राजगीर (नालंदा दर्पण)। नालंदा विश्वविद्यालय के सुषमा स्वराज आडिटोरियम में एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण आयोजन संपन्न हुआ, जिसमें ‘ज्ञान दण्ड’ की स्थापना की गई। यह पहल भारतीय ज्ञान परंपरा की निरंतरता और उसके संवर्धन का प्रतीक मानी जा रही है। नालंदा विश्वविद्यालय, जो प्राचीन काल से ही शिक्षा, दर्शन और साहित्य का वैश्विक केंद्र रहा है, अब आधुनिक युग में भी अपनी गौरवशाली परंपरा को पुनर्जनन देने के लिए संकल्पबद्ध है।
‘ज्ञान दण्ड’ केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि उस अखंड ज्ञान धारा का द्योतक है, जिसने भारत को विश्वगुरु के रूप में स्थापित किया था। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी ने इस अवसर पर कहा, ‘यह हमारे लिए गर्व का विषय है कि ‘ज्ञान दण्ड’ की स्थापना नालंदा की समृद्ध परंपरा से जुड़ने का एक अनूठा प्रयास है। यह न केवल भारत की प्राचीन ज्ञान प्रणाली को पुनर्जीवित करने की दिशा में एक कदम है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों को शोध, विमर्श और सृजन के लिए प्रेरित करेगा।’
‘ज्ञान दण्ड’ भारतीय परंपरा में विद्या, बुद्धि और संस्कृति के संरक्षण का प्रतीक है। यह स्थापना नालंदा विश्वविद्यालय के उस संकल्प को दर्शाती है, जो प्राचीन और आधुनिक ज्ञान के बीच एक सेतु बनाकर वैश्विक मंच पर भारतीय दर्शन और संस्कृति की प्रासंगिकता को रेखांकित करता है।
नालंदा विश्वविद्यालय प्राचीन काल में विश्व भर के विद्वानों के लिए एक तीर्थस्थल था, जहाँ दर्शन, गणित, विज्ञान और साहित्य की गहन चर्चाएँ होती थीं। इस गौरवशाली परंपरा को पुनर्जनन देने के लिए विश्वविद्यालय ने कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए हैं।
इस अवसर पर कुलपति ने घोषणा की कि नालंदा विश्वविद्यालय आगामी वर्ष में भारतीय ज्ञान प्रणाली (आईकेएस) सम्मेलन के अगले संस्करण की मेजबानी करेगा। यह सम्मेलन वैश्विक स्तर पर भारतीय दर्शन, संस्कृति और साहित्य की प्रासंगिकता को नए आयाम प्रदान करेगा।
कुलपति ने आगे कहा, ‘ज्ञान दण्ड’ की स्थापना भविष्य में गहन संवाद, शोध और साहित्य सृजन को नई दिशा देगी। यह पहल भारत की सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत करने और विश्व स्तर पर भारतीय ज्ञान परंपरा को नई ऊर्जा प्रदान करने का मार्ग प्रशस्त करेगी।’
‘ज्ञान दण्ड’ की स्थापना नालंदा विश्वविद्यालय के उस दृष्टिकोण का हिस्सा है, जो आधुनिक शिक्षा प्रणाली में भारतीय ज्ञान परंपरा को समाहित करने का प्रयास करता है। यह पहल न केवल शैक्षणिक समुदाय को प्रेरित करेगी, बल्कि विश्व भर के विद्वानों और शोधकर्ताओं को भारतीय दर्शन और संस्कृति की गहराई से परिचित होने का अवसर भी प्रदान करेगी।
नालंदा विश्वविद्यालय के इस प्रयास ने स्थानीय और वैश्विक स्तर पर सकारात्मक प्रतिक्रिया प्राप्त की है। यह आयोजन न केवल नालंदा की सांस्कृतिक और शैक्षणिक विरासत को पुनर्जनन देता है, बल्कि यह भारत को एक बार फिर से विश्व के ज्ञान केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।
यह पहल न केवल शैक्षणिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है, बल्कि यह भारत की प्राचीन ज्ञान धारा को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का एक अनूठा प्रयास भी है। नालंदा विश्वविद्यालय का यह कदम निश्चित रूप से भविष्य में ज्ञान, शोध और सांस्कृतिक संवाद के लिए नए द्वार खोलेगा।
