
नालंदा दर्पण डेस्क। नालंदा जिले के बिंद प्रखंड में स्थित अमावां महल आज भी अपनी भव्यता और इतिहास की गूंज से हर किसी को मंत्रमुग्ध कर देता है। यह महल केवल पत्थरों और ईंटों का ढांचा नहीं, बल्कि एक बड़ी रियासत की कहानी है। इस रियासत ने अपने समय में नालंदा ही नहीं, बल्कि सहरसा, मधेपुरा, नवगछिया, सिंघेश्वर स्थान, गया के टेकारी, वृंदावन और काशी तक अपनी छाप छोड़ी।
आइए इस महल की कहानी को करीब से जानें और समझें कि यह आज भी क्यों प्रासंगिक है।
बाताय जाता है कि अमावां स्टेट की नींव छोटे जमींदार बाबू वैद्यनाथ सिंह के पुत्र राजा हरिहर प्रसाद नारायण सिंह की मेहनत और दूरदर्शिता पर टिकी है। उनकी लगन ने न केवल रियासत का विस्तार किया, बल्कि उन्हें इंग्लैंड की महारानी द्वारा ‘बहादुर’ की उपाधि भी दिलाई।
कहते हैं कि 1860 से 1952 तक यह रियासत अपने चरम पर रही, और इस दौरान प्रति माह 35 लाख रुपये की मालगुजारी से राजस्व की वसूली होती थी। यह आंकड़ा उस समय की आर्थिक समृद्धि का प्रतीक है।
अमावां महल को ’52 कोठी और 53 द्वार’ के नाम से जाना जाता है। इसकी भव्य संरचना और उस समय की आधुनिक सुविधाएं इसे खास बनाती हैं। कहा जाता है कि कोलकाता के बाद अमावां ही वह स्थान था, जहां बिजली की रोशनी जगमगाती थी।
महल और इसके सिपहसालारों के घरों को रोशन करने के लिए स्वयं का पावर हाउस था। इसके अलावा टेलीग्राम जैसी संचार व्यवस्था भी इस रियासत की प्रगतिशीलता को दर्शाती है। आप कल्पना कर सकते हैं कि उस दौर में इतनी उन्नत सुविधाएं कितनी क्रांतिकारी रही होंगी।
बताते हैं कि राजा हरिहर प्रसाद नारायण सिंह केवल एक शासक ही नहीं, बल्कि समाज सुधारक भी थे। उन्होंने किसानों के लिए नहरों का निर्माण करवाया, जिससे खेती को बढ़ावा मिला।
शिक्षा के क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। स्कूल और कॉलेज खोलकर उन्होंने स्थानीय समुदाय को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया। ये कदम उस समय के सामाजिक विकास के लिए महत्वपूर्ण थे। जोकि यह दर्शाता है कि राजा का विजन केवल शक्ति तक सीमित नहीं था, बल्कि समाज के उत्थान से भी जुड़ा था।
आज भी अमावां महल अपनी ऐतिहासिक और वास्तुशिल्पीय भव्यता के लिए जाना जाता है। पर्यटक इसकी भव्यता को देखकर आश्चर्यचकित हो जाते हैं। लेकिन इस सांस्कृतिक और ऐतिहासिक गौरव को जीवंत करने की जरुरत है। सरकार को इसे संरक्षित और प्रचारित करने के लिए कदम उठाने चाहिए।





