राजगीर (नालंदा दर्पण)। नव नालंदा महाविहार सम विश्वविद्यालय नालंदा में पांच दिवसीय राष्ट्रीय पुस्तकालय मिशन के तहत सार्वजनिक पुस्तकालय कर्मियों के लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। यह कार्यक्रम 12 सितंबर तक चलेगा, जिसमें देश भर के पुस्तकालय कर्मियों को आधुनिक तकनीक और पुस्तकालय प्रबंधन के नवीनतम तरीकों से प्रशिक्षित किया जाएगा।
कार्यक्रम का उद्घाटन कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह, राष्ट्रीय पुस्तकालय मिशन के अतिरिक्त निदेशक एवं राजा राममोहन राय पुस्तकालय फाउंडेशन के महानिदेशक प्रो. अजय प्रताप सिंह, तथा परियोजना अधिकारी दीपांजन चटर्जी ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलन के साथ किया। उद्घाटन सत्र में राष्ट्रीय पुस्तकालय मिशन के इतिहास और इसकी कार्यप्रणाली को दर्शाने वाली एक प्रेरक डॉक्यूमेंट्री भी प्रदर्शित की गई, जिसने उपस्थित लोगों में ज्ञान और साहित्य के प्रति उत्साह जगाया।
इस अवसर पर प्रो. अजय प्रताप सिंह ने अपने संबोधन में प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय की महान बौद्धिक धरोहर को याद किया। उन्होंने कहा कि आक्रांताओं ने नालंदा के पुस्तकालय को नष्ट कर हमें हमारी जड़ों से दूर करने का प्रयास किया, लेकिन उसकी राख से उठा धुआं पूरी दुनिया को प्रभावित करने वाला था।
उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि नालंदा जीवित रहता, तो भारत को अपनी बौद्धिक श्रेष्ठता सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। प्रो. सिंह ने राष्ट्रीय पुस्तकालय मिशन के उद्देश्य को रेखांकित करते हुए बताया कि इसका लक्ष्य देश की सभी लाइब्रेरियों को आधुनिक तकनीकों से जोड़कर समाज और राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका को सशक्त करना है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने कहा कि नव नालंदा महाविहार का चयन इस आयोजन के लिए होना एक बौद्धिक खजाने का प्रतीक है। उन्होंने पुस्तकालय विज्ञान के जनक डॉ. एस. रंगनाथन को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनकी विरासत को प्रेरणा का स्रोत बताया।
कुलपति ने अपने संस्मरण में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पुस्तकाध्यक्ष एल. एमपी सिंह का जिक्र किया, जिन्हें ज्ञान का भंडार कहा जाता था। साथ ही उन्होंने हार्मनी बुक शॉप के राकेश कुमार का उदाहरण दिया, जिनकी इंडोलॉजी में गहरी समझ थी और जिनसे देश-विदेश के विद्वान विचार-विमर्श करने आते थे।
कुलपति ने पुस्तकालय कर्मियों से आह्वान किया कि वे अपनी भूमिका को पहचानें और नई पीढ़ी को पुस्तकों से जोड़ने का प्रयास करें। उन्होंने कहा कि पुस्तकालय केवल किताबों का भंडार नहीं, बल्कि समाज को ज्ञान से समृद्ध करने का केंद्र है।
कार्यक्रम का संचालन डीन स्टूडेंट्स वेलफेयर प्रो. विजय कुमार कर्ण ने किया। शुरुआत में देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय पुस्तकालय के पुस्तकालयाध्यक्ष एवं कार्यक्रम संयोजक डॉ. के.के. पाण्डेय ने अतिथियों का स्वागत किया। धन्यवाद ज्ञापन दीपांजन चटर्जी ने किया।
उम्मीद है कि यह पांच दिवसीय कार्यक्रम पुस्तकालय कर्मियों को डिजिटल युग में पुस्तकालय प्रबंधन, सूचना प्रौद्योगिकी और पाठक सेवाओं में नवाचार के लिए प्रशिक्षित करेगा। यह आयोजन न केवल नालंदा की बौद्धिक परंपरा को पुनर्जनन देगा, बल्कि देश भर के पुस्तकालयों को आधुनिक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।
