बिना STET पास बन गए BPSC शिक्षक-शिक्षिका, एक साल बाद हुए वर्खास्त!

नालंदा दर्पण डेस्क। बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) और बिहार शिक्षा विभाग की लापरवाही और भ्रष्टाचार का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। बिना एसटीईटी (सेकेंडरी टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट) पास किए ही दो शिक्षकों की बीपीएससी (बिहार लोक सेवा आयोग) से नियुक्ति हो गई।

शिक्षा विभाग भी दोनों को एक साल तक वेतन भी देता रहा। अब जाँच के बाद इन शिक्षकों को बर्खास्त करने का आदेश जारी किया गया है। इस घटना ने न केवल शिक्षा व्यवस्था में गंभीर खामियों की पोल खोली है, बल्कि इस प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

पहला मामला मुजफ्फरपुर के जारंग हाईस्कूल का है। यहाँ पुरूषोत्तम रंजन की नियुक्ति कम्प्यूटर शिक्षक के रूप में की गई थी। बीपीएससी के पहले चरण की नियुक्ति के तहत उन्होंने करीब एक साल तक अपनी सेवाएँ दीं। लेकिन जब उनकी पात्रता की जांच की गई तो खुलासा हुआ कि वे एसटीईटी पास ही नहीं थे। विभाग ने उनसे स्पष्टीकरण मांगा और प्रमाणित होने पर डीईओ (जिला शिक्षा अधिकारी) ने उन्हें बर्खास्त करने का आदेश जारी कर दिया।

दूसरा मामला मुरौल हाईस्कूल का है। यहाँ प्रमिला कुमारी नामक शिक्षिका की नियुक्ति की गई थी। जांच में पता चला कि वे एसटीईटी में क्वालिफाई नहीं थीं। उनके प्राप्तांक निर्धारित न्यूनतम अंक से कम थे। प्रमिला कुमारी ने इस दौरान वेतन भी उठाया। अब विभाग द्वारा उनकी भी नियुक्ति रद्द कर दी गई है।

इन दोनों मामलों के खुलासे के बाद शिक्षा विभाग में हड़कंप मच गया है। बताया जा रहा है कि ऐसे दर्जनों शिक्षक और शिक्षिकाएं संदेह के घेरे में हैं। उनकी भी जांच की जा रही है। इन मामलों ने बीपीएससी द्वारा शिक्षकों की बहाली प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सबसे अहम सवाल यह उठता है कि बिना पात्रता परीक्षा पास किए इन शिक्षकों की नियुक्ति कैसे हुई? इस प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका क्या रही? क्या यह केवल लापरवाही का मामला है या इसके पीछे कोई बड़ा भ्रष्टाचार छिपा है?

शिक्षा विशेषज्ञों और आम जनता का कहना है कि इस तरह के मामले की गंभीरता से जांच होनी चाहिए। दोषियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएँ दोबारा न हो। इसके साथ ही नियुक्ति प्रक्रिया को और पारदर्शी और सख्त बनाने की जरूरत है।

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