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जानें दुनिया के बदलाव में नालंदा की भूमिका: खंडहरों से वैश्विक चेतना तक की यात्रा

Know the role of Nalanda in changing the world A journey from ruins to global consciousness

नालंदा दर्पण डेस्क /मुकेश भारतीय। जिस धरोहर को अब हम खंडहरों के रूप में देखते हैं, उसने कभी ज्ञान की ऐसी रोशनी फैलाई थी जिसने सदियों तक पूरी दुनिया को आलोकित किया। बिहार के राजगीर के पास स्थित नालंदा महाविहार सिर्फ एक प्राचीन विश्वविद्यालय नहीं था, यह एक विचार था- एक ऐसी विचारधारा जिसने शिक्षा, विज्ञान, तर्क, दर्शन और मानवता के मूल्यों को वैश्विक पटल पर स्थापित किया।

Know the role of Nalanda in changing the world: A journey from ruins to global consciousness
Know the role of Nalanda in changing the world: A journey from ruins to global consciousness

तीसरी सदी ईसा पूर्व सम्राट अशोक द्वारा स्थापित नालंदा विहार ने मौर्य काल से लेकर पाला साम्राज्य तक एक अंतरराष्ट्रीय शिक्षा केंद्र के रूप में कार्य किया। यह पहला ऐसा रेज़िडेंशियल  विश्वविद्यालय था, जहां छात्र न केवल पढ़ाई करते थे, बल्कि परिसर में रहते भी थे। इसकी व्यवस्था ने ऑक्सफ़ोर्ड और कैंब्रिज जैसे विश्वविद्यालयों की संरचना को प्रेरित किया। यहां खगोलशास्त्र, गणित, दर्शन, व्याकरण, साहित्य, चिकित्सा और कला जैसे विषयों की पढ़ाई होती थी और वह भी कई भाषाओं में।

नालंदा के गौरव में सबसे चमकता नाम है- आर्यभट्ट। छठी सदी में उन्होंने ‘आर्यभटीय’ लिखकर शून्य को अंक के रूप में मान्यता दी। जिससे बीजगणित और कैलकुलस की नींव पड़ी। ब्रह्मगुप्त ने इसे आगे बढ़ाया और उनके ग्रंथ ब्रह्मस्फुटसिद्धांत का अरबी में अनुवाद कर ‘सिंदहिंद’ के रूप में पश्चिमी जगत में प्रवेश कराया गया।

गौतम सिद्धार्थ जैसे नालंदा के विद्वानों ने चीन में खगोल विज्ञान के आधिकारिक ढांचे का नेतृत्व किया। वहीं चीनी बौद्ध भिक्षु यी शिंग ने नालंदा में खगोल और गणित की गहरी शिक्षा लेकर अपने देश में नई परंपराएं स्थापित कीं।

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नालंदा सिर्फ शिक्षा का नहीं, विचारों के विकास का केंद्र भी था। संतरक्षिता और कमलशील जैसे विद्वानों ने योगाचार-माध्यमिक दर्शन का निर्माण किया। यहीं वज्रयान बुद्धिज्म का जन्म हुआ, जो आज तिब्बत, चीन, जापान और मंगोलिया की धार्मिक चेतना की रीढ़ है।

पांचवीं से आठवीं शताब्दी के बीच नालंदा कला का भी केंद्र बना। यहां के त्रि-आयामी मंडल और मूर्तिशिल्प ने बोरोबुदुर (इंडोनेशिया) जैसे भव्य स्तूपों की कल्पना को जन्म दिया। नालंदा की पांडुलिपि संस्कृति ने दुनिया भर में मौखिक परंपरा से लिखित ज्ञान के युग की शुरुआत की। ‘द डायमंड सूत्रा’, जिसे दुनिया की पहली छपी हुई पुस्तक माना जाता है, इसी परंपरा की उपज थी।

तिब्बत की लिपि, भाषा और साहित्य को समृद्ध करने वाले थोन्मी सम्भोटा ने यहीं शिक्षा प्राप्त की। अपभ्रंश साहित्य के विकास में भी नालंदा के चौरासी सिद्धों ने अमूल्य योगदान दिया।

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नालंदा की चिकित्सा परंपरा चीन, जापान और कोरिया तक पहुंची। रसायन विज्ञान पर नागार्जुन की रसरत्नाकर जैसी रचना ने पूर्वी चिकित्सा को नया आयाम दिया। हठ योग का शुरुआती उल्लेख भी यहीं के बौद्ध तांत्रिक ग्रंथों में मिलता है-  जिसने आज योग को वैश्विक पहचान दिलाई।

नालंदा की शिक्षा प्रणाली और बोधिसत्व परंपरा ने एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। इतिहासकार मानते हैं कि बौद्ध धर्म ने ईसाई धर्म के शुरुआती सिद्धांतों को प्रभावित किया-  एक विचार जो नागार्जुन की शिक्षा प्रणाली में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

हालांकि नालंदा महाविहार ने 14वीं सदी में कार्य करना बंद कर दिया। लेकिन इसकी विरासत रुकी नहीं। 1951 में नव नालंदा महाविहार की स्थापना हुई और 2010 में नालंदा विश्वविद्यालय की शुरुआत ने इसे आधुनिक संदर्भ में पुनर्जीवित किया।

नालंदा के नाम पर दुनियाभर में संस्थान स्थापित किए गए। उनमें नालंदा मठ की स्थापना (फ्रांस), नालंदा बौद्धिस्ट सेंटर और नालंदाराम रिट्रीट सेंटर (ब्राज़ील), नालंदा कॉलेज ऑफ़ बौद्धिस्ट स्टडीज़ (कनाडा), इंटरनेशनल बौद्धिस्ट कॉलेज (थाईलैंड) के आलावे मलेशिया, अमेरिका, श्रीलंका और तिब्बत आदि  स्थानों पर नालंदा से प्रेरित संस्थान अस्तित्व में हैं।

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