नालंदा दर्पण डेस्क। नालंदा जिले के इस्लामपुर नगर क्षेत्र में स्थित दिल्ली दरबार को स्थानीय लोग प्यार से लाल किला भी कहते हैं। यह एक ऐसी भव्य इमारत है, जो अपने गौरवशाली अतीत और वर्तमान की बदहाली की कहानी बयां करती है। यह दो मंजिला संरचना कभी जमींदार चौधरी जहुर साहब की दूरदर्शिता का प्रतीक थी। लेकिन आज देखरेख के अभाव में जीर्ण-शीर्ण हो रही है। फिर भी इसकी दीवारें और गुंबद आज भी इतिहास के उन सुनहरे पन्नों को जीवंत करते हैं, जब यह इमारत इस्लामपुर की शान हुआ करती थी।
कहा जाता है कि जमींदार चौधरी जहुर साहब ने दिल्ली के लाल किले और लखनऊ की वास्तुकला से प्रेरित होकर इस भव्य इमारत का निर्माण करवाया था। अपने समय के सैर-सपाटों के दौरान उनके मन में यह विचार आया कि इस्लामपुर में भी एक ऐसी इमारत होनी चाहिए जो वैभव और शिल्पकला का संगम हो।
नतीजा था दिल्ली दरबार एक ऐसी संरचना- जिसमें 52 कोठरियां, 53 दरवाजे, एक धूप घड़ी, भूलभुलैया, नाच घर और एक तालाब जैसी सुविधाएं थीं। महल के ऊपरी गुंबद पर सुरक्षा पहरेदारों के लिए स्थान था, जहां से दूर-दूर तक नजर रखी जा सकती थी। यह इमारत न केवल एक आवास थी, बल्कि एक सांस्कृतिक और सामाजिक केंद्र भी थी, जहां लोग उत्सवों और समारोहों के लिए एकत्रित होते थे।
आज दिल्ली दरबार की वह भव्यता केवल कहानियों और यादों में सिमटती जा रही है। दीवारों पर समय की मार साफ दिखाई देती है। टूटी-फूटी खिड़कियां, जर्जर छतें और उजाड़ तालाब इसकी बदहाली की गवाही देते हैं। देखरेख के अभाव ने इस ऐतिहासिक धरोहर को खंडहर में बदल दिया है।
फिर भी इसकी भव्य संरचना और अनूठी वास्तुकला आज भी पर्यटकों और स्थानीय लोगों को आकर्षित करती है। दूर-दूर से लोग इसे देखने आते हैं, शायद इसलिए कि यह इमारत न केवल पत्थर और ईंटों से बनी है, बल्कि एक सपने और एक युग की कहानी कहती है।
दिल्ली दरबार केवल एक इमारत नहीं है। यह इस्लामपुर की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। नालंदा प्राचीन काल से ही शिक्षा और संस्कृति का केंद्र रहा है। यहां इस तरह की संरचनाएं हमें हमारे इतिहास से जोड़ती हैं। यह इमारत उस समय की याद दिलाती है कि जब जमींदारों के पास धन के साथ एक ऐसी दृष्टि भी थी, जो स्थानीय समुदाय को प्रेरित करती थी। आज भी यह संरचना स्थानीय लोगों के लिए गर्व का विषय है, भले ही इसकी स्थिति चिंताजनक हो।
दिल्ली दरबार की वर्तमान स्थिति को देखते हुए इसके पुनर्स्थापन की बात उठना स्वाभाविक है। यदि इस इमारत को फिर से उसकी पुरानी शान में लाया जाए तो यह इस्लामपुर में एक प्रमुख पर्यटक स्थल बन सकता है।
इसके भूलभुलैया, नाच घर और धूप घड़ी जैसे अनूठे तत्व पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र हो सकते हैं। साथ ही यह स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा दे सकता है। लेकिन सवाल यह है कि इस तरह के पुनर्स्थापन के लिए संसाधन और इच्छाशक्ति कहां से आएगी?
नालंदा दर्पण अपने पाठकों से अपील करता है कि वे इस ऐतिहासिक धरोहर को बचाने के लिए जागरूकता फैलाएं। दिल्ली दरबार केवल एक इमारत नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत का एक हिस्सा है। आइए, हम सब मिलकर इसकी बदहाली को रोकने और इसे भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षित करने का प्रयास करें। क्या आप इस मुहिम में शामिल होंगे?
