वार्ड पार्षद को तीसरी संतान छिपाना पड़ा भारी, निर्वाचन रद्द, पुनः होगा चुनाव

बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। बिहारशरीफ नगर निगम के वार्ड संख्या 38 की वार्ड पार्षद उषा देवी को अपनी तीसरी संतान की जानकारी छिपाना महंगा पड़ गया है। राज्य निर्वाचन आयोग ने उन्हें नगर पालिका अधिनियम के उल्लंघन का दोषी पाते हुए अयोग्य घोषित कर दिया है। अब उनके वार्ड में फिर से चुनाव कराए जाएंगे। यह निर्णय वार्ड के दो नागरिकों पप्पू कुमार और रवि कुमार द्वारा दायर शिकायत की जांच के बाद लिया गया है।

दरअसल, उषा देवी ने वार्ड पार्षद पद के लिए नामांकन दाखिल करते समय हलफनामे में अपनी तीसरी संतान की जानकारी नहीं दी थी। बाद में जब इस पर आपत्ति जताई गई तो जांच में सामने आया कि उषा देवी की तीन पुत्रियां हैं और तीसरी संतान की जन्मतिथि 4 अप्रैल 2008 के बाद की है। इसी आधार पर उन्हें अयोग्य घोषित किया गया है, क्योंकि नगर पालिका अधिनियम के अनुसार उक्त तिथि के बाद तीसरी संतान होना सार्वजनिक पद पर निर्वाचित होने की पात्रता को समाप्त कर देता है।

जब शिकायत दर्ज हुई, तब उषा देवी और उनके पति ने दावा किया कि तीसरी संतान को उन्होंने एक निकट संबंधी को गोद दे दिया था। लेकिन जांच में पाया गया कि यह बच्ची नवादा जिले के एक सरकारी शिक्षक के पास रह रही है, जो उषा देवी के रिश्तेदार हैं। जांच के दौरान उक्त शिक्षक ने स्वीकार किया कि बच्ची उनकी जैविक संतान नहीं है। नवादा के एसडीओ, नालंदा के डीडीसी और डीएम स्तर पर की गई जांच में यह स्पष्ट हुआ कि उषा देवी ने तथ्यों को छिपाया और गलत शपथपत्र दिया।

राज्य निर्वाचन आयुक्त डॉ. दीपक कुमार ने पूरे मामले की समीक्षा कर जिला प्रशासन को निर्देश दिया है कि पार्षद द्वारा शपथ पत्र में दी गई गलत जानकारी पर नियमानुसार कार्रवाई की जाए। इसके साथ ही वार्ड संख्या 38 में पुनः चुनाव कराने की भी घोषणा की गई है।

वहीं, इस मामले में उषा देवी के प्रतिनिधि शिवशंकर प्रसाद ने कहा है कि वे इस निर्णय को पटना हाईकोर्ट में चुनौती देंगे। उनका कहना है कि उन्हें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है और वे साबित करेंगे कि उन्होंने कोई गलत कार्य नहीं किया है।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद वार्ड संख्या 38 के लोग असमंजस में हैं। उन्हें अब एक बार फिर चुनावी प्रक्रिया से गुजरना होगा। जहां एक ओर लोगों में पारदर्शिता की उम्मीद जगी है। वहीं दूसरी ओर पुनः मतदान के कारण प्रशासनिक तैयारियों और मतदाताओं की भागीदारी पर फिर से सवाल उठ रहे हैं।

बहरहाल, यह मामला केवल एक जनप्रतिनिधि के पद से हटने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस नैतिक जिम्मेदारी को भी रेखांकित करता है, जो किसी भी जनप्रतिनिधि से अपेक्षित होती है। कानून की नजर में गोद देने की मौखिक घोषणा या व्यक्तिगत व्यवस्था तब तक मान्य नहीं मानी जाती, जब तक उसकी विधिवत प्रक्रिया पूरी न की गई हो।

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