यह स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन देगा और बिहार को बौद्ध पर्यटन के वैश्विक मानचित्र पर और सशक्त करेगा। भूटानी दर्शन और भारतीय अध्यात्म का यह संगम नई पीढ़ियों को शांति और करुणा का संदेश देगा।
यह मंदिर भारत और भूटान के बीच दशकों पुरानी मैत्री का प्रतीक है। यह दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और आर्थिक संबंधों को और गहरा करेगा। राजगीर में बना यह भूटान बौद्ध मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह संस्कृतियों, विचारों और मानवता को जोड़ने वाला एक सेतु भी है, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।
