बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। नालंदा जिले में आशा कार्यकर्ताओं के चयन की प्रक्रिया अपनी सुस्त गति के कारण चर्चा का विषय बनी हुई है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (National Health Mission) के तहत जिले में 1103 आशा कार्यकर्ताओं का चयन किया जाना है, लेकिन एक माह बीत जाने के बाद भी मात्र 234 का ही चयन हो सका है। इस धीमी प्रगति ने स्वास्थ्य विभाग की चिंताएं बढ़ा दी हैं, क्योंकि आशा कार्यकर्ताएं ग्रामीण और शहरी समुदायों को स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने में अहम भूमिका निभाती हैं।
जानकारी के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 756 और शहरी क्षेत्रों के लिए 348 आशा कार्यकर्ताओं का चयन होना है। लेकिन वर्तमान में ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 182 और शहरी क्षेत्रों में मात्र 48 आशा का चयन हो पाया है।
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि पंचायतों के मुखिया और नगर निकाय के वार्ड पार्षद इस प्रक्रिया में रुचि नहीं दिखा रहे, जिसके कारण चयन की रफ्तार थम सी गई है। जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (डीपीएम) ने बताया कि स्वास्थ्य कर्मी लगातार जनप्रतिनिधियों से संपर्क कर रहे हैं, लेकिन ठोस परिणाम नहीं मिल रहे।
आशा कार्यकर्ता सरकारी कर्मचारी नहीं, बल्कि स्वयंसेविका होती हैं, जो अपने समुदाय का प्रतिनिधित्व करती हैं। उनका मुख्य कार्य सामुदायिक स्तर पर सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों की सेवाओं की जानकारी देना और लोगों को इन सेवाओं से जोड़ना है।
विभागीय दिशा-निर्देशों के अनुसार 1000 की आबादी पर एक आशा कार्यकर्ता का चयन किया जाता है। वर्तमान में नालंदा जिले में 2323 आशा कार्यरत हैं और इस चयन प्रक्रिया के पूरा होने के बाद यह संख्या बढ़कर 3426 हो जाएगी।
आशा कार्यकर्ता का चयन संबंधित टोला या वार्ड में आयोजित आम सभा के माध्यम से होता है। आवेदिका की न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता दसवीं पास होनी चाहिए और उम्र 18 से 40 वर्ष के बीच होनी चाहिए।
इसके अलावा आवेदिका का उसी टोला या वार्ड की निवासी होना अनिवार्य है। वह विवाहित, बहु या विधवा बेटी हो सकती है, लेकिन किसी सरकारी या अर्धसरकारी कर्मचारी की निकट संबंधी नहीं होनी चाहिए। समान योग्यता होने पर विधवाओं, अलग रह रही महिलाओं और प्रशिक्षित दाइयों को प्राथमिकता दी जाती है।
स्वास्थ्य विभाग ने सभी प्रखंडों और नगर निकायों को चयन के लिए दिशा-निर्देश भेज दिए हैं, लेकिन जनप्रतिनिधियों की उदासीनता के कारण प्रक्रिया अधूरी है।
एक स्वास्थ्य कर्मी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि कई बार जनप्रतिनिधि व्यस्तता का हवाला देते हैं तो कई बार वे इस प्रक्रिया को गंभीरता से नहीं लेते। इस स्थिति ने न केवल चयन प्रक्रिया को प्रभावित किया है, बल्कि जिले की स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने की दिशा में भी सवाल खड़े किए हैं।
स्वास्थ्य विभाग के सामने अब यह चुनौती है कि वह इस प्रक्रिया को कैसे गति दे। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि जनप्रतिनिधियों के साथ-साथ समुदाय में जागरूकता अभियान चलाकर इस प्रक्रिया को तेज किया जा सकता है। स्थानीय स्तर पर महिलाओं को इस भूमिका के महत्व के बारे में जागरूक करने और प्रोत्साहन देने से भी सकारात्मक बदलाव आ सकता है।
नालंदा जिले में आशा कार्यकर्ताओं का चयन न केवल स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए जरूरी है, बल्कि यह स्थानीय महिलाओं को सशक्त बनाने का भी एक अवसर है। यदि इस प्रक्रिया में तेजी नहीं लाई गई तो इसका असर जिले की स्वास्थ्य योजनाओं पर पड़ सकता है। क्या स्वास्थ्य विभाग और जनप्रतिनिधि इस चुनौती को समय रहते स्वीकार करेंगे? यह सवाल अब नालंदा की जनता के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
