राजगीर मेला सैरात की जमीन पर ऐसे कार्य होना दुर्भाग्य

राजगीर (नालंदा दर्पण)। राजगीर के ऐतिहासिक मलमास मेला सैरात की जमीन पर अब नगर परिषद द्वारा शुरू किया गया फव्वारा निर्माण कार्य विवादों के घेरे में है। यह निर्माण अजातशत्रु स्तूप के निकट बस स्टैंड और बाजार को जोड़ने वाली मुख्य सड़क के बीच में हो रहा है। पुरातत्व विभाग ने इसे पूरी तरह अवैध करार दिया है, क्योंकि किसी भी संरक्षित पुरातात्विक स्थल के 100 मीटर की परिधि में निर्माण कार्य प्रतिबंधित है।

पुरातत्व विभाग का कहना है कि नगर परिषद नियमों की खुलेआम अवहेलना कर रहा है। विभाग ने नगर परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी को नोटिस जारी किया है और राजगीर थाना में एफआईआर दर्ज करने के लिए आवेदन भी दिया गया है।

इसके बावजूद निर्माण कार्य निर्बाध रूप से जारी है। यह सवाल उठता है कि क्या नगर परिषद पुरातात्विक नियमों को ताक पर रखकर विकास के नाम पर सांस्कृतिक धरोहर को नुकसान पहुंचा रहा है?

मलमास मेला राजगीर की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान का अभिन्न हिस्सा है। लेकिन इस निर्माण और पहले से मौजूद अतिक्रमण के कारण मेला सैरात की जमीन लगातार सिकुड़ रही है।

मेला ठेकेदार संजय कुमार सिंह का कहना है कि फव्वारा निर्माण से सर्कस मैदान और सैरात का आकार इतना छोटा हो जाएगा कि न केवल सर्कस लगाने में दिक्कत होगी, बल्कि सरकारी मेलों और अन्य बड़े आयोजनों पर भी बुरा असर पड़ेगा।

स्थानीय जनप्रतिनिधियों और बुद्धिजीवियों का मानना है कि नगर परिषद मूल मुद्दों, जैसे मेला सैरात पर अतिक्रमण, को नजरअंदाज कर रही है। समाजसेवी अशोक कुमार राय ने इस निर्माण पर कड़ा ऐतराज जताया है।

उन्होंने कहा है कि फव्वारा ऐसी जगह बनना चाहिए, जहां पर्यटकों का आना-जाना हो। इस स्थान पर पर्यटकों का ठहराव नहीं होता, इसलिए यह बिल्कुल अनुपयुक्त है। फव्वारा निर्माण के लिए वैकल्पिक और उपयुक्त स्थान चुना जाए। ताकि यह पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बने और मेला की परंपरा भी सुरक्षित रहे।

हालांकि यह विवाद केवल एक निर्माण कार्य तक सीमित नहीं है। यह राजगीर की सांस्कृतिक विरासत, पुरातात्विक महत्व और परंपरागत आयोजनों के भविष्य से जुड़ा गंभीर सवाल खड़ा करता है। अशोक राय ने जिला प्रशासन, स्थानीय विधायक और सांसदों से हस्तक्षेप की अपील की है कि अजातशत्रु स्तूप के समीप इस निर्माण पर पुनर्विचार जरूरी है।

अब देखना है कि राजगीर नगर परिषद पुरातत्व विभाग के नोटिस और स्थानीय लोगों की चिंताओं को कितनी गंभीरता से लेती है? क्या मलमास मेला अपनी भव्यता और परंपरा को बरकरार रख पाएगा?

इन सवालों का जवाब भविष्य में प्रशासन के निर्णयों पर निर्भर करता है। नालंदा दर्पण के पाठकों से अपील है कि इस मुद्दे पर अपनी राय साझा करें और राजगीर की सांस्कृतिक धरोहर को बचाने में योगदान दें।

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