बाबा मणिराम मंदिर: लंगोट अर्पण मेले की प्रशासनिक तैयारियां पूरी

बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। बिहारशरीफ नगर के अखाड़ापर मोहल्ले में अवस्थित बाबा मणिराम मंदिर अपनी आध्यात्मिक और ऐतिहासिक महत्ता के लिए देश-विदेश में विख्यात है। इस मंदिर में पिछले तेरह वर्षों से अखंड ज्योति प्रज्वलित है, जो भक्तों के लिए श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक बनी हुई है।
मंदिर के पुजारी विश्वनाथ मिश्रा ने बताया कि वर्ष 2012 में अयोध्या की बड़ी छावनी से अखंड ज्योति को बाबा मणिराम अखाड़ा लाया गया था। इस ज्योति में प्रतिदिन दो बार घी डाला जाता है और यह पिछले तेरह वर्षों से निरंतर जल रही है।
बाबा मणिराम अखाड़ा न्यास समिति के उपाध्यक्ष अमरकांत भारती ने जानकारी दी कि इस वर्ष वार्षिक लंगोट मेला 10 जुलाई से प्रारंभ होगा और यह सात दिवसीय आयोजन 17 जुलाई तक चलेगा।
जिला प्रशासन ने मेले की सभी आवश्यक तैयारियां पूर्ण कर ली हैं। जिसमें सुरक्षा, स्वच्छता, और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए व्यापक इंतजाम शामिल हैं। यह मेला मल्ल युद्ध सम्राट, अलौकिक चमत्कारी और महान संत शिरोमणि श्री श्री 108 बाबा मणिराम की पवित्र जीवित समाधि स्थल पर आयोजित होगा।
बिहारशरीफ के दक्षिण-पूर्व कोने में स्थित बाबा मणिराम का अखाड़ा, जिसे अब मनोकामना पूर्ण मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, वह भक्तों के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है। पहले इस स्थान को केवल बाबा मणिराम अखाड़ापर के नाम से जाना जाता था। देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु यहां लंगोट चढ़ाते हैं और मान्यता है कि सच्चे हृदय से मांगी गई मन्नतें अवश्य पूरी होती हैं।
कहा जाता है कि लंगोट मेले की शुरुआत आजादी के पांच वर्ष बाद 16 जुलाई 1952 को हुई थी। तत्कालीन उत्पाद विभाग के इंस्पेक्टर कपिलदेव प्रसाद के अथक प्रयासों से इस मेले का आयोजन शुरू किया गया था। तब से प्रत्येक वर्ष आषाढ़ पूर्णिमा के अवसर पर यह सात दिवसीय मेला आयोजित होता आ रहा है।
इतिहासकारों के अनुसार 1300 ईस्वी में बाबा मणिराम ने इसी अखाड़ापर में जीवित समाधि ली थी। उनके चार शिष्यों-अयोध्या निवासी राजा प्रहलाद सिंह और वीरभद्र सिंह तथा बिहारशरीफ निवासी कल्लड़ मोदी और गुही खलीफा की समाधियां भी बाबा की समाधि के समीप बनाई गई हैं।
ऐतिहासिक कथाओं के अनुसार बाबा मणिराम 1238 ईस्वी में अयोध्या से बिहारशरीफ आए थे। उन्होंने शहर के दक्षिणी छोर पर पंचाने नदी के पिस्ता घाट को अपना पूजा स्थल बनाया, जो आज अखाड़ापर के नाम से प्रसिद्ध है। बाबा के अनुयायियों ने उनकी समाधि स्थल पर मंदिर का निर्माण किया और पूजा-अर्चना की परंपरा शुरू की, जो आज भी निर्बाध रूप से जारी है।
जिला प्रशासन ने मेले के लिए व्यापक तैयारियां की हैं, जिसमें सुरक्षा व्यवस्था, यातायात प्रबंधन, स्वच्छता और श्रद्धालुओं के लिए अस्थायी सुविधाओं का निर्माण शामिल है। मेले में आने वाले भक्तों की सुविधा के लिए विशेष ध्यान दिया गया है। ताकि वे बिना किसी असुविधा के बाबा के दर्शन और पूजा-अर्चना कर सकें।
क्योंकि यह मेला न केवल आध्यात्मिक महत्व रखता है, बल्कि यह स्थानीय संस्कृति और परंपराओं को भी जीवंत रखता है। बाबा मणिराम मंदिर और लंगोट मेला बिहारशरीफ की सांस्कृतिक धरोहर का अभिन्न अंग हैं, जो हर वर्ष लाखों श्रद्धालुओं को एकजुट करता है।










