Historical heritage: इस्लामपुर दिल्ली दरबार की पुकार, मुझे बचा लो सरकार

इस्लामपुर (नालंदा दर्पण)। नालंदा जिले के इस्लामपुर नगर में स्थित ऐतिहासिक (Historical heritage) दिल्ली दरबार कभी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हुआ करता था, आज उपेक्षा और बदहाली का शिकार है। बौलीबाग के समीप अवस्थित यह स्मारक अपनी भव्यता और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता था, लेकिन समय के साथ इसकी स्थिति दिन-प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है। यदि शीघ्र ही इसकी मरम्मत और संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह अनमोल धरोहर हमेशा के लिए खो सकती है।

दिल्ली दरबार का निर्माण सन् 1345 में बूढ़ा नगर के प्रसिद्ध जमींदार चौधरी मुहम्मद ज़हूर उल हक़ साहब ने करवाया था। यह भव्य इमारत दिल्ली के लाल किला और लखनऊ की भूल भुलैया से प्रेरित थी। इसकी संरचना में 52 कोठरियां और 53 दरवाजे शामिल किए गए थे, जो उस समय की वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना थे।
इसे बावन कोठी तिरेपन द्वार के नाम से भी जाना जाता है। दरबार के भीतर एक भूल भुलैया, तालाब और कुआं भी बनवाए गए थे, जो इसे और भी विशिष्ट बनाते थे। इसके अतिरिक्त इमारत की निगरानी के लिए एक विशेष प्रकार का गुंबज बनाया गया था, जो आज भी अपनी अनूठी बनावट के कारण आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
चौधरी जहूर साहब की दूरदर्शिता और उनके द्वारा निर्मित इस भव्य संरचना ने इस्लामपुर को एक विशेष पहचान दी थी। यह स्मारक उस दौर में न केवल स्थानीय लोगों के लिए, बल्कि दूर-दराज से आने वाले यात्रियों और पर्यटकों के लिए भी एक महत्वपूर्ण स्थल था।
इतिहासकारों के अनुसार 1880-82 के दौरान जब आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फर के पोते मिर्ज़ा मुहम्मद रईस बख़्त ज़ुबैरूद्दीन ‘गोरगान’ अज़ीमाबाद (पटना) आए, तब चौधरी जहूर ने उनका भव्य स्वागत किया था। इस स्वागत का ज़िक्र गोरगान ने अपनी किताब मौज-ए-सुल्तानी में किया है, जो सितंबर 1884 में लखनऊ के मुंशी नवल किशोर प्रेस से प्रकाशित हुई थी।

गोरगान ने लिखा है कि पटना शहर के लोग सभ्य और शिष्टाचार वाले हैं। इस्लामपुर के जागीरदार चौधरी मुहम्मद ज़हूर उल हक़ से विशेष प्रेम और सम्मान मिला, जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है।
जमींदारी प्रथा के समाप्त होने के बाद चौधरी जहूर साहब का परिवार इस स्थान को छोड़कर चला गया। इसके बाद से दिल्ली दरबार की देखरेख और रखरखाव पूरी तरह से ठप हो गया। आज यह स्मारक जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। इसकी दीवारें जर्जर हो चुकी हैं, भूल भुलैया और तालाब में गंदगी जमा हो गई है और कुआं भी सूख चुका है।
इसके बावजूद इस इमारत की वास्तुकला और ऐतिहासिक महत्व आज भी कुछ पर्यटकों को आकर्षित करता है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि यह स्मारक नालंदा की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन सरकारी उदासीनता के कारण यह धीरे-धीरे नष्ट हो रहा है।

कुछ पर्यटकों ने बताया कि उचित रखरखाव और प्रचार-प्रसार के अभाव में इस स्मारक का महत्व धूमिल होता जा रहा है। पास में स्थित बावली भी अब उपेक्षित और गंदगी से भरी हुई है। हालांकि इमारत की मजबूती ऐसी है कि यह अभी भी खंडहर होने के बावजूद खड़ी है, जो उस दौर की वास्तुकला की गुणवत्ता को दर्शाता है।
दिल्ली दरबार की वर्तमान स्थिति को देखते हुए स्थानीय लोग और इतिहास प्रेमी इसके संरक्षण के लिए सरकारी हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस स्मारक को उचित देखरेख और मरम्मत मिले, तो यह न केवल अपनी पुरानी शान को पुनः प्राप्त कर सकता है, बल्कि पर्यटन को बढ़ावा देकर स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूत कर सकता है। यह स्मारक नालंदा की समृद्ध इतिहास और संस्कृति का एक जीवंत प्रतीक है, जो उस दौर की सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्था को भी दर्शाता है।
दिल्ली दरबार न केवल वास्तुकला का एक नमूना है, बल्कि नालंदा के गौरवशाली अतीत का प्रतीक भी है। सरकार और स्थानीय प्रशासन को इस धरोहर के संरक्षण के लिए तत्काल कदम उठाने चाहिए। उचित रखरखाव, प्रचार और पर्यटन विकास के माध्यम से दिल्ली दरबार एक बार फिर से पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन सकता है। यह नालंदा के इतिहास को जीवंत रखने और भावी पीढ़ियों को प्रेरित करने का एक सुनहरा अवसर है।

स्थानीय निवासियों का सुझाव है कि दिल्ली दरबार को एक पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करने के लिए इसके आसपास बुनियादी सुविधाओं का विकास, जैसे- साफ-सफाई, गाइड की व्यवस्था और सूचना पट्ट, किया जाना चाहिए। साथ ही इस स्मारक के ऐतिहासिक महत्व को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित करने की आवश्यकता है।
वेशक दिल्ली दरबार नालंदा की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर का एक अभिन्न अंग है। यह स्मारक हमें उस दौर की भव्यता, वास्तुकला और सामाजिक व्यवस्था की याद दिलाता है। यदि इसे समय रहते संरक्षित नहीं किया गया तो नालंदा अपनी एक अनमोल धरोहर खो देगा।
यह समय का तकाजा है कि सरकार, पुरातत्व विभाग और स्थानीय समुदाय मिलकर इस ऐतिहासिक स्मारक को बचाने और इसके गौरव को पुनर्जनन करने के लिए ठोस कदम उठाएं। दिल्ली दरबार को न केवल संरक्षित करने की आवश्यकता है, बल्कि इसे नालंदा के पर्यटन मानचित्र पर एक प्रमुख स्थल के रूप में स्थापित करने की भी जरूरत है।





