बिना उत्पादन जंग खा गई कन्हैयागंज का झूला और सिलाव का खाजा क्लस्टर

बिहारशरीफ (नालंदा दर्पण संवाददाता)। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के महत्वाकांक्षी ड्रीम प्रोजेक्ट्स में शामिल कन्हैयागंज का झूला क्लस्टर और सिलाव का खाजा क्लस्टर दस वर्षों से अधिक समय बीत जाने के बावजूद तकनीकी और प्रशासनिक बाधाओं के कारण उत्पादन शुरू नहीं कर सका है।

ये दोनों परियोजनाएँ सूक्ष्म एवं लघु उद्योग क्लस्टर योजना के तहत उद्योग विभाग द्वारा स्वीकृत की गई थीं, लेकिन बिजली कनेक्शन और जमीन विवाद जैसी समस्याओं ने इन योजनाओं पर ग्रहण लगा दिया है। इन दोनों यूनिट्स पर अब तक करीब पाँच करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, फिर भी उत्पादन का सपना अधूरा है।

एकंगरसराय प्रखंड में स्थित कन्हैयागंज गाँव झूला निर्माण के लिए देश-विदेश में अपनी पहचान बना चुका है। यहाँ के कारीगरों ने न केवल स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजित किया, बल्कि ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को भी मजबूती प्रदान की है।

कन्हैयागंज झूला क्लस्टर की स्थापना का उद्देश्य आधुनिक तकनीकों जैसे सीएनसी लेंथ मशीनों के उपयोग से ऑटोमैटिक झूलों का उत्पादन करना था, जो देश में अपनी तरह का पहला क्लस्टर होता। इस परियोजना के लिए 4.56 करोड़ रुपये की राशि निर्धारित की गई थी, जिसमें से अब तक 4.13 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। विभाग को मात्र 43 लाख रुपये की अंतिम किश्त देनी बाकी है।

हालांकि, क्लस्टर में मशीनें स्थापित हो चुकी हैं, लेकिन बिजली कनेक्शन की कमी के कारण उत्पादन शुरू नहीं हो सका है। तकनीकी निदेशक अरविंद विश्वकर्मा के अनुसार बिजली आपूर्ति के लिए 4.15 लाख रुपये का भुगतान तीन किश्तों में किया जा चुका है, लेकिन कनेक्शन अभी तक नहीं मिला है।

यह देरी न केवल परियोजना को प्रभावित कर रही है, बल्कि स्थानीय कारीगरों के उत्साह को भी कम कर रही है, जो इस क्लस्टर के माध्यम से अपनी कला को नई ऊँचाइयों तक ले जाने की उम्मीद रखते हैं।

दूसरी ओर सिलाव का खाजा क्लस्टर भी समस्याओं से जूझ रहा है। नालंदा और राजगीर के बीच बसे सिलाव कस्बे का खाजा अपनी मिठास और अनूठे स्वाद के लिए देशभर में प्रसिद्ध है।

इस क्लस्टर को अत्याधुनिक तकनीक से खाजा उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए शुरू किया गया था, जिसके लिए 1.14 करोड़ रुपये की परियोजना स्वीकृत की गई थी। लेकिन जमीन विवाद के कारण यह परियोजना भी ठप पड़ी है। इस विवाद ने न केवल उत्पादन को रोका है, बल्कि स्थानीय कारीगरों और उद्यमियों के लिए रोजगार के अवसरों को भी सीमित कर दिया है।

नालंदा जिला उद्योग केंद्र के महाप्रबंधक सचिन कुमार का कहना है कि विभाग इन दोनों उद्योग यूनिट्स को शुरू करने के लिए लगातार प्रयासरत है। तकनीकी और प्रशासनिक बाधाओं को दूर करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं, लेकिन समयबद्ध तरीके से परियोजनाओं को पूरा करना चुनौतीपूर्ण रहा है। हम इन बाधाओं को हल करने और जल्द से जल्द उत्पादन शुरू करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

कन्हैयागंज के झूला उद्योग ने न केवल स्थानीय कारीगरों को रोजगार दिया है, बल्कि बिहार के बाहर भी इसकी माँग बढ़ी है। यहाँ के कारीगरों ने ‘तरंग’ और ‘सुनामी’ जैसे नवीन डिजाइनों के साथ ऑटोमैटिक झूलों का निर्माण किया है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन के उत्पादों को टक्कर दे रहे हैं।

हाल ही में कारीगरों ने ‘स्विंग स्टार’ नामक हाईटेक झूला मात्र 60 लाख रुपये में तैयार किया, जो पहले 1.5 करोड़ रुपये में चीन से आयात होता था। यह उपलब्धि ‘मेक इन इंडिया’ की भावना को दर्शाती है।

वहीं, सिलाव का खाजा अपनी अनूठी बनावट और स्वाद के कारण देशभर में मशहूर है। यहाँ के कारीगरों का मानना है कि सिलाव की हवा और पानी इस मिठाई को खास बनाते हैं। लेकिन क्लस्टर के शुरू न होने से उत्पादन को औद्योगिक स्तर पर विस्तार देने का सपना अधूरा है।

इन दोनों क्लस्टरों के शुरू होने से न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा, बल्कि बिहार को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उद्योग के क्षेत्र में नई पहचान मिलेगी। कन्हैयागंज का झूला क्लस्टर देश का पहला सीएनसी लेंथ वाला ऑटोमैटिक झूला उत्पादन केंद्र बन सकता है, जबकि सिलाव का खाजा क्लस्टर स्थानीय मिठाई को वैश्विक बाजार तक पहुँचा सकता है।

हालांकि, इसके लिए सरकार और उद्योग विभाग को त्वरित कदम उठाने होंगे। बिजली कनेक्शन और जमीन विवाद जैसे मुद्दों को प्राथमिकता के आधार पर हल करना होगा। इसके साथ ही इन क्लस्टरों को ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के तहत प्रचार और नेटवर्किंग की सुविधा प्रदान करने की आवश्यकता है, ताकि इनके उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में उचित स्थान मिल सके।

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