बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission) ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान में तीन महत्वपूर्ण तिथियों को नागरिकता सत्यापन का आधार बनाया है। यह अभियान केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि भारत के लोकतंत्र को और मजबूत करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम बताया जा रहा है।
आयोग ने स्पष्ट किया है कि वोट देने का अधिकार केवल भारत में जन्म लेने से नहीं, बल्कि भारतीय नागरिकता की कानूनी पुष्टि से तय होगा। ये तीन तिथियां 1 जुलाई 1955, 1 जुलाई 1987 और 3 दिसंबर 2004 लोकतंत्र के प्रवेश द्वार की तीन चाबियां हैं। इनमें से एक चाबी आपके पास हो तो आप भारत की महान लोकतांत्रिक यात्रा का हिस्सा बन सकते हैं।
बाता दें कि हर पांच साल में भारतीय नागरिक अपनी उंगली पर स्याही लगाकर सरकार चुनने और बनाने का जनादेश देता है। लेकिन सवाल यह है कि यह स्याही किसकी उंगली पर लगे? भारत निर्वाचन आयोग ने इस प्रश्न का उत्तर इतिहास, संविधान और नागरिकता कानून के आधार पर खोजा है।
परिणामस्वरूप तीन निर्णायक तिथियां सामने आई हैं, जो मतदाता सूची में नाम दर्ज करने के लिए अनिवार्य साक्ष्य का आधार बनती हैं। यह केवल नियमों की घोषणा नहीं, बल्कि लोकतंत्र के प्रवेश द्वार पर एक नया संदेश है- अपनी नागरिकता का प्रमाण प्रस्तुत करें और मतदाता सूची में स्थान पाएं।
पहली तिथि- 1 जुलाई 1955 से 1 जुलाई 1987: यह वह दौर था, जब भारत में जन्म लेना ही नागरिकता की पहचान था। माता-पिता की राष्ट्रीयता से कोई फर्क नहीं पड़ता था। भारतीय भूमि पर जन्म ही पर्याप्त था। इस अवधि में जन्मे व्यक्तियों से निर्वाचन आयोग केवल जन्म तिथि और जन्मस्थान का साक्ष्य मांगता है।
इस प्रावधान के तहत 1 जुलाई 1955 से 1 जुलाई 1987 के बीच भारत में जन्मा व्यक्ति भारतीय नागरिक माना जाता है। भले ही उसके माता-पिता की राष्ट्रीयता कुछ भी हो।
दूसरी तिथि- 1 जुलाई 1987: लेकिन उसके बाद केवल जन्मस्थान की गारंटी पर्याप्त नहीं है। 1987 तक देश में गैर-नागरिकों के बच्चों की संख्या में वृद्धि देखी गई थी। इसलिए 1986 में संसद ने नागरिकता कानून में संशोधन कर यह तय किया कि 1 जुलाई 1987 के बाद भारत में जन्मे व्यक्ति को तभी भारतीय नागरिक माना जाएगा, जब उसके जन्म के समय माता-पिता में से कम से कम एक भारतीय नागरिक हो। इस बदलाव ने नागरिकता को माता-पिता की राष्ट्रीयता से जोड़कर और सख्त कर दिया।
तीसरी तिथि- 3 दिसंबर 2004: यह लोकतांत्रिक व्यवस्था का यह सबसे सतर्क चरण है। 2003 में संसद ने नागरिकता संशोधन कानून पारित कर यह प्रावधान किया कि 3 दिसंबर 2004 या उसके बाद भारत में जन्मे व्यक्ति को तभी भारतीय नागरिक माना जाएगा, जब उसके दोनों माता-पिता भारतीय नागरिक हों।
इस कड़े नियम ने नागरिकता को और अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनाया। निर्वाचन आयोग ने इसी आधार पर मतदाता सूची के पुनरीक्षण अभियान को प्रभावी बनाया है।
