करायपरसुरायः ग्रामीणों का आक्रोश- ‘रोड नहीं तो वोट नहीं की घोषणा’

हिलसा (नालंदा दर्पण)। करायपरसुराय प्रखंड के चंदकुरा गांव के निवासियों ने एक साहसिक और निर्णायक कदम उठाया है। गांव की जर्जर सड़क की मरम्मत के लिए लंबे समय से अनसुनी मांगों से तंग आकर ग्रामीणों ने एकजुट होकर पक्की सड़क नहीं तो वोट नहीं की घोषणा की है। यह नारा केवल एक नाराजगी का प्रतीक नहीं, बल्कि बुनियादी सुविधाओं की अनदेखी के खिलाफ एक सामूहिक आवाज है।
चंदकुरा गांव को फतुहा-हिलसा मुख्य मार्ग से जोड़ने वाली सड़क पिछले पंद्रह वर्षों से मरम्मत के अभाव में जर्जर हालत में है। गड्ढों से भरी यह सड़क अब केवल एक रास्ता नहीं, बल्कि ग्रामीणों के लिए रोजमर्रा की जिंदगी में एक बड़ी बाधा बन चुकी है। बारिश के मौसम में यह सड़क कीचड़ के दलदल में तब्दील हो जाती है और सूखे मौसम में धूल के गुबार से ग्रामीणों का जीना मुहाल हो जाता है।
ग्रामीणों का कहना है कि इस सड़क की मरम्मत के लिए उन्होंने बार-बार स्थानीय प्रशासन, विधायक और सांसद को आवेदन दिए, लेकिन उनकी मांगें कागजों में दबकर रह गईं। क्या हमें सड़क जैसी बुनियादी सुविधा के लिए भीख मांगनी पड़ेगी?
इस जर्जर सड़क का सबसे ज्यादा असर गांव के बच्चों पर पड़ रहा है। स्कूल जाने के लिए बच्चों को लगभग एक किलोमीटर पैदल चलकर मुख्य मार्ग तक पहुंचना पड़ता है, क्योंकि स्कूली वाहन गांव तक नहीं आते। बारिश के दिनों में यह यात्रा और भी खतरनाक हो जाती है। बारिश में कीचड़ में फिसलने का डर रहता है।
सड़क की खराब स्थिति ने न केवल बच्चों की पढ़ाई को प्रभावित किया है, बल्कि ग्रामीणों के दैनिक जीवन को भी मुश्किल बना दिया है। घरेलू गैस सिलेंडर की गाड़ी और एंबुलेंस जैसी जरूरी सेवाएं गांव तक पहुंचने में असमर्थ हैं। आपातकालीन स्थिति में मरीजों को मुख्य मार्ग तक ले जाना एक चुनौती बन जाता है।
थक-हारकर चंदकुरा के ग्रामीणों ने अब लोकतंत्र की ताकत का सहारा लिया है। गांव की एक सभा में सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि यदि उनकी सड़क की मरम्मत नहीं की गई तो वे आगामी चुनावों में मतदान का बहिष्कार करेंगे। यह फैसला न केवल उनकी नाराजगी को दर्शाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि ग्रामीण अब अपनी आवाज को अनसुना नहीं होने देंगे।






