
राजगीर (नालंदा दर्पण/मुकेश भारतीय)। नालंदा जिले के ऐतिहासिक बड़गांव सूर्यपीठ सरोवर न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि प्राचीन भारतीय संस्कृति, लोक परंपराओं, किवदंतियों और आध्यात्मिकता का अनुपम संगम है। यहां मनाया जाने वाला छठ महापर्व प्रकृति और मानव के आदि संबंध को पुनर्जीवित करता है, जहां सूर्यदेव की उपासना द्वापर युग से चली आ रही है।
लोक इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के अनुसार यह स्थल महाभारत काल से जुड़ा हुआ है और सूर्य पुराण, पद्म पुराण तथा अन्य ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। बड़गांव का छठ पर्व केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि आस्था, अनुशासन, शुद्धता और परिवारिक एकता का प्रतीक है, जो हजारों वर्षों से अटूट श्रद्धा के साथ निभाया जा रहा है।
राजा शाम्ब की कुष्ठ मुक्ति और सूर्य तपस्या
प्राचीन कथाओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र राजा शाम्ब को घमंड के कारण कुष्ठ रोग हो गया था। महाभारत और सूर्य पुराण में वर्णित इस लोक किवदंती के मुताबिक, शाम्ब ने पिता श्रीकृष्ण से उपचार का उपाय पूछा। श्रीकृष्ण ने उन्हें सूर्यदेव की कठोर उपासना करने की सलाह दी।
तब राजा शाम्ब बड़गांव पहुंचे, जहां उन्होंने सूर्य सरोवर के तट पर 12 वर्षों तक निर्जला उपवास, स्नान और अर्घ्यदान की तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने दर्शन दिए और कुष्ठ रोग से मुक्ति प्रदान की। इस घटना के बाद बड़गांव ‘सूर्यपीठ’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
लोक कथाओं में कहा जाता है कि यहां सूर्य स्नान करने से चर्म रोग, कुष्ठ और अन्य त्वचा व्याधियां दूर हो जाती हैं। आज भी श्रद्धालु मानते हैं कि सरोवर का जल औषधीय गुणों से भरपूर है, जो प्राचीन वैदिक मान्यताओं से जुड़ा है।
यह किवदंती केवल धार्मिक नहीं, बल्कि लोक परंपराओं में जीवंत है। बिहार और झारखंड की ग्रामीण कथाओं में शाम्ब की तपस्या को ‘सूर्य पुत्र की मुक्ति गाथा’ के रूप में गाया जाता है, जो छठ व्रत की कठोरता को प्रेरणा देती है।
वैदिक परंपरा और ऋग्वेद में सूर्योपासना: जीवन और आरोग्य का आधार
वैदिक काल से सूर्य को जीवनदाता, आरोग्यदाता और पापहर देवता माना गया है। ऋग्वेद के सूर्य सूक्त में सूर्य की उपासना को स्वास्थ्य, समृद्धि और दीर्घायु का स्रोत बताया गया है। बड़गांव का सूर्य मंदिर इसी प्राचीन परंपरा का जीवंत प्रमाण है।
पुरातात्विक खोजों से पता चलता है कि यहां मौर्य (चंद्रगुप्त काल) और गुप्त साम्राज्य (समुद्रगुप्त काल) में भी सूर्य पूजा होती थी। मंदिर परिसर में मिले प्राचीन पाषाण मूर्तियां, शिलालेख और स्तंभ कोणार्क (ओडिशा) तथा देव सूर्य मंदिर (औरंगाबाद) की वास्तुकला से मिलते-जुलते हैं। ये अवशेष प्रमाणित करते हैं कि बड़गांव प्रागैतिहासिक काल से सूर्य तीर्थ रहा है।
लोक मान्यताओं में सूर्य को ‘चक्षु देवता’ कहा जाता है, जो अंधकार दूर कर प्रकाश फैलाते हैं। छठ पर्व में डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देना इसी वैदिक परंपरा का हिस्सा है, जो बिना किसी पुजारी या मंत्रोच्चारण के केवल श्रद्धा से संपन्न होता है।
छठ महापर्व का भव्य स्वरूप: अनुशासन, शुद्धता और लोक एकता
बड़गांव में छठ पर्व अत्यंत भव्य और पवित्रता से मनाया जाता है। व्रती (मुख्यतः महिलाएं) 36 घंटे निर्जला उपवास रखती हैं, जिसमें नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और प्रातः अर्घ्य शामिल हैं।
इस सरोवर के घाटों पर जल में खड़ी होकर सूर्य को अर्घ्य देना अलौकिक दृश्य प्रस्तुत करता है। शाम को सूर्यास्त का प्रतिबिंब जल में और दीपमालाओं से सजे घाट आस्था का प्रतीक बन जाते हैं। प्रातःकाल उदीयमान सूर्य का दृश्य तो मानो स्वर्गीय लगता है।
यह पर्व परिवारिक एकता का प्रतीक है। लोक गीतों में ‘कांटा बिछिया, ठेकुआ-चावल के लड्डू’ जैसे प्रसाद की तैयारी को गाया जाता है। परंपरा के अनुसार व्रती सूप में ठेकुआ, फल और गन्ना रखकर अर्घ्य देती हैं, जो प्रकृति पूजा का हिस्सा है।
क्षेत्रीय लोक कथाएं और चर्म रोग मुक्ति की मान्यता
बिहार की लोक कथाओं में बड़गांव को ‘कुष्ठहर तीर्थ’ कहा जाता है। एक प्रसिद्ध किवदंती है कि गुप्त काल में एक राजकुमारी को चर्म रोग हुआ था, जिसने यहां सूर्य स्नान कर मुक्ति पाई। झारखंड की संथाल जनजाति की परंपराओं में सूर्य को ‘सिंगबोंगा’ मानकर छठ जैसी पूजा की जाती है।
नेपाल के मधेशी समुदाय में भी शाम्ब कथा प्रचलित है। चिकित्सकीय दृष्टि से इस सरोवर का जल सल्फर युक्त माना जाता है, जो त्वचा रोगों में लाभदायक है। अध्यात्म और विज्ञान का यह मिश्रण बड़गांव को अनोखा बनाता है।
नालंदा से वैश्विक आकर्षण: लाखों श्रद्धालुओं का मेला
छठ के दौरान बड़गांव नालंदा जिले का नहीं, बिहार का सबसे बड़ा तीर्थ बन जाता है। बिहार के हर जिले समेत झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और नेपाल से लाखों श्रद्धालु आते हैं। सुख, संतान, आरोग्य और समृद्धि की कामना के साथ वे सूर्यदेव से प्रार्थना करते हैं। यह पर्व सामाजिक समरसता का प्रतीक है, जहां अमीर-गरीब एकसाथ घाटों पर खड़े होते हैं।
पुरातत्व विभाग द्वारा मंदिर की सुरक्षा और सरोवर की सफाई से यह स्थल पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हो रहा है। बड़गांव सूर्य सरोवर छठ महापर्व के माध्यम से प्राचीन मान्यताओं को जीवंत रखता है। यह द्वापर कालीन आस्था, लोक कथाओं और चर्म रोग मुक्ति का प्रतीक है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत बना रहेगा।
(यह आलेख लोक कथाओं, पुराणों, पुरातात्विक प्रमाणों और स्थानीय परंपराओं पर आधारित है। छठ पर्व कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मनाया जाता है।)





