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हरनौत विधानसभा: नीतीश का चटकता चेहरा ही हरिनारायण का एकमात्र सहारा !

नालंदा दर्पण डेस्क/मुकेश भारतीय। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की रणभूमि में नालंदा जिले का हरनौत विधानसभा क्षेत्र एक बार फिर राजनीतिक सरगर्मियों का गढ़ बन चुका है। जनता दल (यूनाइटेड) के दिग्गज नेता हरिनारायण सिंह 2010 से इस सीट पर अजेय रहे हैं। 84 वर्षीय सिंह इस बार 13वीं बार चुनावी अखाड़े में कूदे हैं और उनकी निगाहें 10वीं जीत पर टिकी हैं,जो उन्हें बिहार का सबसे ज्यादा बार जीतने वाला विधायक बना देगी। लेकिन हवा में बगावत की खुशबू और स्थानीय विकास की उपेक्षा से उपजा आंतरिक जनाक्रोश सबको साफ महसूस हो रहा है कि इस बार की परिस्थितियां उतना आसान नहीं है।

Harnaut Assembly Nitish shining face is Harinarayan only support 1बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की घोषणा के बाद जदयू ने 15 अक्टूबर को जारी अपनी पहली उम्मीदवार सूची में हरिनारायण सिंह को ही टिकट थमाया, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार का नाम गायब रहने या अन्य प्रमुख दावेदारों को तरजीह नहीं दिए जाने से पार्टी कार्यकर्ताओं में भारी असंतोष फैल गया।

अब 6 नवंबर को होने वाले मतदान से महज कुछ दिन पहले हरनौत के खेतों, गलियों और चाय की दुकानों पर फुसफुसाहटें गूंज रही हैं कि क्या नीतीश कुमार का ‘होम ग्राउंड’ इस बार फिसल जाएगा? 1977 से 2020 तक के 12 चुनावों के ऐतिहासिक आंकड़े और ताजा सर्वेक्षण जदयू के कमजोर पड़ते वर्चस्व की कहानी बयां कर रहे हैं। वोटों का अंतर लगातार सिकुड़ रहा है, विपक्ष की ताकत बढ़ रही है। आइए, आंकड़ों की इस लंबी गाथा को खंगालें और वर्तमान की कड़वी सच्चाई से जोड़ें।

ऐतिहासिक आईना: 1977 से 2020 तक की जंग, जदयू का उत्थान और अब पतन की साफ आहट

हरनौत विधानसभा क्षेत्र नालंदा जिले का कुर्मी-ईबीसी बहुल इलाका है, जो 1977 में अलग विधानसभा के रूप में उभरा। इससे पहले (1952-1972) यह अन्य संयोजनों में था, इसलिए आंकड़े 1977 से शुरू होते हैं। कुल 12 चुनावों में जदयू और उसके पूर्ववर्ती दलों (जेनेप, एलकेडी, एसएपी, जेडीयू) ने 6 बार जीत हासिल की, जबकि निर्दलीय और अन्य पार्टियों ने भी 6 बार बाजी मारी।

नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर इसी मैदान से शुरू हुआ। 1985 में उन्होंने यहां पहली जीत दर्ज की। लेकिन 2010 में हरिनारायण सिंह के आने के बाद यह जदयू का ‘अभेद दुर्ग’ बन गया। वर्षवार आंकड़े विजेता, उपविजेता, वोट शेयर, अंतर और मतदान प्रतिशत साफ दर्शाते हैं कि जदयू का दबदबा कैसे मजबूत हुआ, लेकिन विपक्ष की चुनौती भी कैसे तेज हुई। नीचे दी गई तालिका इसकी गवाही देती है।

वर्ष विजेता (पार्टी) वोट वोट शेयर (%) उपविजेता (पार्टी) वोट अंतर (वोट) कुल वोट टर्नआउट (%)
1977 भोला प्रसाद सिंह (IND) 28,228 40.3 नीतीश कुमार (JNP) 22,333 5,895 70,091 64.31
1980 अरुण कुमार सिंह (IND) 22,878 29.6 नीतीश कुमार (JNP(SC)) 17,818 5,060 77,295 66.26
1985 नीतीश कुमार (LKD) 49,990 53.5 वीरज नंदन प्रसाद सिंह (INC) 28,578 21,412 93,571 75.74
1990 ब्रज नंदन यादव (IND) 19,562 19.5 भोला प्रसाद सिंह (JD) 14,283 5,279 1,00,487 64.58
1995 नीतीश कुमार (SAP) 40,079 38.6 विश्व मोहन चौधरी (JD) 27,837 12,242 1,03,894 65.13
2000 विश्व मोहन चौधरी (SAP) 47,530 40.3 सुनील कुमार (RJD) 39,773 7,757 1,17,975 70.62
फेब-2005 सुनील (JD(U)) 45,909 58.5 सुधीर कुमार (LJP) 10,962 34,947 78,514
अक्टू-2005 सुनील (JD(U)) 44,110 60.9 उदय शंकर (RJD) 11,517 32,593 72,379
2010 हरिनारायण सिंह (JD(U)) 56,827 47.3 अरुण कुमार (LJP) 41,785 15,042 1,20,103 49.63
2015 हरिनारायण सिंह (JD(U)) 71,933 45.9 अरुण कुमार (LJP) 57,638 14,295 1,56,695 54.42
2020 हरिनारायण सिंह (JD(U)) 65,404 41.2 ममता देवी (LJP) 38,163 27,241 1,58,608 51.47

आंकड़ों का गहन विश्लेषण: उतार-चढ़ाव की कहानी और कमजोर पड़ता आधार

1977 से 2000 तक का दौर निर्दलीय और विपक्षी दलों (INC, JD, RJD) का रहा, जहां जदयू पूर्वजों का औसत वोट शेयर 35-40% के आसपास घूमता था। लेकिन 2005 में जदयू ने जोरदार पलटवार किया। फरवरी और अक्टूबर दोनों चुनावों में 58-60% वोट शेयर के साथ। हरिनारायण सिंह के युग (2010-2020) में वोट शेयर 41-47% रहा, लेकिन जीत का अंतर लगातार घटता गया: 2010 में 12.5%, 2015 में 9.1%, 2020 में 17.2% (हालांकि वोटों में बढ़ोतरी के बावजूद प्रतिशत कम)। कुल वैध वोट 70,000 से बढ़कर 1.58 लाख हो गए, लेकिन मतदान प्रतिशत 50-55% पर स्थिर।

जदयू का कोर आधार कुर्मी-कोएरी (ईबीसी: लगभग 35%) रहा, लेकिन मुस्लिम-यादव और दलित समुदाय (20-25%) महागठबंधन की ताकत बने। यदि 2025 में मतदान 55% से ऊपर चला गया तो विपक्ष को सीधा लाभ मिलेगा, क्योंकि असंतुष्ट वोटर बाहर निकलेंगे।

ताजा हलचल: बगावत की लपटें, नामांकन विवाद और नीतीश की परीक्षा

30 अक्टूबर तक की ग्राउंड स्थिति डावांडोल है। 14 अक्टूबर को हरिनारायण सिंह ने नामांकन दाखिल किया, लेकिन जदयू कार्यकर्ताओं की परिवारवाद पर नाराजगी ने विरोध की चिंगारी सुलगा दी। सिंह के पुत्र को 2020 में टिकट न मिलने का पुराना जख्म ताजा हो गया और निशांत कुमार का नाम कटने या असक्षमता की स्थिति में अन्य प्रमुख दावेदार से ‘नीतीश परिवार’ की छवि धूमिल हुई।

नीतीश की 25-28 अक्टूबर की नालंदा रैलियों में भीड़ पिछले चुनावों से 20% कम रही। 74 वर्षीय नीतीश की ‘पलटीमार’ छवि और शारीरिक थकान पर लोग चुटकी लेते हैं—’सुशासन बाबू अब सुस्तासन बाबू’। सिंह खुद रैलियों में कहते फिरते हैं, “वोट नीतीश जी को, मैं तो सिर्फ सिपाही हूं।” लेकिन स्थानीय मुद्दे जर्जर सड़कें, बाढ़ से तबाह खेती, बिजली की किल्लत उनकी अनदेखी उजागर कर रहे हैं। भाजपा कुछ हद तक सक्रिय दिखती हैं, लेकिन एनडीए के अन्य सहयोगी (लोजपा, हम) का प्रयास कमजोर है। भीतरघात की आशंका बनी हुई है। लोजपा ने 2020 में 24% वोट काटे थे, इस बार उससे बड़ी टक्कर महगठबंधन के कांग्रेस प्रत्याशी मुमकिन।

महागठबंधन (कांग्रेस उम्मीदवार) और प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी मुद्दों को भुनाने में लगी हैं। एक ताजा ओपिनियन पोल में जदयू का वोट शेयर 38% (2020 के 41% से कम) और विपक्ष 42% दिख रहा है। वोट स्प्लिट हुआ तो सिंह के लिए महंगा पड़ सकता है।

गहरा विश्लेषण: वोट बैंक में दरारें, प्रोजेक्शन और छिपे खतरे

आंकड़े चीख-चीखकर बता रहे हैं कि जदयू का कोर वोट (कुर्मी-ईबीसी: 35%) अभी मजबूत, लेकिन ओबीसी में 10% क्षरण। 2020 में NOTA को 5,523 वोट मिले। जोकि असंतोष का स्पष्ट संकेत है। सोशल मीडिया (X पोस्ट्स) और ग्राउंड रिपोर्ट्स से पता चलता है कि परिवारवाद ने 15-20% कार्यकर्ताओं को नाराज कर दिया। नीतीश फैक्टर अब 25% तक सिमट गया। पहले यह 40% था।

प्रोजेक्शन (अनुमानित): यदि मतदान 52% रहा तो जदयू 60,000-65,000 वोट (38%), महागठबंधन 55,000 (35%), जनसुराज 20,000 (13%), अन्य 20,000। जीत का अंतर महज 5,000-8,000 यानि सच्ची कांटे की टक्कर!

खतरे: भीतरघात से 5% वोट लीकेज। स्थानीय गुस्से से मतदान बढ़ना। मजबूती  नीतीश की रैलियां यदि असरदार रहीं तो 45% शेयर संभव। हरनौत नीतीश की साख का आईना है। यहां हार हुई तो नालंदा का पूरा गढ़ हिल सकता है।

12 नवंबर का फैसला, नई सुबह या पुरानी छांव?

बिहार के ‘सुशासन बाबू’ यानि 74 वर्षीय नीतीश कुमार अब थकान के बादल तले नजर आ रहे हैं। बार-बार गठबंधन बदलना- आरजेडी से भाजपा और फिर वापस भाजपा। उनकी ‘पलटीमार’ छवि को मजबूत कर चुका है। लोग फुसफुसाते हैं कि नीतीश जी अब पहले जैसे तुरुप्पू नहीं हैं। शारीरिक कमजोरी साफ दिखती है। उनके हर फैसले में हिचक दिखती है। हरिनारायण सिंह की हालत भी वैसी ही है। उम्रदराज होने से सक्रियता घटी है और वे खुद को सिर्फ ‘नीतीश का सिपाही’ बताते हैं।

हरनौत के चाय-पान की दुकानों से लेकर खेतों तक एक ही आवाज गूंज रही है कि हरिनारायण सिंह ने तो बस नीतीश जी का नाम लिया अपना चेहरा नहीं दिखाया! सिंह ने पहले खुद कई सभाओं में कहा है कि मैं अब चुनाव नहीं लड़ूंगा, लोग वोट नीतीश कुमार को देते हैं, उन्हें नही। लेकिन यही उनकी सबसे बड़ी भूल साबित हो रही है। क्षेत्र में टूटे हुए सड़कें पुल-पुलिया, सिंचाई, बिजली-पानी का संकट पुराना दर्द और युवा दिल्ली-मुंबई के चक्कर काट रहे जैसे मुद्दे तेजी से उभरे हैं।

एक स्थानीय कार्यकर्ता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि सिंह साहब नीतीश जी के भरोसेमंद हैं, लेकिन यहां के मुद्दों से कटे हुए हैं। विकास के नाम पर सिर्फ घोषणाएं और खानापूर्ती। यह धारणा 2025 चुनाव में जदयू के लिए घातक साबित हो सकती है, खासकर जब टर्नआउट 40-45% के आसपास रहने की उम्मीद है। ऐसे में जदयू का यह गढ़ बरकरार रहेगा या नया सूरज उगेगा? परिणाम 12 नवंबर को साफ करेंगे कि ‘नीतीश मैजिक’ में कितना दम बाकी है?

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नालंदा दर्पण (Nalanda Darpan) के संचालक-संपादक वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय (Mukesh Bhartiy) पिछले 35 वर्षों से समाचार लेखक, संपादक और संचार विशेषज्ञ के रूप में सक्रिय हैं। उन्हें समसामयिक राजनीति, सामाजिक मुद्दों, स्थानीय समाचार और क्षेत्रीय पत्रकारिता पर गहरी पकड़ और विश्लेषणात्मक अनुभव है। वे तथ्य आधारित, निष्पक्ष और भरोसेमंद रिपोर्टिंग के माध्यम से पाठकों तक ताज़ा खबरें और सटीक जानकारी पहुँचाने के लिए जाने जाते हैं। एक्सपर्ट मीडिया न्यूज़ (Expert Media News) सर्विस द्वारा प्रकाशित-प्रसारित नालंदा दर्पण (Nalanda Darpan) के माध्यम से वे स्थानीय समाचार, राजनीतिक विश्लेषण और सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाते हैं। उनका मानना है कि स्थानीय पत्रकारिता का उद्देश्य केवल खबर देना नहीं, बल्कि सच को जिम्मेदारी, प्रमाण और जनहित के साथ सामने रखना है। ताकि एक स्वस्थ समाज और स्वच्छ व्यवस्था की परिकल्पना साकार हो सके। More »

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