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अनमोल साहित्य और सांस्कृतिक धरोहर का संगम है गिरियक

नालंदा दर्पण डेस्क। नालंदा जिला बिहार का एक ऐसा क्षेत्र है, जो अपनी प्राचीनता सांस्कृतिक धरोहर और ऐतिहासिक महत्व के लिए विश्वविख्यात है। इस जिले का गिरियक गांव न केवल पुरातात्विक अवशेषों और बौद्ध धरोहरों के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यह साहित्य, संस्कृति और इतिहास के संगम का एक जीवंत उदाहरण भी है।

Giriak is a confluence of precious literature and cultural heritage 10
Giriak is a confluence of precious literature and cultural heritage

हाल ही में बिहार सरकार द्वारा गिरियक नगर अंतर्गत ईशापुर गांव और बरनामा मार्ग की ओर नवादा जिला प्रवेश के लिए भूमि अधिग्रहण की अनुशंसा ने इस क्षेत्र को फिर से चर्चा में ला दिया है। यह कदम न केवल गिरियक के भूगोल को बदलने की क्षमता रखता है, बल्कि यह क्षेत्र के विकास और पर्यटन की नई संभावनाओं को भी खोल सकता है।

गिरियक को नालंदा जिले का एक प्राचीन बौद्ध गांव माना जाता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संस्थापक और प्रथम निदेशक अलेक्जेंडर कनिंघम ने इस क्षेत्र की इंद्रशीला गुहा की पहचान गिरियक गांव से की थी। राजगृह के समीप स्थित गिरियक पहाड़ी पर आज भी एक प्राचीन स्तूप मौजूद है।

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Giriak is a confluence of precious literature and cultural heritage

कहा जाता है कि यह जरासंध के सिंहासन का स्थान था। पहाड़ी की तलहटी में बिखरे बौद्ध अवशेष और अशोककालीन ईंटों से बने ढांचे इस क्षेत्र की प्राचीनता को प्रमाणित करते हैं।

गिरियक की विशाल पत्थर संरचनाएं, जिन्हें साइक्लोपियन दीवार और पिपली स्टोन हाउस के समकालीन माना जाता है, वह पौराणिक राजा जरासंध से जुड़ी हैं। स्थानीय लोककथाओं के अनुसार इन संरचनाओं का निर्माण जरासंध के शासनकाल में हुआ था।

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एक रोचक किंवदंती के अनुसार बौद्ध भिक्षुओं ने यहां एक मृत हंस के शरीर पर स्तूप का निर्माण किया था। कनिंघम को खुदाई के दौरान एक टूटी हुई मूर्ति का हिस्सा मिला, जिसमें हंस की नक्काशी थी, जो इस किंवदंती को ऐतिहासिक आधार प्रदान करती है।

महाभारत काल से जुड़ी कथाएं गिरियक को और भी रोचक बनाती हैं। कथा के अनुसार जब पांडवों की सेना राजगृह की अभेद्य दीवारों को भेदने में असमर्थ रही, तो उन्होंने गिरियक पहाड़ी की तलहटी में डेरा डाला।

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माना जाता है कि राजगृह के चारों ओर बनी विशाल दीवार का निर्माण राजा जरासंध ने पांडवों को प्रवेश करने से रोकने के लिए करवाया था। इसी स्थान पर भीम और जरासंध के बीच 27 दिनों तक चला भीषण द्वंद्युद्ध हुआ, जिसका अंत जरासंध की मृत्यु के साथ हुआ।

गिरियक का बौद्ध धर्म से भी गहरा नाता रहा है। यह वह पवित्र स्थल है जहां भगवान बुद्ध के प्रमुख शिष्य सारिपुत्र का जन्म हुआ था। बाद में उन्होंने गिरियक पहाड़ी के समीप एक गांव में परिनिर्वाण प्राप्त किया।

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चीनी यात्रियों फैह्यान (5वीं शताब्दी) और ह्वेन त्सांग (7वीं शताब्दी) के यात्रा वृत्तांतों में इस क्षेत्र का उल्लेख मिलता है, जो इसकी धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता को रेखांकित करता है।

गिरियक पहाड़ी से प्राप्त एक अभिलेख वर्तमान में पटना म्यूजियम में सुरक्षित है। जो यह दर्शाता है कि 12वीं शताब्दी तक लोग मथुरा से गिरियक दान देने आते थे। कनिंघम के अनुसार गिरियक का स्तूप संभवतः 500 ईस्वी के आसपास बनाया गया था, जो इस क्षेत्र की प्राचीन बौद्ध विरासत का प्रतीक है।

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हाल के घटनाक्रम में बिहार सरकार ने गिरियक के ईशापुर गांव और बरनामा मार्ग के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू करने की अनुशंसा की है। यह कदम क्षेत्र के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और इसे पर्यटन और शोध के लिए एक आकर्षक केंद्र बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण है। इस अधिग्रहण से सड़क संपर्क, बुनियादी सुविधाएं और पर्यटन स्थलों का विकास संभव हो सकेगा, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बल मिलेगा।

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Giriak is a confluence of precious literature and cultural heritage

वेशक गिरियक नालंदा जिले का वह ऐतिहासिक स्थल है, जो प्राचीन भारत की गौरवगाथा को आज भी जीवंत रखता है। यहाँ की विशाल दीवारें, बौद्ध अवशेष, प्राचीन स्तूप और लोककथाएं इस क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का प्रमाण हैं।

सरकारी पहल और विकास कार्यों के साथ गिरियक जल्द ही एक प्रमुख पर्यटन और शोध केंद्र के रूप में उभर सकता है। यह स्थान न केवल इतिहास प्रेमियों के लिए, बल्कि उन सभी के लिए आकर्षण का केंद्र है, जो भारत की प्राचीन धरोहर को करीब से जानना चाहते हैं।

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