
इस्लामपुर (नालंदा दर्पण रिपोर्टर)। नालंदा जिला के इस्लामपुर प्रखंड की ढेकवाहा पंचायत में सरकारी भवन तो चमक रहे हैं। आंगनवाड़ी केंद्र, प्राथमिक विद्यालय, सामुदायिक भवन और पंचायत सरकार भवन सब मौजूद हैं। लेकिन जब बात बुनियादी जरूरतों की आती है तो यही पंचायत खोखली नजर आती है।
खेतों की सिंचाई के लिए एक भी सरकारी नलकूप नहीं, पीने का पानी अधूरा-अधूरा, मुख्य सड़कें टूटकर खस्ताहाल और स्वास्थ्य सुविधा के नाम पर शून्य। नतीजा – 50 फीसदी से ज्यादा आबादी मजदूरी करने ईंट-भट्ठों या बाहर के शहरों में पलायन कर रही है।
पंचायत के प्राणबिगहा, कस्तूरी बिगहा और ढेकवाहा टोले के ग्रामीणों ने नालंदा दर्पण से खुलकर अपनी पीड़ा सुनाई। धर्मेंद्र चौहान, गांधी कुमार, नंदू चौहान, सूरज चौहान, कृष्णा दास और सुरेश रविदास ने एक स्वर में कहा कि सरकारी नलजल योजना के तहत घर-घर नल लग तो गए, लेकिन पानी आता है कभी-कभार है। ज्यादातर दिन टोटी सूखी रहती है। खेतों में फसल लगाने के लिए डीजल पंप सेट चलाना पड़ता है, जिससे लागत बढ़ जाती है और कमाई घट जाती है।
ग्रामीणों ने बताया कि पंचायत में बिजली की लाइन तो है, लेकिन ट्रांसफार्मर अक्सर खराब रहते हैं और लो-वोल्टेज की समस्या सालों से बनी हुई है। सबसे बड़ी मार स्वास्थ्य सुविधा की कमी की पड़ रही है। ढेकवाहा पंचायत में एक भी प्राथमिक स्वास्थ्य उपकेंद्र या सरकारी डिस्पेंसरी नहीं है। बीमार पड़ने पर मरीज को 13 किलोमीटर दूर इस्लामपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाना पड़ता है।
रूपनचक गांव के योगेंद्र चौहान, श्रवण चौहान और मनोज चौहान ने गुस्से और निराशा भरे लहजे में कहा कि हमारे गांव को जोड़ने वाली पक्की सड़क पिछले पांच साल से टूटी पड़ी है। बारिश के दिनों में कीचड़ और गड्ढों के कारण एंबुलेंस तक नहीं आ पाती। गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों को कंधे पर उठाकर ले जाना पड़ता है। कई बार तो रास्ते में ही हालत बिगड़ जाती है।
ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायत में विकास के नाम पर सिर्फ भवन बनाए गए, लेकिन उन भवनों का कोई मतलब तब तक नहीं जब तक बुनियादी सुविधाएं न हों। आंगनवाड़ी में बच्चे आते हैं, लेकिन वहाँ पीने का साफ पानी तक नहीं। स्कूल में बच्चे पढ़ने आते हैं, लेकिन शौचालय का ताला जंग खा रहा है। पंचायत भवन में बैठक होती है, लेकिन मुद्दा हमारी समस्याओं का कभी नहीं उठता।
बहरहाल, ढेकवाहा पंचायत के हजारों लोग आज भी मूलभूत सुविधाओं को तरस रहे हैं। सरकारी योजनाओं के बड़े-बड़े दावों के बीच यह सवाल बार-बार उठ रहा है कि आखिर कब तक ग्रामीण इलाकों की इन पंचायतों को सिर्फ कागजी विकास दिखाकर ठगा जाएगा?





