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राजगीर में सर्पाकार पर्वत की खोज का दावा: क्या यह दुनिया का सबसे बड़ा मानव-निर्मित नाग है?

Archaeological findings linked to Buddhist texts and ancient traditions near Vaibhargiri hills

राजगीर (नालंदा दर्पण)। पांच पहाड़ियों से घिरा प्राचीन राजगृह (वर्तमान राजगीर) एक बार फिर इतिहास और पुरातत्व की दुनिया में चर्चा का केंद्र बन गया है। हालिया शोध में जुटी एक टीम ने दावा किया है कि यहां वैभारगिरि के समीप एक विशाल सर्पाकृति चट्टान की पहचान की गई है, जो संभवतः दुनिया की सबसे बड़ी मानव-निर्मित नाग आकृति हो सकती है।

इस खोज ने न केवल बौद्धकालीन इतिहास की परतों को खंगालने का अवसर दिया है, बल्कि यह क्षेत्र को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने की संभावनाएं भी मजबूत कर रही है।

क्या है पूरा मामला? शोधकर्ताओं के अनुसार यह सर्पाकार चट्टान राजगीर के प्रसिद्ध गर्म कुंड से लगभग डेढ़ किलोमीटर पश्चिम, मार्क्सवादीनगर के पास उत्तर दिशा की ढलान पर स्थित है। पहाड़ी पर आधी चढ़ाई के बाद यह अद्भुत संरचना दिखाई देती है।

पहली नजर में यह चट्टान किसी विशाल नाग के फन जैसी प्रतीत होती है, जिसकी ऊंचाई करीब 70 फीट बताई जा रही है, जबकि चौड़ाई नीचे से 12 फीट और ऊपर फन के पास 15-16 फीट तक है।

प्राचीन ग्रंथों से जुड़ती कड़ियां: खोजकर्ता टीम के नेतृत्वकर्ता प्रो. ललन कुमार सिंह का कहना है कि इस स्थल की पहचान बौद्ध और पाली साहित्य के अध्ययन के आधार पर की गई है।

महापरिनिब्बान सुत्त, विनय पिटक और चुल्लवग्ग  जैसे ग्रंथों में सर्पशौंडिक पब्भार (पर्वत) का उल्लेख मिलता है। चौथी शताब्दी के आचार्य बुद्धघोष ने भी अपने ग्रंथ सारत्थपकासिनी में इसका जिक्र किया है।

इतना ही नहीं चीनी यात्री ह्वेनसांग, फाह्यान और इत्सिंग ने भी अपने यात्रा-वृत्तांतों में इस स्थल की खोज का प्रयास करने का उल्लेख किया है, हालांकि वे इसकी सटीक पहचान नहीं कर सके थे। वर्तमान शोध इसी ऐतिहासिक पहेली को सुलझाने का दावा करता है।

भगवान बुद्ध से जुड़ा आध्यात्मिक महत्वः शोध के अनुसार यह स्थल भगवान बुद्ध के प्रिय स्थलों में शामिल ‘सीतवन’ के समीप स्थित है। बौद्ध ग्रंथ संयुक्त निकाय के उपसेन सुत्त में वर्णन है कि यहीं भगवान बुद्ध ने अपने शिष्य उपसेन को उपदेश दिया था। कथा के अनुसार इसी स्थान पर सांप के डंसने से उपसेन का निर्वाण हुआ था। इस प्रकार यह स्थल केवल पुरातात्विक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि गहरे धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व से भी जुड़ा हुआ है।

क्या वास्तव में मानव निर्मित है यह चट्टान? शोध टीम के सदस्य और पुरातत्व के छात्र प्रिंस कुमार का दावा है कि यह पूरी तरह प्राकृतिक संरचना नहीं है। उनके अनुसार प्राचीन काल में इसे काट-छांट कर सर्प का आकार दिया गया था। चट्टान पर कटाव के निशान आज भी स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं, जो इसे मानव-निर्मित होने की ओर संकेत करते हैं।

विशेषज्ञ मानते हैं कि उस समय राजगृह में नागवंशी शासकों का प्रभाव था और नाग पूजा की परंपरा व्यापक थी। मणियार मठ जैसे पुरातात्विक स्थल इस परंपरा के साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। संभवतः इसी धार्मिक मान्यता के तहत इस विशाल नागाकार संरचना का निर्माण किया गया।

इतिहास, आस्था और पर्यटन का संगमः गृद्धकूट पर्वत, सीतवन और यह कथित सर्पशौंडिक पर्वत तीनों मिलकर राजगृह को बौद्ध धर्म का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनाते हैं। यहां बुद्धकालीन अनेक घटनाओं के घटित होने की चर्चा मिलती है।

यदि इस स्थल के दावों की वैज्ञानिक पुष्टि होती है, तो यह न केवल भारतीय पुरातत्व के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बौद्ध पर्यटन को भी नई दिशा दे सकती है।

अवसर और चुनौतियां: यह खोज जितनी रोमांचक है, उतनी ही जांच की मांग भी करती है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले विस्तृत पुरातात्विक सर्वेक्षण, कार्बन डेटिंग और भू-वैज्ञानिक अध्ययन आवश्यक हैं।

यदि यह संरचना वास्तव में मानव निर्मित सिद्ध होती है, तो यह प्राचीन भारतीय इंजीनियरिंग, धार्मिक प्रतीकों और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का अद्वितीय उदाहरण बन सकती है।

बहरहाल राजगृह की यह सर्पाकृति चट्टान इतिहास, धर्म और रहस्य का अनोखा संगम प्रस्तुत करती है। यह खोज जहां एक ओर प्राचीन ग्रंथों की विश्वसनीयता को नए सिरे से स्थापित करने का प्रयास करती है। वहीं दूसरी ओर यह सवाल भी उठाती है कि क्या हम अब भी अपनी ऐतिहासिक धरोहरों को पूरी तरह समझ पाए हैं?  स्रोतः एक्सपर्ट मीडिया रिपोर्टस्

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