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सिलाव प्रखंड में 127 फर्जी शिक्षकों की जांच तेज, दलालों का जाल बेनकाब

सिलाव प्रखंड में फर्जी शिक्षकों की बहाली का यह मामला न केवल शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि भ्रष्टाचार और लापरवाही किस हद तक व्यवस्था को प्रभावित कर रही है। गायब अभिलेख, दलालों का जाल और अधिकारियों की संदिग्ध भूमिका इस मामले को और जटिल बनाते हैं।

बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण)। नालंदा जिले के सिलाव प्रखंड में फर्जी शिक्षकों की बहाली का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने जिला शिक्षा विभाग से लेकर प्रखंड स्तर तक के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

इस घोटाले में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नियुक्त हुए शिक्षकों की जांच फिर से शुरू हो गई है और अब इनके खिलाफ कार्रवाई की तलवार लटक रही है। आरटीआई कार्यकर्ता धनंजय कुमार की लगातार सक्रियता ने इस मामले को फिर से सुर्खियों में ला दिया है, जिसके बाद शिक्षा विभाग में हड़कंप मच गया है।

सिलाव प्रखंड में बड़े पैमाने पर फर्जी शिक्षकों की नियुक्ति का खेल सामने आया है। सूत्रों के अनुसार इस घोटाले में जिला और प्रखंड स्तर के शिक्षा विभाग के कुछ अधिकारियों की संलिप्तता की आशंका जताई जा रही है।

आरटीआई कार्यकर्ता धनंजय कुमार ने इस मामले को उजागर करते हुए फर्जी शिक्षकों की पूरी जानकारी विभाग को सौंपी थी। इसके आधार पर जिला और राज्य स्तर की जांच समितियों ने जांच भी की। लेकिन शुरुआती जांच में सभी को क्लीन चिट दे दी गई। इस क्लीन चिट पर सवाल उठाते हुए धनंजय कुमार ने जांच रिपोर्ट की मांग की, जो अब तक लंबित है।

जांच के दायरे में आए 127 शिक्षकों की स्थिति को लेकर अब बीआरसी सिलाव में हलचल तेज हो गई है। कई शिक्षक अपनी नौकरी बचाने के लिए बीआरसी के चक्कर काट रहे हैं।

जिला शिक्षा पदाधिकारी (डीईओ) ने डीपीओ लेखा योजना और प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी (बीईओ) को इन शिक्षकों की स्थिति की विस्तृत जांच कर रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है। जांच में यह स्पष्ट करने को कहा गया है कि क्या ये शिक्षक कार्यरत हैं, क्या उन्हें वेतन का भुगतान हो रहा है, और यदि उनकी नियुक्ति रद्द की गई है तो उसकी सूची भी उपलब्ध कराई जाए।

इस मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि फर्जी शिक्षकों से संबंधित कई महत्वपूर्ण अभिलेख गायब बताए जा रहे हैं। आरटीआई कार्यकर्ता धनंजय कुमार ने जब जांच प्रतिवेदन की मांग की तो बीईओ सिलाव ने जवाब दिया कि उनके पास इन शिक्षकों से संबंधित कोई अभिलेख उपलब्ध नहीं है।

यह सवाल उठता है कि आखिर ये फाइलें कहां गायब हो गईं और बिना दस्तावेजों के इन शिक्षकों को वेतन का भुगतान कैसे हो रहा है? इस गंभीर लापरवाही ने शिक्षा विभाग की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मामला उजागर होने के बाद फर्जी शिक्षकों में अपनी नौकरी बचाने की होड़ मच गई है। कई शिक्षकों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि प्रखंड शिक्षा कार्यालय में दलालों का जमावड़ा लग रहा है। ये दलाल मोटी रकम लेकर फर्जी शिक्षकों की नौकरी बचाने का दावा कर रहे हैं।

बताया जा रहा है कि दलाल पैसे के बल पर अधिकारियों को प्रभावित करने की कोशिश में जुटे हैं। इस तरह की गतिविधियां शिक्षा विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार को और उजागर कर रही हैं।

जिला शिक्षा पदाधिकारी ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए डीपीओ स्थापना को तत्काल जांच कर प्रतिवेदन सौंपने का निर्देश दिया है। साथ ही, यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि फर्जी शिक्षकों की नियुक्ति पुष्ट होती है तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। इसमें उनकी सेवा समाप्ति के साथ-साथ वेतन की वसूली भी शामिल हो सकती है।

आरटीआई कार्यकर्ता धनंजय कुमार की इस मामले में अहम भूमिका रही है। उनकी लगातार सक्रियता और दबाव के कारण ही यह मामला फिर से चर्चा में आया है। धनंजय ने न केवल फर्जी शिक्षकों की जानकारी उजागर की, बल्कि जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग भी की। उनके प्रयासों ने नालंदा जिले में शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

बहरहाल, सिलाव प्रखंड में फर्जी शिक्षकों की बहाली का यह मामला न केवल शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि भ्रष्टाचार और लापरवाही किस हद तक व्यवस्था को प्रभावित कर रही है।

गायब अभिलेख, दलालों का जाल और अधिकारियों की संदिग्ध भूमिका इस मामले को और जटिल बनाते हैं। अब यह देखना बाकी है कि डीईओ की जांच में क्या खुलासे होते हैं और क्या इन फर्जी शिक्षकों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई हो पाएगी। नालंदा दर्पण इस मामले पर नजर रखे हुए है और आगे की जांच के नतीजों को आपके सामने लाता रहेगा।

मुकेश भारतीय

मुकेश भारतीय वरिष्ठ पत्रकार हैं और राजनीति, प्रशासन और स्थानीय, राष्ट्रीय एवं वैश्विक मुद्दों पर लेखन-संपादन करते हैं। More »

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