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स्मार्टफोन रील्स देखने की आदत है तो पढ़ लें चौंकाने वाली यह रिपोर्ट

नालंदा दर्पण डेस्क। आज के डिजिटल युग में स्मार्टफोन हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। सुबह उठते ही सबसे पहले फोन चेक करना और रात को सोने से पहले सोशल मीडिया पर रील्स स्क्रॉल करना लोगों की दिनचर्या का हिस्सा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह आदत आपकी आंखों और दिमाग को कितना नुकसान पहुंचा सकती है?

हाल ही में प्रकाशित एक शोध ने इस बात का खुलासा किया है कि सोशल मीडिया रील्स का लगातार इस्तेमाल न केवल आंखों की सेहत को प्रभावित करता है, बल्कि मानसिक थकान और नींद से जुड़ी समस्याओं को भी बढ़ावा देता है। जर्नल ऑफ आइ मूवमेंट रिसर्च में प्रकाशित इस अध्ययन को एसआरएम इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के शोधकर्ताओं ने किया है। शोध में पाया गया कि केवल एक घंटे तक लगातार सोशल मीडिया रील्स देखने से आंखों में थकान, जलन और असुविधा की शिकायत हो सकती है।

यह अध्ययन 100 प्रतिभागियों पर किया गया, जिन्हें अलग-अलग प्रकार के डिजिटल कंटेंट जैसे रील्स, इ-बुक और सामान्य वीडियो देखने को कहा गया। नतीजों ने साफ किया कि रील्स देखने से आंखों की पुतलियों में उतार-चढ़ाव अन्य कंटेंट की तुलना में कहीं अधिक होता है।

शोधकर्ताओं ने एक लो-कॉस्ट पोर्टेबल सिस्टम का उपयोग कर आंखों की गतिविधियों को मापा। इस सिस्टम ने ब्लिंक रेट (पलक झपकने की दर), इंटर-ब्लिंक इंटरवल (पलक झपकने के बीच का समय) और पुतली के डायमीटर में होने वाले बदलावों को रिकॉर्ड किया।

अध्ययन के अनुसार रील्स देखते समय स्क्रीन की चमक और इंटेंसिटी में बार-बार बदलाव के कारण पलक झपकने की दर कम हो जाती है, जिससे आंखों में सूखापन और तनाव बढ़ता है।

सोशल मीडिया रील्स की प्रकृति ऐसी है कि वे छोटे, तेजी से बदलते और रंग-बिरंगे कंटेंट होते हैं। इनका लगातार बदलता स्वरूप आंखों को बार-बार एडजस्ट करने के लिए मजबूर करता है।

शोध में पाया गया कि रील्स देखते समय पुतली का फैलाव (प्यूपिल डायलेशन) अन्य गतिविधियों जैसे इ-बुक पढ़ने या लंबे वीडियो देखने की तुलना में 30% अधिक होता है। यह अतिरिक्त दबाव आंखों की मांसपेशियों को थका देता है, जिसके परिणामस्वरूप सिरदर्द, धुंधला दिखाई देना और आंखों में जलन जैसे लक्षण सामने आते हैं।

इसके अलावा, रील्स का तेजी से बदलता कंटेंट दिमाग पर भी असर डालता है। शोधकर्ताओं के अनुसार यह मानसिक थकान, एकाग्रता में कमी और नींद की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। खासकर रात के समय रील्स देखना नींद के चक्र को बिगाड़ सकता है, क्योंकि स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट मेलाटोनिन हार्मोन के उत्पादन को प्रभावित करती है।

शोध में शामिल 40% प्रतिभागियों ने बताया कि वे अपनी आंखों की थकान को कम करने के लिए कुछ उपाय अपनाते हैं।

ब्लू लाइट फिल्टर: स्मार्टफोन में उपलब्ध ब्लू लाइट फिल्टर का उपयोग करना।

डार्क मोड: डार्क मोड का इस्तेमाल कर स्क्रीन की चमक को कम करना।

20-20-20 नियम: हर 20 मिनट में 20 सेकंड के लिए 20 फीट दूर की किसी वस्तु को देखना।

स्क्रीन टाइम सीमित करना: रोजाना स्मार्टफोन उपयोग का समय निर्धारित करना।

विशेषज्ञों का कहना है कि इन छोटे-छोटे उपायों से डिजिटल स्ट्रेन को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके अलावा समय-समय पर आंखों को आराम देना और स्क्रीन से दूरी बनाए रखना भी जरूरी है।

चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार स्मार्टफोन का उपयोग आंखों के लिए हानिकारक हो सकता है, खासकर तब जब आप तेजी से बदलते कंटेंट जैसे रील्स देख रहे हों, वैसे में मरीजों को सलाह देते हैं कि वे हर 30-40 मिनट में कम से कम 2 मिनट का ब्रेक लें और अपनी आंखों को आराम दें।

स्क्रीन की चमक कम करें: अपने स्मार्टफोन की ब्राइटनेस को कम करें और ऑटो-ब्राइटनेस फीचर का उपयोग करें।

ब्लू लाइट चश्मा: ब्लू लाइट को फिल्टर करने वाले चश्मे का उपयोग करें।

हाइड्रेशन: आंखों को नम रखने के लिए पर्याप्त पानी पिएं और जरूरत पड़ने पर आर्टिफिशियल टीयर्स का उपयोग करें।

नियमित जांच: साल में एक बार अपनी आंखों की जांच करवाएं, खासकर अगर आप लंबे समय तक स्क्रीन का उपयोग करते हैं।

वेशक सोशल मीडिया का उपयोग आज के समय में अनिवार्य हो सकता है, लेकिन इसे समझदारी से इस्तेमाल करना जरूरी है। रील्स की लत न केवल आपका समय चुरा सकती है, बल्कि आपकी आंखों और मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकती है। अगर आप भी रील्स देखने के शौकीन हैं तो आज से ही अपने स्क्रीन टाइम को मैनेज करें और अपनी आंखों को वह प्यार दें, जिसकी वे हकदार हैं।

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