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खूबसूरत पहाड़ियों का भी दर्शन करा रही है कोडरमा-वैशाली बौद्ध सर्किट ट्रेन

राजगीर (नालंदा दर्पण)। बिहार और झारखंड के बीच बौद्ध धरोहर को जोड़ने वाली कोडरमा-वैशाली मेमू फास्ट पैसेंजर ट्रेन को बौद्ध सर्किट ट्रेन के नाम से जाना जा रहा है। यह ट्रेन न केवल यातायात का साधन है, बल्कि यह बिहार की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को विश्व पटल पर लाने का एक अनूठा प्रयास है।

बौद्ध धर्म के संस्थापक भगवान बुद्ध की शिक्षाओं और जीवन से जुड़े स्थानों को एक साथ जोड़ने वाली यह ट्रेन न केवल पर्यटकों के लिए, बल्कि बौद्ध अनुयायियों और इतिहास प्रेमियों के लिए भी एक विशेष आकर्षण है। यह ट्रेन वैशाली, नालंदा, राजगीर और गया जैसे बौद्ध धर्म के पवित्र स्थलों को जोड़ती है, जो हरियाली भरी वादियों और खूबसूरत पहाड़ियों के बीच से गुजरती है।

यह ट्रेन वैशाली से शुरू होकर हाजीपुर, सोनपुर, पाटलिपुत्र, पटना, राजेंद्रनगर, फतुहा, बख्तियारपुर, बिहार शरीफ, नालंदा, राजगीर, तिलैया, गया और गुरपा जैसे महत्वपूर्ण स्टेशनों से होकर कोडरमा तक जाती है। यह यात्रा न केवल बौद्ध स्थलों तक पहुंच को आसान बनाती है, बल्कि पर्यटकों को बिहार और झारखंड की प्राकृतिक सुंदरता का भी लुत्फ उठाने का अवसर देती है।

वैशाली को विश्व का पहला गणतंत्र माना जाता है। यह वह स्थान है जहां भगवान बुद्ध ने अपने अंतिम प्रवचन दिए थे और जहां दूसरी बौद्ध परिषद का आयोजन हुआ था। वैशाली का ऐतिहासिक महत्व केवल बौद्ध धर्म तक सीमित नहीं है, यह जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर की जन्मस्थली भी है। सम्राट अशोक द्वारा निर्मित 15 मीटर ऊंचा अशोक स्तंभ आज भी यहां की शोभा बढ़ाता है। इस ट्रेन के शुरू होने से वैशाली के पर्यटन को और बल मिलेगा।

ट्रेन का अगला पड़ाव नालंदा और राजगीर है, जो प्राचीन भारत के शिक्षा और आध्यात्मिक केंद्र रहे हैं। नालंदा विश्वविद्यालय, जो 5वीं से 12वीं शताब्दी तक विश्व का सबसे बड़ा अध्ययन केंद्र था। आज भी अपने खंडहरों के माध्यम से इतिहास की कहानियां बयां करता है।

प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने यहां एक वर्ष तक अध्ययन और अध्यापन किया था। दूसरी ओर, राजगीर की हरियाली भरी पहाड़ियां और गर्म पानी के झरने पर्यटकों को प्रकृति और आध्यात्मिकता का अनूठा संगम प्रदान करते हैं। राजगीर में विश्व शांति स्तूप और बौद्ध मठ पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण हैं।

ट्रेन का एक प्रमुख पड़ाव गया और बोधगया है, जहां भगवान बुद्ध को बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। बोधगया का महाबोधि मंदिर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है और विश्व भर से बौद्ध तीर्थयात्रियों को आकर्षित करता है। गया में विष्णुपद मंदिर और पितृपक्ष के दौरान आयोजित होने वाले धार्मिक अनुष्ठान भी इसे विशेष बनाते हैं।

इस ट्रेन का अंतिम पड़ाव झारखंड की हरियाली और पहाड़ियों के बीच बसा कोडरमा है। यह क्षेत्र न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है, बल्कि यह बौद्ध और जैन धर्म के अनुयायियों के लिए भी महत्वपूर्ण है। कोडरमा से वैशाली तक की यह यात्रा पर्यटकों को बिहार और झारखंड की सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत को एक साथ अनुभव करने का अवसर देती है।

ट्रेन संख्या 63383 वैशाली-कोडरमा मेमू फास्ट पैसेंजर सुबह 5:15 बजे वैशाली से रवाना होती है और दोपहर 3:15 बजे कोडरमा पहुंचती है। वापसी में ट्रेन संख्या 63384 कोडरमा-वैशाली मेमू फास्ट पैसेंजर शाम 4:45 बजे कोडरमा से चलकर अगले दिन देर रात 2:45 बजे वैशाली पहुंचती है। यह ट्रेन तेज और सुविधाजनक यात्रा प्रदान करती है, जिससे पर्यटक और तीर्थयात्री कम समय में इन पवित्र स्थलों की यात्रा कर सकते हैं।

इस बौद्ध सर्किट ट्रेन के शुरू होने से बिहार और झारखंड के पर्यटन उद्योग को नई गति मिल रही है। यह ट्रेन न केवल स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित करेगी, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा दे रहा है। यह ट्रेन बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए एक सुगम और किफायती यात्रा का साधन है।

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