संपादकीय टिप्पणीः ये सिस्टम तुम्हारे सपनों का हत्यारा है सोनम?

नालंदा दर्पण (जयप्रकाश नवीन)। शाहरूख खान की एक लोकप्रिय फिल्म का डायलाग है- कहते है अगर किसी चीज को दिल से चाहों तो कोई कायनात तुमसे मिलाने की कोशिश में लग जाती है’। शाहरुख खान ने ओम शांति ओम में जब डायलॉग बोला था तो सिनेमा घर तालियों से गूंज उठा था। इस रूमानी डायलॉग पर नयी उम्र के लड़के और लड़कियों की आंखों में आने वाली जिंदगी की गुलाबी सपने तैरने लगे थे। लेकिन आप मुंगेर की रहने वाली नालंदा कॉलेज आफ इंजीनियरिंग की उस होनहार छात्रा सोनम की आत्मा से पूछिएगा आपकी समझ में आ जाएगा कि जिंदगी की धरातल पर इससे फालतू और बाहियात डायलॉग कुछ नहीं मिलेगा। हम शर्मिंदा हैं सोनम, तुम्हें यहां के सिस्टम ने हरा दिया। सोनम! तुम सिविल इंजीनियर बनना चाहती थी, लेकिन ये सिस्टम तुम्हारे सपनों का हत्यारा है।

सोनम! मैं तुम्हें नहीं जानता, ना कभी मिला और ना कभी देखा, लेकिन मैं तुम्हारे अंदर लंबे समय से पल रहें द्वंद को मैं समझ सकता हूं। किसी सपने को खत्म करना आसान नहीं होता है। तुम्हारा खुदकुशी करने का निर्णय अचानक नहीं आया होगा, उससे पहले तुम्हारे सामने अपने माता-पिता,भाई बहन का चेहरा जरूर आया होगा, पिता के पसीने की महक और मां की ममता के प्यार की खुशबू तुम्हारे चेहरे से जरूर गुजरेगी होगी।

सोनम! दो साल पहले जब तुम अपने पालनहार की अंगुली थामे इस कॉलेज की दहलीज पर कदम रखी होगी तो तुम्हारे आंखों में सपने और रंगीन हो गई होगी। तुम्हारे सपनों की उड़ान को पंख लग गया होगा। अभी तुम्हें दो साल और इस कॉलेज में अपने सपने पूरे करने को रह गये थे। माता-पिता, भाई बहन को कितनी उम्मीद रही होगी तुमसे। सोनम से इंजीनियर सोनम देखने का। इंजीनियर का तमगा लगने से पहले इस कॉलेज से निकली तुम्हारी निर्जीव देह। नालंदा कॉलेज आफ इंजीनियरिंग के 17 साल में एक काली दाग लग गई है सोनम।

सोनम! मै नहीं जानता तुम्हारे खुदकुशी के पीछे का कारण क्या रहा होगा? वह तुम्हारी मौत के साथ ही दफन हो गई। लेकिन एक बात तो तय है कि तेरी मौत की वजह वह कॉलेज प्रशासन भी है, अगर तुम समय पर अस्पताल पहुंच जाती तो शायद तुम बच जाती।

तुम्हारे बैच के साथियों को भी शायद विश्वास नहीं हो रहा होगा कि तुम अब इस दुनिया में नहीं रही। कल तक तुम्हारी रूममेट शिखा तुम्हें खाना खाने के लिए कितना प्यार से कह रही थी। जब वह फिर से उस कमरे में आएगी तो तुम्हें बहुत ढूंढेगी। उसे लगेगा तुम शायद लौट आओगी– थोड़ी देर से, थकी हुई, मगर लौट आओगी!

लेकिन कोई नहीं जानता था कुछ देर पहले तुम जिस कमरे में थी, तुम्हारी निर्जीव देह तीन मंजिला छत से नीचे मिलेगी। तुम्हारे दोस्तों ने तुम्हें बचाने की बहुत कोशिश की होगी, कॉलेज के प्रिंसिपल ने गाड़ी देने से शायद  इसलिए मना कर दिया कि। उनकी लाखों की लग्जरी गाड़ी खून से गंदी हो जाएगी। तुम्हें किसी तरह आधे किलोमीटर दूर अस्पताल ले जाया गया लेकिन तुम बच नहीं पाई। आधा घंटा जिंदगी और मौत से लड़ाई लड़ते हुए जिंदगी से हार गई।

पुलिस और कॉलेज प्रशासन ने बड़ी आसानी से कह दिया “आत्महत्या।” जैसे इंसान की पूरी ज़िंदगी, उसके संघर्ष, उसके रिश्ते, उसकी चीखें, सब एक कागज़ पर लिखे गए सुसाइड नोट के हवाले कर दी जाएँ। पुलिस टीम फाइल में यूडी केस के रूप में सोनम तुम्हारा नाम जुड़ गया।

सोनम!  अगर यह सचमुच आत्महत्या थी, तो भी यह सिर्फ तुम्हारी नहीं, कॉलेज प्रबंधन की हार थी। और अगर यह हत्या है तो इसका जिम्मेदार भी कॉलेज सिस्टम है। यह हमारी इंसानियत की हत्या है। उस इंसानियत की हत्या जहां  शिक्षक वर्ग में बच्चों को पढ़ाते हैं, घायलों को अस्पताल पहुंचाना इंसानियत है। आज उसी इंसानियत और मनुष्यता का क़त्ल हुआ है।

मैं सोचता हूँ, तुम्हारे कॉलेज  की वो कक्षा अब कैसी होगी जहाँ तुम अपने सपनों की ताकत समझाती थीं? वो बोर्ड अब शायद धूल से भर गया होगा। तुम्हारी अनुपस्थिति सवाल पूछेंगे सोनम, तुम्हारी सहेलियां खिड़की से तुम्हारा इंतज़ार करेगी “सोनम कब आएँगी?” और कोई जवाब नहीं होगा।

सोनम!  तुम्हारे चले जाने के बाद, सिर्फ तुम्हारे घर का सन्नाटा नहीं बढ़ा, हमारी पूरी संवेदना का दायरा सिकुड़ गया है। यह देश अब बार-बार बेटियों को खोता है, और हर बार बहाना वही मिलता है- “आत्महत्या।” जैसे किसी होनहार छात्रा की जान लेना इस समाज में अब कोई असामान्य बात ही नहीं रही।

काश तुम आज होतीं तो मैं तुमसे कहता– तुम्हारी लड़ाई अधूरी नहीं जाएगी। तुम्हारी चुप्पी, तुम्हारे ज़ख्म, तुम्हारी मौत से निकली गंध, सब इस मुल्क की आत्मा को चीरते रहेंगे। और कभी न कभी, कोई और छात्रा जिसे तुमसे, इस सिस्टम से लड़ना सीखेगी, सच का सामना करेगी और पूछेगी “सोनम की मौत को क्यों छुपाया गया?”

सोनम! भले अब तुम इस दुनिया में नहीं रही, लेकिन शायद तुम्हारा बलिदान सिस्टम को सुधरने का मौका दें। यह घटना ना केवल कॉलेज प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाती है, बल्कि यह। भी सोचने को मजबूर करती है, क्या हमारे शैक्षणिक संस्थान ऐसी आपात स्थितियों के लिए पूरी तरह तैयार है?

सोनम! तुम्हारी मौत के बाद नालंदा इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रबंधन की खामियों को उजागर किया है।यह घटना एक चेतावनी के तरह है शैक्षणिक संस्थानों को अपनी जिम्मेदारियों को गंभीरता से लेना होगा, ताकि आगे चलकर कोई और सोनम सिस्टम की बलि न चढ़े। सोनम तुम्हारी मौत एक सबक है कि छात्रों की सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना कितना जरूरी है।

सोनम! तुम्हें खोना सिर्फ तुम्हारे घरवालों की त्रासदी नहीं, यह पूरी पीढ़ी का अपराध है। तुम्हारे नाम पर हम सबके हिस्से में एक स्थायी शर्म लिख दी गई है। जहाँ कहीं हो, सुकून से रहना। यहाँ तो इंसाफ़ भी अब पुलिस की रिपोर्ट में दम तोड़ देता है।

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नालंदा दर्पण (Nalanda Darpan) के संचालक-संपादक वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय (Mukesh Bhartiy) पिछले 35 वर्षों से समाचार लेखक, संपादक और संचार विशेषज्ञ के रूप में सक्रिय हैं। उन्हें समसामयिक राजनीति, सामाजिक मुद्दों, स्थानीय समाचार और क्षेत्रीय पत्रकारिता पर गहरी पकड़ और विश्लेषणात्मक अनुभव है। वे तथ्य आधारित, निष्पक्ष और भरोसेमंद रिपोर्टिंग के माध्यम से पाठकों तक ताज़ा खबरें और सटीक जानकारी पहुँचाने के लिए जाने जाते हैं। एक्सपर्ट मीडिया न्यूज़ (Expert Media News) सर्विस द्वारा प्रकाशित-प्रसारित नालंदा दर्पण (Nalanda Darpan) के माध्यम से वे स्थानीय समाचार, राजनीतिक विश्लेषण और सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाते हैं। उनका मानना है कि स्थानीय पत्रकारिता का उद्देश्य केवल खबर देना नहीं, बल्कि सच को जिम्मेदारी, प्रमाण और जनहित के साथ सामने रखना है। ताकि एक स्वस्थ समाज और स्वच्छ व्यवस्था की परिकल्पना साकार हो सके। More »

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