बौद्ध सर्किट फोरलेन मुआवजा को लेकर किसानों का आंदोलन जारी

नालंदा दर्पण डेस्क। अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन स्थल राजगीर को बौद्ध सर्किट से जोड़ने वाली महत्वाकांक्षी फोरलेन सड़क परियोजना अब भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर फंसती नजर आ रही है। राजगीर से सालेपुर (नूरसराय-अहियापुर-सिलाव) बौद्ध सर्किट मार्ग के निर्माण के लिए अधिग्रहित की जा रही जमीन के उचित मुआवजे की मांग को लेकर नगर पंचायत सिलाव के किसानों द्वारा परियोजना स्थल पर धरना-प्रदर्शन किया जा रहा है। यह पूरा मामला सिलाव अंचल के थाना संख्या-420  मौजा-सिलाव से जुड़ा है, जो नगर पंचायत क्षेत्र के अंतर्गत आता है।

किसानों का आरोप है कि सरकार के अधीनस्थ अधिकारी मुआवजा तय करने में गंभीर विसंगति बरत रहे हैं और उनकी उपजाऊ जमीन औने-पौने दामों पर जबरन लेने की कोशिश की जा रही है।

धरना स्थल पर जुटे किसानों ने साफ शब्दों में कहा कि जब तक मुआवजा राशि में व्याप्त विसंगतियों को दूर नहीं किया जाता, तब तक वे किसी भी हाल में अपनी जमीन सरकार को नहीं देंगे।

किसानों का कहना है कि प्रशासन बिना पारदर्शी प्रक्रिया अपनाए और अंतिम मुआवजा तय किए बिना ही भूमि अधिग्रहण की कार्रवाई तेज कर रहा है, जो सीधे तौर पर रैयतों के साथ अन्याय है।

किसानों ने सरकार और संबंधित अधिकारियों पर दोरंगी नीति अपनाने का आरोप लगाते हुए कहा कि एक ही परियोजना के तहत अलग-अलग इलाकों में मुआवजा दरों में भारी अंतर समझ से परे है।

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जबरन सड़क निर्माण शुरू किया गया, तो वे आंदोलन को और उग्र करेंगे। कुछ किसानों ने यहां तक कहा कि वे अपनी जमीन और हक की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।

उल्लेखनीय है कि बौद्ध सर्किट को मजबूती देने और पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इस फोरलेन सड़क का निर्माण किया जा रहा है। परियोजना के तहत सिलाव मौजा में भी भूमि अधिग्रहण किया गया है, लेकिन यहां तय की गई मुआवजा राशि ने विवाद खड़ा कर दिया है।

किसानों का कहना है कि वर्तमान में उन्हें प्रति डिसमिल मात्र 82,500 रुपये का मुआवजा दिया जा रहा है, जबकि इसी क्षेत्र का सर्किल रेट 4.90 लाख रुपये प्रति डिसमिल निर्धारित है। उन्होंने इसे खुलेआम भेदभाव करार दिया।

किसानों ने यह भी याद दिलाया कि वर्ष 2017 में इसी मौजा में सालेपुर-नूरसराय-सिलाव पथ परियोजना के दौरान प्रति डिसमिल 3.60, लाख रुपये मुआवजा दिया गया था, जो उस समय के सर्किल रेट से भी अधिक था।

इसके अलावा किसानों ने पड़ोसी पंचायत का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां अधिग्रहित जमीन का मुआवजा 1.21लाख  रुपये प्रति डिसमिल तय किया गया है, जबकि नगर क्षेत्र में होने के बावजूद सिलाव के किसानों को इससे काफी कम राशि दी जा रही है। इसे वे सीधे तौर पर भेदभावपूर्ण और अन्यायपूर्ण मानते हैं।

धरना-प्रदर्शन के दौरान किसानों ने यह भी बताया कि उन्होंने अक्टूबर माह के अंत में ही अपनी फसल की बुआई की थी। ऐसे में वे केवल जमीन का ही नहीं, बल्कि फसल क्षति का मुआवजा भी चाहते हैं। किसानों का कहना है कि प्रशासन को पहले फसल का उचित मूल्यांकन कर मुआवजा देना चाहिए। उसके बाद ही जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ानी चाहिए।

फिलहाल किसानों ने दो टूक शब्दों में कह दिया है कि उचित मुआवजा दिए बिना बौद्ध सर्किट फोरलेन सड़क निर्माण का कार्य शुरू नहीं होने दिया जाएगा। अब देखना यह है कि प्रशासन इस आंदोलन को कैसे संभालता है और क्या किसानों की मांगों पर पुनर्विचार कर कोई समाधान निकाला जाता है या नहीं।

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