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यहां 76 बच्चों की जान पर जर्जर भवन की लटक रही तलवार

चंडी (नालंदा दर्पण)। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक स्कूल का छत इतना जर्जर हो कि प्लास्टर के टुकड़े गिरते रहें और बच्चे हर पल हादसे की आशंका में पढ़ाई करें? नालंदा जिले के चंडी प्रखंड अंतर्गत अरौत पंचायत के प्राथमिक विद्यालय शहवाजपुर की हकीकत यही है। यहां का पुराना भवन बदहाली की ऐसी जीती-जागती मिसाल पेश कर रहा है कि देखने वाले दंग रह जाते हैं।

फोटो में साफ दिख रही छत की हालत जहां लोहे की सरिया उखड़ रही है, प्लास्टर बड़े-बड़े टुकड़ों में गिर चुका है और दीवारें नमी से सड़ रही हैं। यह न सिर्फ शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाती है, बल्कि बच्चों की सुरक्षा को भी खतरे में डाल रही है।

विद्यालय में कुल दो ही कमरे हैं, जो चार दशक से ज्यादा पुराने हैं। इनमें से एक कमरे में आंगनबाड़ी केंद्र संचालित होता है, जहां छोटे बच्चों की देखभाल और प्रारंभिक शिक्षा दी जाती है। दूसरा कमरा पहली से पांचवीं कक्षा तक के 76 नामांकित बच्चों के लिए है।

फोटो में दिख रही कक्षा की तस्वीर दिल दहला देती है। नीली वर्दी पहने बच्चे जमीन पर बैठकर पढ़ाई कर रहे हैं, जबकि पीछे एक शिक्षक खड़े हैं। कमरे की दीवारें फीकी पड़ चुकी हैं, और जगह इतनी तंग है कि बच्चे एक-दूसरे से सटकर बैठे हैं।

यहां सात शिक्षक तैनात हैं, लेकिन जगह की कमी और भवन की जर्जरता के कारण पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हो रही है। शिक्षक बताते हैं कि छत से गिरते प्लास्टर के कारण वे अक्सर बच्चों को बाहर बिठाकर पढ़ाते हैं, लेकिन बारिश या तेज धूप में यह भी संभव नहीं होता।

अभिभावकों की व्यथा सुनकर मन विचलित हो जाता है। स्थानीय निवासी बताते हैं कि हमारे बच्चे यहां पढ़ते हैं, लेकिन हर रोज डर लगा रहता है कि कहीं छत न गिर जाए। हमने कई बार ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (बीईओ), जिला कार्यक्रम अधिकारी (डीपीओ) और यहां तक कि शिक्षा सचिव को भी लिखित शिकायत की, लेकिन सुधार के नाम पर सिर्फ आश्वासन मिले। क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार किया जा रहा है?

एक अन्य अभिभावक ने बताया कि बच्चे घर आकर शिकायत करते हैं कि क्लास में प्लास्टर गिरने से ध्यान नहीं लगता। फोटो में छत की स्थिति देखकर यह स्पष्ट है कि नमी और जंग ने लोहे की सरिया को कमजोर कर दिया है, जो कभी भी बड़ा खतरा बन सकता है।

बता दें कि यह स्कूल कच्चे गारे से बना है, जो समय के साथ और बिगड़ता जा रहा है। जिले में शिक्षा सुधार की बड़ी-बड़ी योजनाएं चल रही हैं, लेकिन ग्रामीण इलाकों के ऐसे स्कूलों पर ध्यान क्यों नहीं?

विशेषज्ञों का मानना है कि पुराने भवनों की मरम्मत या नए निर्माण के लिए फंड की कमी नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति की कमी है। अगर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो यह बदहाली न सिर्फ शिक्षा को प्रभावित करेगी, बल्कि बच्चों के भविष्य को भी अंधकारमय बना देगी।

Editor

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय पिछले तीन दशक से राजनीति, प्रशासन, सरकार को लेकर स्थानीय, राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर बतौर News Witer Editor सक्रिय हैं।

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