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समग्र शिक्षा कार्यक्रम फंड में सुस्ती पर 22 जिलों के डीपीओ से जवाब तलब, नालंदा फिसड्डी

समग्र शिक्षा फंड के उपयोग में हुई धीमी प्रगति पर BEPC ने 22 जिलों के डीपीओ से जवाब तलब किया, नालंदा में सिर्फ 55% राशि खर्च।

जिला कार्यक्रम पदाधिकारी स्पष्टीकरण

बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। समग्र शिक्षा कार्यक्रम के तहत केंद्र और राज्य सरकार द्वारा शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए भेजी गई करोड़ों रुपये की राशि के उपयोग में लापरवाही अब भारी पड़ती नजर आ रही है।

बिहार शिक्षा परियोजना परिषद ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए राज्य के 22 जिलों के जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (डीपीओ) से स्पष्टीकरण मांगा है। इन जिलों में नालंदा भी शामिल है, जहां प्राथमिक शिक्षा एवं सर्व शिक्षा अभियान (एसएसए) के तहत मिली राशि का अब तक मात्र 55.24 प्रतिशत ही खर्च हो सका है।

राज्य परियोजना निदेशक द्वारा जारी पत्र में स्पष्ट किया गया है कि वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए समग्र शिक्षा कार्यक्रम के अंतर्गत (वेतन मद को छोड़कर) कुल 1044.44 करोड़ रुपये की ड्राइंग लिमिट तय की गई थी।

इसके सापेक्ष जिला कार्यालयों, बीआरसी, सीआरसी, कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालयों, विद्यालय प्रबंधन एवं विकास समितियों और अन्य शैक्षणिक गतिविधियों पर अब तक केवल 633.80 करोड़ रुपये ही खर्च किए गए हैं। यह कुल स्वीकृत राशि का मात्र 60.66 प्रतिशत है, जिसे विभाग ने गंभीर चिंता का विषय माना है।

निर्देशों की अनदेखी पर कड़ी टिप्पणीः परियोजना निदेशक ने अपने निर्देश में कहा है कि राज्य स्तर से समय-समय पर स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए जाने के बावजूद कई जिलों द्वारा ड्राइंग लिमिट का नियमानुसार और समय पर उपयोग नहीं किया गया।

इससे यह संदेश जाता है कि संबंधित अधिकारी इस महत्वपूर्ण कार्य को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। इसे वरीय अधिकारियों के आदेश की अवहेलना, स्वेच्छाचारिता और विभागीय कार्यों के प्रति लापरवाही की श्रेणी में माना गया है। इसी आधार पर 22 जिलों के डीपीओ को दो दिनों के भीतर अपना स्पष्टीकरण समर्पित करने का निर्देश दिया गया है।

अगली किस्त पर भी संकटः परियोजना निदेशक ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि पहले से आवंटित राशि का विधिवत व्यय कर उसका उपयोग प्रमाण (यूसी) प्रस्तुत नहीं किया गया तो समग्र शिक्षा कार्यक्रम के तहत केंद्र सरकार से अगली किस्त प्राप्त करना मुश्किल हो सकता है। इसका सीधा असर स्कूलों के बुनियादी ढांचे, छात्र सुविधाओं और शैक्षणिक गुणवत्ता सुधार योजनाओं पर पड़ेगा।

नालंदा की स्थिति सबसे चिंताजनकः जारी सूची के अनुसार नालंदा जिले को प्राथमिक शिक्षा एवं सर्व शिक्षा अभियान के तहत कुल 3373.06 करोड़ रुपये की ड्राइंग लिमिट दी गई थी। इसके मुकाबले अब तक केवल 1863.22 करोड़ रुपये ही खर्च हो सके हैं। जबकि 1509.84 करोड़ रुपये अब भी शेष हैं। यानी जिले में अब तक सिर्फ 55.24 प्रतिशत राशि का ही उपयोग हुआ है।

परियोजना निदेशक ने साफ शब्दों में कहा है कि यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर नालंदा समेत अन्य जिलों में 75 प्रतिशत व्यय लक्ष्य हासिल नहीं किया गया, तो संबंधित डीपीओ एसएसए के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाएगी।

60% से कम खर्च वाले जिलेः जिन जिलों में ड्राइंग लिमिट के मुकाबले 60 प्रतिशत से भी कम राशि खर्च की गई है, उनमें लखीसराय, शिवहर, औरंगाबाद, मधेपुरा, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, गया, बक्सर, मधुबनी, नालंदा, गोपालगंज, मुंगेर, शेखपुरा, समस्तीपुर, अरवल, बांका, पटना, किशनगंज, खगड़िया, सहरसा, सीवान और सारण शामिल हैं।

इन सभी जिलों के डीपीओ एसएसए को निर्देश दिया गया है कि वे एक सप्ताह के भीतर उपलब्ध ड्राइंग लिमिट का कम से कम 75 प्रतिशत व्यय सुनिश्चित करें।

शिक्षा व्यवस्था पर असर की आशंकाः विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय पर राशि का उपयोग नहीं हुआ, तो स्कूलों में अधोसंरचना सुधार, छात्रवृत्ति, शिक्षण सामग्री, डिजिटल शिक्षा और बालिका शिक्षा से जुड़ी कई योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं। ऐसे में विभाग की यह सख्ती आने वाले दिनों में जिला स्तर के अधिकारियों के लिए बड़ी परीक्षा साबित होगी।

समाचार स्रोत: मुकेश भारतीय / मीडिया रिपोर्ट्स

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