बदहाली का प्रतीक बना 50 लाख का सामाजिक उत्थान पार्क, 21 फरवरी को CM ने किया था उद्घाटन

सिलाव (नालंदा दर्पण)। ग्रामीण विकास और सामाजिक सरोकारों का प्रतीक बनने वाला नानंद गांव का सामाजिक उत्थान पार्क आज बदहाली की कहानी कह रहा है। मनरेगा योजना के तहत करीब 50 लाख रुपये की लागत से निर्मित यह पार्क महज एक साल के भीतर ही उपेक्षा और लापरवाही का शिकार हो गया है।

हालात इतने खराब हैं कि ग्रामीणों के लिए सुकून और सामाजिक मेलजोल का केंद्र बनने वाला यह स्थान अब डर और असुविधा का कारण बन चुका है।

गौरतलब है कि 21 फरवरी 2025 को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी प्रगति यात्रा के दौरान इस पार्क का भव्य उद्घाटन किया था। उद्घाटन के समय इसे ग्रामीण जीवन को नई दिशा देने वाला प्रोजेक्ट बताया गया था, लेकिन उद्घाटन के बाद इसकी देखरेख की जिम्मेदारी जैसे हवा में उड़ गई।

नतीजा यह है कि आज पार्क चारों ओर से घने जंगल और झाड़ियों में तब्दील हो चुका है।

पार्क परिसर में उगी लंबी-लंबी झाड़ियां और घास इस बात की गवाही दे रही हैं कि महीनों से यहां सफाई तक नहीं हुई। पेवर ब्लॉक्स के बीच उग आई वनस्पतियां और चारों ओर फैली गंदगी न सिर्फ सौंदर्य को खत्म कर रही हैं, बल्कि विषैले जीव-जंतुओं के पनपने का खतरा भी बढ़ा रही हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि अब बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं यहां जाने से कतराने लगे हैं।

स्थानीय लोगों के अनुसार पार्क के नियमित रखरखाव के लिए दो माली की आवश्यकता पहले ही प्रशासन को बताई गई थी, लेकिन इस मांग पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। समय रहते रखरखाव की व्यवस्था नहीं होने के कारण लाखों की लागत से बना यह पार्क धीरे-धीरे खंडहर जैसा रूप लेता जा रहा है।

ग्रामीणों को आशंका है कि यदि जल्द कदम नहीं उठाए गए तो सरकारी धन से बनी यह संपत्ति पूरी तरह नष्ट हो जाएगी।

मनरेगा योजना के अंतर्गत पार्क के समीप एक तालाब का निर्माण भी कराया गया था, जो अब अधूरा पड़ा है। बताया जा रहा है कि संबंधित कार्य की पूरी राशि का भुगतान अब तक नहीं हो सका है, जिससे काम बीच में ही ठप हो गया। अधूरा तालाब भी दुर्घटनाओं और गंदगी का कारण बनता जा रहा है।

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि नानंद गांव एक आदर्श पंचायत है, जिसे जदयू सांसद कौशलेन्द्र कुमार ने गोद लिया हुआ है। इसके बावजूद गांव के सबसे महत्वपूर्ण विकास कार्यों में शामिल सामाजिक उत्थान पार्क की दुर्दशा प्रशासनिक उदासीनता की तस्वीर पेश कर रही है।

ग्रामीणों ने सांसद, जिला प्रशासन और संबंधित विभागों से मांग की है कि तत्काल हस्तक्षेप कर पार्क की सफाई, नियमित रखरखाव और तालाब के अधूरे कार्य को पूरा कराया जाए। लोगों का कहना है कि यदि सही ढंग से देखरेख की जाए तो यह पार्क फिर से ग्रामीणों के लिए उपयोगी बन सकता है और सरकारी धन की बर्बादी को रोका जा सकता है।

बहरहाल नानंद गांव का यह बदहाल सामाजिक उत्थान पार्क न सिर्फ योजनाओं के कमजोर क्रियान्वयन को उजागर करता है, बल्कि यह भी सवाल खड़ा करता है कि क्या विकास योजनाएं सिर्फ उद्घाटन तक ही सीमित रह गई हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

अन्य समाचार