
नालंदा दर्पण डेस्क। नालंदा जिले में शिक्षा विभाग की वित्तीय व्यवस्था से जुड़ा एक बेहद चौंकाने वाला और गंभीर मामला सामने आया है। वित्तीय वर्ष 2005-06 एवं 2006-07 में माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक विद्यालयों को इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के लिए दी गई सरकारी राशि का डीसी विपत्र (डिस्चार्ज सर्टिफिकेट) 21 वर्षों बाद भी विभाग में जमा नहीं किया गया है। इस लापरवाही के चलते जिले के कुल 14 विद्यालयों के पास लगभग 2 करोड़ 45 लाख रुपये से अधिक की राशि का लेखा-जोखा आज भी अधूरा पड़ा हुआ है।
यह राशि विद्यालयों को पुस्तकालय सुदृढ़ीकरण, प्रयोगशाला उपकरण क्रय, अतिरिक्त वर्ग कक्ष निर्माण, फर्नीचर तथा खेल मैदान विकास जैसे महत्वपूर्ण कार्यों के लिए बैंक ड्राफ्ट के माध्यम से उपलब्ध कराई गई थी। लेकिन वर्षों बीत जाने के बावजूद राशि के उपयोग का प्रमाण विभाग को नहीं सौंपा गया, जिससे सरकारी धन के उपयोग पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
यह पूरा मामला तब उजागर हुआ जब बिहार विद्यालय परीक्षा समिति, पटना के पत्र के आलोक में जिला शिक्षा कार्यालय द्वारा पुराने अभिलेखों की गहन समीक्षा कराई गई। जांच के दौरान यह तथ्य सामने आया कि कई विद्यालयों द्वारा वर्षों पहले निर्गत राशि का डीसी विपत्र आज तक समर्पित नहीं किया गया है। इससे न सिर्फ वित्तीय लेखा-जोखा अधूरा है, बल्कि विभागीय निगरानी तंत्र की कमजोरी भी उजागर हो गई है।
जिले के 11 माध्यमिक विद्यालयों के पास कुल 1 करोड़ 26 लाख 50 हजार रुपये का डीसी बिल लंबित है। यह राशि पुस्तकालय, फर्नीचर एवं प्रयोगशाला उपकरण जैसे मदों के लिए दी गई थी। विवरण के अनुसार पुस्तकालय मद में 22 लाख, उपस्कर मद में 71 लाख 50 हजार तथा प्रयोगशाला मद में 33 लाख रुपये का डीसी बिल अब तक जमा नहीं हुआ है।
इन विद्यालयों में एसएस बालिका उच्च विद्यालय बिहारशरीफ, राजकीय उच्च विद्यालय राणा बिगहा, रामबाबू उच्च विद्यालय हिलसा, गांधी उच्च विद्यालय सिलाव, उच्च विद्यालय वेन, नूरसराय, पावापुरी, हरनौत, एकंगरसराय और इस्लामपुर समेत कुल 14 विद्यालय शामिल हैं।
वहीं जिले के 3 अन्य माध्यमिक विद्यालयों के पास 1 करोड़ 18 लाख 50 हजार रुपये का डीसी बिल लंबित है। इनमें नालंदा कॉलेजिएट स्कूल बिहारशरीफ, आरडीएच हाई स्कूल राजगीर और आरडी उच्च विद्यालय नालंदा शामिल हैं।
इन विद्यालयों में अतिरिक्त वर्ग कक्ष निर्माण मद में 78 लाख रुपये, खेल मैदान एवं पुस्तकालय मद में 6-6 लाख रुपये, उपस्कर मद में 19 लाख 50 हजार रुपये तथा प्रयोगशाला मद में 9 लाख रुपये का डीसी विपत्र अब तक जमा नहीं किया गया है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (माध्यमिक) नालंदा नेहा रानी ने सभी संबंधित प्रधानाध्यापकों एवं प्रभारी प्रधानाध्यापकों को 24 घंटे के भीतर मूल अभिलेखों के साथ डीसी विपत्र जमा करने का अंतिम निर्देश जारी किया है।
उन्होंने स्पष्ट किया है कि निर्धारित समय सीमा में अनुपालन नहीं होने की स्थिति में संबंधित विद्यालय प्रधान का वेतन अवरुद्ध कर विभाग को प्रतिवेदन भेज दिया जाएगा।
21 वर्षों तक लंबित रहे इस वित्तीय प्रकरण ने शिक्षा विभाग में हड़कंप मचा दिया है। यह मामला न सिर्फ विभागीय निगरानी और ऑडिट व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है, बल्कि विद्यालय स्तर पर वित्तीय जवाबदेही की गंभीर कमी को भी उजागर करता है।
स्थिति यह है कि इतने पुराने मामले के कारण अधिकांश तत्कालीन प्रधानाध्यापक या तो सेवानिवृत्त हो चुके हैं या स्थानांतरित किए जा चुके हैं, जिससे जवाबदेही तय करना और भी जटिल हो गया है।
अब देखना यह है कि शिक्षा विभाग की इस सख्ती के बाद 21 साल पुराने इस बहुचर्चित वित्तीय मामले में कितनी पारदर्शिता आती है और सरकारी धन के उपयोग का सच कब तक सामने आता है।