
चंडी (नालंदा दर्पण)। कहते हैं कि इतिहास की किताबों में कई पन्ने दर्ज होते हैं, लेकिन कुछ पन्ने स्याही से नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी के टूटे हुए सपनों की किरचियों से लिखे जाते हैं। कहने को तो देश में ‘अमृतकाल’ चल रहा है। मतलब अमृत काल का नशा। लेकिन रूकिए यह कोई अमृत काल का नशा नहीं बल्कि ‘नशाकाल’ चल रहा है। आज का युवा उस ‘रेत की दीवार’ की तरह है जो नशे में डूबकर अपनी दीवार खुद ढाह रहा है।
चंडी की सड़कों पर फैलता इंजेक्शन नशा
इन दिनों चंडी की चमचमाती सड़कों पर तेजी से फ़ैल रहा है ‘नशे का डोज’ का फैलता जहर और उसके बीच में कुंभकर्णी निद्रा में सोती व्यवस्था और बेखबर प्रशासन। चंडी की सड़कों, पुलों के नीचे और सुनसान कोनों में अगर थोड़ी भी नजर दौड़ाइए, तो जगह-जगह इस्तेमाल किए हुए इंजेक्शन पड़े मिल जाएंगे। यह कोई सामान्य दवा नहीं, बल्कि नशे का ज़हर है, जो चुपचाप शहर की युवा पीढ़ी को अपने आगोश में लेता जा रहा है।
युवाओं की पीढ़ी बन रही सबसे बड़ी शिकार
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इसका चलन तेजी से बढ़ रहा है और इसके शिकार ज़्यादातर हमारे युवा हैं। यह नशा सिर्फ शरीर को नहीं, बल्कि दिमाग और आत्मा को भी खोखला कर रहा है। यह युवाओं को मानसिक रूप से कमजोर, निर्णयहीन और धीरे-धीरे समाज का बोझ बना रहा है।
अपराध और हिंसा की जड़ में नशे की लत
अपराध, हिंसा और असामाजिक गतिविधियों के पीछे अगर गहराई से देखा जाए, तो नशे की यह लत एक बड़ी वजह बनकर उभरती दिखती है। सवाल यह है कि जो चलन कैंसर की तरह फैल रहा है, उस पर सरकार और प्रशासन की नजर क्यों नहीं पड़ रही?
पारंपरिक नशे से खतरनाक केमिकल नशे की ओर झुकाव
चंडी के नगर पंचायत और अन्य कस्बों में गांजा, भांग, यहां तक कि अफीम जैसे नशे की गिरफ्त में फंसे हुए हैं। नशे के विकल्प के तौर पर इस समय नशीली सूई और दवाईयों का प्रयोग तेजी से बढ़ गया है। वहीं बानफिक्स, सनफिक्स, सएलूशन, व्हाइटनर, थीनर, फेवीक्विक जैसे विकल्प नशे के रूप में धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहें हैं। चंडी के बाजारों में इन सामानों की मांग महीनों से अचानक उछाल आ गई है। दुकानदार धड़ल्ले से ऐसे उत्पाद को बेच रहें है।
दर्द निवारक दवा का भी नशे में दुरुपयोग
हम सब जानते हैं कि शरीर के दर्द और मोच के लिए आयोडेक्स का इस्तेमाल रामबाण औषधि के रूप में जाना जाता है। लेकिन अब इसका इस्तेमाल धड़ल्ले से नशे के लिए किया जा रहा है। टीवी पर ‘आयोडेक्स’ विज्ञापन की पंच लाइन हुआ करती थी,’ आयोडेक्स मलिए, काम पर चलिए।’ लेकिन चंडी के नशाखोरों ने आयोडेक्स के पंच लाइन को बदल कर रख दिया है। अब कहा जा रहा है ‘आयोडेक्स’ चाटिए,और नशे में डूब जाइए।’
बच्चों में चिपकाने वाले केमिकल का नशे के रूप में प्रयोग
हम बस जानते हैं कि सनफिक्स, बानफिक्स का इस्तेमाल वस्तुओं को जोड़ने में किया जाता है। व्हाइटनर का इस्तेमाल लिखावट की गलतियों को मिटाने में किया जाता है। थीनर का पेंट के घोल को पतला करने के लिए। लेकिन बहुत ही कम उम्र के (10-16) बच्चे इन चीजों का इस्तेमाल चरस, अफीम और कस्तुरी के विकल्प के तौर पर कर रहें हैं।
सार्वजनिक जगहें बन रहीं नशाखोरों के अड्डे
चंडी नगर पंचायत के चंडी का ऐतिहासिक मैदान, पीडब्ल्यूडी का कैंपस, पुलपर, इंजीनियरिंग रोड,सतनाग मोड़,जैतीपुर, लालगंज सहित अब विभिन्न गांवों के सीमा क्षेत्र में नशाखोरों की जमात देखी जा रही है। यहां तक कि चंडी नगर पंचायत का मैदान जो कभी खिलाड़ियों से गुलजार रहता है वह आज कल नशेड़ियों की गिरफ्त में है।
मैदानों में बढ़ती असामाजिक गतिविधियां
यहां तक कि चंडी मैदान में असमाजिक तत्वों का जमावड़ा लगा रहता है।आएं दिन मैदान में मारपीट की घटनाएं होती रहती है। चंडी में नशाखोरों की वजह से अपराध का ग्राफ भी बढ़ा है। हमारे सूत्रों का कहना है कि नशाखोरी के शिकार युवावर्ग इसके चलते चोरी,लूट की वारदातों को अंजाम देने में कतई संकोच नहीं कर रहे हैं।
नशा करने का खतरनाक तरीका
लोगों का कहना है कि नशे के आदी युवा, बच्चे बानफिक्स, सनफिक्स सएलूशन आदि को किसी पॉलिथीन में डाल देते हैं फिर उसको रगड़ कर मुंह में ढक कर उसका गंध लेते हैं। कहा जाता है कि गंध लेने के कुछ पल बाद ही उनमें नशा छा जाता है।
डॉक्टरों की चेतावनी: सेहत पर गंभीर असर
चंडी के कुछ चिकित्सकों ने बताया कि नशे के विकल्प के रूप में जिन वस्तुओं का गलत इस्तेमाल युवा वर्ग नशे के रूप में कर रहे हैं। वह उनके स्वास्थ्य को बर्बाद कर रहा है। इन चीजों के उपयोग से बच्चों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है।यह लीवर, फेफड़े, हृदय,पेट और आंत को काफी नुकसान पहुंचाता है। इसके सेवन से कम उम्र में मौत का खतरा रहता है।
प्रशासन की भूमिका पर उठते गंभीर सवाल
क्या सरकार और प्रशासन इससे अनभिज्ञ है? या फिर सब कुछ जानते हुए भी आंख मूंदे बैठा है? और अगर इससे भी आगे बढ़कर सोचा जाए, तो कहीं न कहीं इस पूरे धंधे में मिलीभगत तो नहीं?अगर प्रशासन संलिप्त नहीं है तो फिर यह कैसे संभव है कि प्रतिबंधित दवाएं और नशे के इंजेक्शन इतनी आसानी से उपलब्ध हो जा रहे हैं? कौन दे रहा है इन्हें? कहां से आ रहे हैं? और इनकी सप्लाई चेन पर अब तक ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
छापेमारी के बावजूद जारी अवैध बिक्री
पिछले दिनों चंडी के विभिन्न दवा दुकानों में ड्रग्स विभाग ने छापेमारी की थी जिसमें प्रतिबंधित नशीली दवाएं जब्त की गई थी। इसके बाद भी चंडी के विभिन्न दवा दुकानों में बीस रूपए में मिलने वाली एविल 70-80 रूपये में धड़ल्ले से बिक रही है।
आने वाली पीढ़ी के भविष्य पर मंडराता खतरा
यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का सवाल नहीं, बल्कि आने वाली पूरी पीढ़ी के भविष्य का सवाल है। अगर आज सख्त कदम नहीं उठाए गए तो कल यही युवा नशे की गिरफ्त में फंसी एक हारी हुई पीढ़ी बन जाएंगे। सरकार और प्रशासन को अविलंब नशे की इन दवाओं, इंजेक्शन और इन्हें बेचने वाले नेटवर्क पर कठोर कार्रवाई करनी चाहिए।
नशे के खिलाफ निर्णायक लड़ाई की जरूरत
साथ ही पुलिस को यह भी बताना होगा कि आखिर इतनी बड़ी मात्रा में प्रतिबंधित नशीली चीजें शहर तक पहुंच कैसे रही हैं। चंडी की युवा पीढ़ी को नशे से बचाना सिर्फ एक सामाजिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि राज्य के भविष्य को बचाने की लड़ाई है। अगर अब भी नहीं जागे, तो इतिहास इस लापरवाही को माफ नहीं करेगा।
✍️ नालंदा दर्पण के लिए वरीय पत्रकार जयप्रकाश नवीन की रिपोर्ट





