फ्रॉड टीचर रैकेट: इस्लामपुर में 36 ‘भूत’ शिक्षकों की जांच रिपोर्ट पर चुप्पी क्यों?

हिलसा (नालंदा दर्पण)। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि आपके इलाके के स्कूलों में ऐसे शिक्षक काम कर रहे हैं, जिन्हें कभी किसी ने देखा ही नहीं? जी हां, नालंदा जिले के इस्लामपुर प्रखंड में एक ऐसा ही चौंकाने वाला रैकेट सामने आया है, जहां 36 ‘भूत’ टीचर्स के नाम पर सालों से वेतन निकलता रहा।

2022 से 2024 तक चला यह खेल अब जांच रिपोर्ट के आने के बावजूद ठंडे बस्ते में पड़ा है। सवाल यह है कि क्या शिक्षा विभाग के बड़े अधिकारी इस साजिश में शामिल हैं, या फिर सिस्टम इतना कमजोर है कि माफिया आसानी से घुसपैठ कर लेते हैं? नालंदा दर्पण की विशेष रिपोर्ट में हम इस घोटाले की परतें खोलते हैं, जो न सिर्फ शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाती है, बल्कि पूरे जिले में ऐसे और रैकेट की आशंका जताती है।

यह कहानी शुरू होती है 2022 से, जब इस्लामपुर के 15 सरकारी स्कूलों में अचानक 36 नए शिक्षकों के नाम यू-डायस (Unified District Information System for Education) के रिकॉर्ड में जुड़ गए। ये नाम ऐसे थे, मानो आसमान से टपक पड़े हों।

जांच रिपोर्ट, जो अब सार्वजनिक हो चुकी है, वह साफ-साफ बताती है कि इन स्कूलों के हेडमास्टरों ने लिखित में कबूल किया है कि इन नामों वाले कोई व्यक्ति हमारे यहां कभी नियुक्त नहीं हुए, न ही कभी क्लासरूम में दिखे।

फिर भी इन ‘अदृश्य’ शिक्षकों ने न सिर्फ ड्यूटी की, बल्कि हर महीने वेतन भी हासिल किया। अनुमान है कि इस रैकेट से लाखों रुपये की सरकारी राशि का दुरुपयोग हुआ, जो बच्चों की शिक्षा पर खर्च होनी चाहिए थी।

जांच से पता चला कि 2021-22 के यू-डायस रिकॉर्ड में ये नाम कहीं नहीं थे। लेकिन 2022-23 की प्रिंट कॉपी में इन्हें बिना किसी सत्यापन के शामिल कर लिया गया।

सूत्रों के मुताबिक शिक्षा माफिया ने सिस्टम में घुसपैठ की। पहले फर्जी नामों को यू-डायस में एंट्री करवाई गई। फिर चुनाव ड्यूटी और परीक्षा ड्यूटी जैसे कामों में इनका इस्तेमाल किया गया।

धीरे-धीरे इन्हें असली शिक्षकों की लिस्ट में शामिल कर लिया गया। सामूहिक तबादलों के मौके पर इन फर्जी नामों को स्कूलों में ‘भेज’ दिया गया और वेतन का सिलसिला शुरू हो गया। आखिर यू-डायस एंट्री कौन करता है? क्या ब्लॉक शिक्षा पदाधिकारी या जिला स्तर के अधिकारी इसमें शामिल थे?

रिपोर्ट की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह रैकेट सिर्फ इस्लामपुर तक सीमित नहीं लगता। जांचकर्ताओं का मानना है कि पूरे नालंदा जिले में अगर गहन जांच हो तो सैकड़ों ऐसे फर्जी नाम सामने आ सकते हैं।

उदाहरण के लिए कुछ स्कूलों में तो ऐसे शिक्षकों के नाम मिले, जिनके आधार कार्ड या अन्य दस्तावेज भी फर्जी पाए गए। लेकिन सवाल यह है कि जब हेडमास्टर खुद लिखकर दे रहे हैं कि उनके स्कूल में ये लोग कभी आए ही नहीं तो फिर इन नामों को सिस्टम में किसने डाला? और जांच रिपोर्ट आने के एक साल बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? क्या शिक्षा माफिया इतने ताकतवर हैं कि फाइलें दबा दी जाती हैं?

इस घोटाले ने स्थानीय लोगों को हिलाकर रख दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यू-डायस जैसे डिजिटल सिस्टम को मजबूत बनाने की जरूरत है, जहां हर एंट्री का रीयल-टाइम वेरिफिकेशन हो। बायोमेट्रिक अटेंडेंस या आधार लिंकिंग जैसे कदम उठाए जा सकते हैं, लेकिन फिलहाल तो सिस्टम में छेद इतने बड़े हैं कि माफिया आसानी से घुस जाते हैं।

नालंदा जिला शिक्षा पदाधिकारी से जब इस बारे में संपर्क किया गया तो उन्होंने टिप्पणी करने से इन्कार कर दिया और कहा कि मामला जांच के अधीन है। लेकिन यह सवाल बना हुआ है कि आखिर इस खेल का मास्टरमाइंड कौन है? क्या कोई बड़ा अधिकारी या राजनीतिक शख्सियत?

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